प्रधानमंत्री ने पलटा स्मृति ईरानी का फैसला, फेक न्यूज को लेकर जारी की थी गाइडलाइंस

नई दिल्ली: सूचना एवं प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी ने सोमवार को ऐलान किया कि सरकार उन पत्रकारों की मान्यता रद्द कर देगी, जो मनगढंत खबरें जारी करते हैं। सरकार की इस कवायद का पत्रकारों ने विरोध किया जिसे देखते हुए मोदी सरकार को यह फैसला वापस लेना पड़ा। पीएम ने कहा कि यह फैसला प्रेंस काउंसिल ऑफ इंडिया ही करेगा।

आपको बता दें कि पत्रकारिता के गिरते स्तर और फेक न्यूज़ के बढ़ते चलन से समाज और राजनीति परेशान है। यह बात और है कि फेक न्यूज़ का चलन इधर हाल के वर्षों में कुछ ज्यादा ही बढ़ा है और कई लोग इसका लाभ भी उठाते रहे हैं। राजनीतिक स्तर पर इसका उपयोग कुछ ज्यादा ही किया गया है। भारत में फेक न्यूज़ की शुरुआत कब से और किसने शुरू किया इसकी जानकारी भले ही किसी को नहीं हो लेकिन सच तो यही है कि इसका इतिहास बहुत लंबा है।

भारत के अलावा विदेशों में भी फेक न्यूज़ से समाज और राजनीति गहरे रूप से प्रभावित है। अब भारत में बढ़ते फेक न्यूज़ ने सरकार को सकते में डालदिया है। यही वजह है कि फर्जी खबरों को रोकने के लिए मोदी सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। सूचना तथा प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी ने मंगलवार को ऐलान किया कि सरकार उन पत्रकारों की मान्यता रद्द कर देगी, जो मनगढंत खबरें जारी करते हैं। हालांकि सरकार की इस कवायद का विरोध भी शुरू हो गया है।फेक न्यूज अकेले भारत की समस्या नहीं है। अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान फेसबुक पर फेक न्यूज जारी होने का मामला सामने आया था। इस खबर में हम आपको फेक न्यूज से जुड़ी कुछ अहम जानकारी देंगे –

फेक न्यूज का इतिहास है पुराना

फर्जी खबरों का इतिहास बहुत पुराना है। विश्व युद्धों के दौरान ‘कौन जीता- कौन हारा’ इसकी मनगढंत खबरें फैलाई जाती थीं।19वीं सदी की सबसे बड़ी फेक न्यूज अमेरिकी अखबार ‘द न्यूयॉर्क सन’ ने छापी थी। अखबार ने लिखा था कि दो अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा पर गए हैं और उन्हें वहां जीवन मिला है। तब अखबार की खूब चर्चा हुई, लेकिन एक महीने बाद तब बड़ी किरकिरी हुई जब अखबार को खुद ही अपने पाठकों को बताना पड़ा कि यह सीरीज मनगढंत खबरों पर आधारित थी।

21वीं सदी में इंटरनेट का चलन बढ़ने के साथ ही फर्जी खबरों की बाढ़ आ गई। ज्यादा से ज्यादा क्लिक हासिल करने के लिए सनसनीखेज और झूठी हैडिंग बनाई जाने लगीं।अमेरिका में यह फेक न्यूज इंडस्ट्री तेजी से फैली है। यहां जस्टिन कोलेर जैसे पत्रकार सामने आए, जिन्होंने फेक मीडिया संस्थान बनाकर विज्ञापनों के जरिए 18 लाख रुपए महीने तक कमाए। पॉल हॉर्नर जैसे पत्रकार ने अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान खूब फर्जी खबरें लिखीं, जो न केवल गूगल न्यूज पर रैंक हुईं, बल्कि फेसबुक पर खूब पढ़ी गईं।

हालांकि बाद में हॉर्नर को जेल भी जाना पड़ा। अमेरिका में फेक न्यूज का मामला कितना गरमा गया है, अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने बकायदा उस मीडिया संस्थानों की लिस्ट जारी की थी, जिन्होंने चुनाव के दौरान उनके बारे में निराधार खबरें छापी थीं। अमेरिका से सबक लेते हुए अब यूरोप के कई देशों ने फेक न्यूज से लड़ने की तैयारी कर ली है। यहां फेक न्यूज की पहचान करने का सिस्टम बनाया जा रहा है। मलेशिया की संसद ने विरोध के बावजूद फेक न्यूज पर अधिकतम छह साल जेल की सजा वाला कानून पारित हो चुका है।

आलोचकों ने इसे आम चुनाव से पहले विरोध को दबाने वाला कानून बताकर चिंता जताई है। शुरू में सराकर ने फेक न्यू्‌ज छापने पर अधिकतम 10 साल की सजा और पांच लाख रिंगिट यानी करीब 84.52 लाख रुपए के जुर्माने का प्रस्ताव था। आलोचना के बाद सरकार ने सजा को घटाकर छह साल कर दिया। पिछले चुनाव में भारत में भी फेक न्यूज़ बड़े स्तर पर बनाये गए और लोगों को प्रभावित भी किया। कहते है कि 2014 के चुनाव में फर्जी ख़बरों के चुनाव लड़े गए।

बता दें कि फेक खबरें तेजी से फैलती हैं। सामान्य खबरों की तुलना में इनकी हैडिंग की ओर आकर्षित होने वाले पाठकों की संख्या ज्यादा है। अकेले ट्वीटर की बात करें तो महज 0.1 फीसदी ट्विटर अकाउंट्स के जरिए 80 फीसदी फेक न्यूज को फैलाया जाता है। फेक न्यूज के कारण सच्ची खबरों को खोज पाना मुश्किल होता है। इसके लिए कुछ वेबसाइट्स बनाई गई हैं, जहां पता लगाया जा सकता है कि कोई खबर झूठी है या सच्ची।

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