पूर्वोत्तर के परिणाम से कर्नाटक में हड़कंप

अखिलेश अखिल

चुनाव परिणाम पूर्वोत्तर राज्य से आ रहे हैं और परेशानी कर्नाटक में दिख रही है। खासकर कांग्रेस को पूर्वोत्तर राज्यों के परिणाम निराश से भर दिया है। कर्नाटक कांग्रेस हतोत्साहित होती दिख रही है। जिस तरह से त्रिपुरा में बीजेपी ने लेफ्ट गढ़ को जमींदोज किया है वह बहुत कुछ बताती नजर आ रही है। साफ़ हो गया है कि पीएम मोदी का करिश्मा अभी भी कायम है और जिस तरह पूर्वोत्तर की जनता मोदी के साथ खड़े हुए हैं उसी तरह कर्नाटक की जनता भी मोदी के साथ जा सकती है। यह बात और है कि पूर्वोत्तर और कर्नाटक में अंतर है ,राजनीतिक अंतर भी। फिर भी इस हालिये चुनाव परिणाम के असर तो वहाँ पड़ेंगे ही। इस चुनाव परिणाम ने जहां कांग्रेस के मनोबल को तोड़ा है वही बीजेपी के मनोबल को और मजबूत किया है।

सबसे बड़ी बात यह है कि अगर कर्नाटक चुनाव में कांग्रेस अपनी हालत को कायम नहीं बना पाती है तो उसकी राष्ट्रीय छवि पर असर पडेगा। कर्नाटक हार के बाद कांग्रेस कहीं की नहीं रहेगी और ना ही मध्यप्रदेश ,छत्तीसगढ़ और राजस्थान में वह कोई परिवर्तन कर पाएगी। इसलिए पूर्वोत्तर का चुनाव जहां कर्नाटक को प्रभावित करता दिखता है ठीक उसी तरह से कर्णाटक के चुनाव परिणाम अगले साल के तीन बड़े राज्यों के चुनाव को प्रभावित करेंगे। त्रिपुरा और नगालैंड में कांग्रेस की करारी हार ने कर्नाटक में कांग्रेस नेता और कार्यकर्ताओं को हिला कर रख दिया है। अगले दो महीने में अब कर्नाटक में पार्टी के लिए करो या मरो की लड़ाई होगी।

हालांकि त्रिपुरा में कांग्रेस की हार तय थी, लेकिन फिर भी उन्हें उम्मीद थी कि शायद माणिक सरकार बीजेपी के रथ को रोक ले। ऐसा होने पर कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ सकता था। लेकिन अब उम्मीदें टूट चुकी है। बीजेपी ने त्रिपुरा से लेफ्ट के 25 साल के राज को खत्म कर दिया हैं। नगालैंड में करारी हार ने कर्नाटक में कांग्रेस के मनोबल को तोड़ दिया है। कांग्रेस को इस बात का भी डर सता रहा है कि बीजेपी कही गोवा और मणिपुर जैसे हालात मेघालय में न पैदा कर दे। मेघालय में कांग्रेस सबसे पड़ी पार्टी के तौर पर उभरी है। लेकिन आपको याद होगा कि गोवा और मणिपुर में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद सत्ता में नहीं है।

कर्नाटक में राज्य में ईसाइयों की संख्या 3 फीसदी से ज़्यादा है। पिछले कुछ समय सें कांग्रेस के नेता बीजेपी पर ये आरोप लगा रहे थे कि वो ईसाइयों का ख्याल नहीं रखते। लेकिन अब उत्तर-पूर्व में जीत के बाद कांग्रेस बीजेपी से ज़्यादा सवाल नहीं पूछ सकती है। दूसरा ये कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक बार फिर से देश के सबसे बड़े नेता के तौर पर उभरे हैं और कर्नाटक के चुनाव में भी उनका काफी अहम रोल रहने वाला है। शायद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जानते थे कि उनकी पार्टी के लिए उत्तर-पूर्व में जीत का कोई मौका नहीं था। ऐसे में त्रिपुरा, नगालैंड और मेघालय के चुनाव प्रचार के दौरान कर्नाटक में पार्टी के लिए प्रचार कर रहे थे। इससे साफ दिखता है कि कांग्रेस ने कर्नाटक को गंभीरता से लिया है।

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