प्रायोजित अराजकता ?

देश की सबसे बड़ी अदालत को कहना पड़ गया कि दिल्ली में 1984 को दोहराने नहीं दिया जाएगा। साफ है कि मामला प्रायोजित अराजकता वाला है। मामला अपने-अपने राजनीतिक निहितार्थों की बलि वेदी पर 40 से अधिक लोगों को हलाल कर दिए जाने वाला है। बेकसूर लोग गृह युद्ध के इस प्रायोगिक एवं प्रारंभिक स्वरूप में घास की तरह कुचले गए। उनका कसूर यह था कि हैसियत में वे उस वृक्ष जैसे नहीं थे, जिसके गिरने से 1984 में जमीन कांप उठी थी। प्रतिक्रिया में असंख्य सिखों का कत्ल कर दिया गया। जो सज्जन कुमार दोषी साबित हो गए, वह जेल में हैं। शेष जो ‘सज्जन’ उस सामूहिक हत्याकांड के वैचारिक जनक थे, वे सुरक्षित हैं। इन शेष सज्जनों ने निहायत चालाकी के साथ ‘तालाब से रोहू पकडऩे के लिए छोटी-छोटी मछलियां चारा बनाकर छोड़ दीं’। वे शिकार की इस अमानवीय प्रक्रिया पर घडिय़ाली आंसू बहाते हुए अपने गुनाह से साफ बच निकले।

न तो 1984 में दिल्ली अपने आप सुलगी थी और न ही मौजूदा हिंसा में यह फैक्टर काम कर रहा है। नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के समर्थन तथा विरोध को लेकर हो रहा खूनखराबा धीमी आंच पर रखकर पकाया गया वह षड्यंत्र है, जिसकी बुनियाद शाहीनबाग में रखी गई। वहां साजिशों का सांझा चूल्हा जल रहा था। कांग्रेस ने तुष्टिकरण की बांसी कढ़ी में उबाल लगाते हुए इन प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया। भाजपा ने इस धरने से नाराज लोगों के प्रेशर कुकर की सीटी बजने की प्रतीक्षा में आंदोलनकारियों पर न तो कार्रवाई की और न ही उनसे बातचीत का उपक्रम किया। आम आदमी पार्टी इस सारे प्रकरण पर कहीं ‘गरीब नवाज होटल’, तो कहीं ‘रामभरोसे भोजनालय’ वाला सफल खेल खेल गई।

बाकी दिल्ली पुलिस और खुफिया एजेंसियां जिस तरह की भूमिका में दिखीं, उसे देखकर यही लगता है कि उनका काम यहां भभकते चूल्हों पर रखे सियासी दंगों में चटपटा मसाला डालने तक का ही रह गया था। दिल्ली पुलिस की भूमिका को शाहीनबाग से ताजा फसाद तक सिर्फ शर्मनाक की ही संज्ञा दी जा सकती है। दिल्ली की हिंसा इस तरह के अन्य घटनाक्रमों से बहुत अलग है। बेहद संजीदा है। यह उस जहरीली हवा वाले विशालकाय पेड़ का मामला है, जिसे तमाम वैचारिक मतभेदों के साथ अलग-अलग लोगों द्वारा भरपूर खाद और पानी दिया गया। अनुराग ठाकुर का गोली मारने का आह्वान, प्रवेश वर्मा के भड़काऊ भाषण से लेकर शाहीनबाग के पैरोकार और अमूल्या द्वारा की गई पाकिस्तान की जयकार इसी दिशा में उठाए गए कदम थे। असदुद्दीन ओवैसी से लेकर कपिल मिश्रा तक अपने-अपने तरीके से इस आग में घी डालते रहे।

शर्मनाक बात यह कि वह आशंकाएं कोर्ट को जतानी पड़ीं, जिसे पूरी तरह सामने देखने के बावजूद तमाम जनप्रतिनिधि, सियासतदां और जिम्मेदार सरकारें मौन साधे रहे। यदि अदालत को ही हालात के संदिग्धों के नाम गिनाने पड़ें, तो फिर पुलिस जैसी संस्था के अस्तित्व का कोई औचित्य ही नहीं रह जाता है। सवाल कई हैं। क्यों नहीं हालात बिगडऩे की पहली आशंका के साथ ही दिल्ली में पैरा मिलेट्री फोर्स की तैनाती की गई? क्या वहां की जनता का कसूर यह था कि दिल्ली के विधानसभा चुनाव संपन्न हो चुके हैं? क्योंकि मतदान की प्रक्रिया पूरी होने से पहले तक तो तमाम विस्फोटक प्रकरणों के बावजूद दिल्ली की फिजा को बिगडऩे नहीं दिया गया। केवल चिंगारी भड़काने के लिए कच्चे माल को तैयार होता रहने के इंतजाम होने दिए गए। फिर अब ऐसा क्या हो गया है कि हालात संभाले नहीं संभल रहे हैं।

‘मैं हूं ना’ की तर्ज पर दिल्ली में घूम रहे अजीत डोभाल से पूछा जाना चाहिए कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के स्टाफ को यह भनक कैसे नहीं लगी कि देश की राजधानी में कुछ बड़ा और अप्रिय होने जा रहा है। सबसे बड़ा प्रश्न यह कि इस सबसे लाभ किसको होना है। आखिर कहां है इस मर्ज की दवा? क्या उपद्रवग्रस्त इलाकों की कमान तेलंगाना पुलिस को दे दी जाए। या फिर यह करें कि दिल्ली का मामला योगी आदित्यनाथ को सौंप दें? कुछ तो करना ही होगा। आज यह संदेश सारे देश में प्रसारित हो गया है कि कानून के खिलाफ कानून हाथ में लेने में कोई बुराई नहीं है। क्योंकि ऐसा करने पर कांग्रेस जैसा विपक्ष आपके साथ पूरी मजबूती से खड़ा होगा। यह संदेश भी जा रहा है कि कानून के समर्थन में कानून हाथ में लेने में भी कोई कष्ट नहीं होगा। वजह यह कि भाजपा आपका साथ देगी। यानी अराजक आचरण को कहीं सत्ता पाने, तो कहीं सत्ता बचाने वाली मानसिकता के आशीर्वाद का खुला साथ मिल रहा है। इस पर त्वरित और स्थायी काबू पाना आज की सबसे बड़ी जरूरत बन गई है। तभी हमारा कल सुरक्षित रह सकेगा। दिवंगत इंदिरा गांधी ने कहा था, ‘हम सुनहरे कल की ओर बढ़ रहे हैं।’ नरेंद्र मोदी ने ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ की बात कही थी। पता नहीं सुनहरे कल और अच्छे दिन की इन अवधारणाओं का मूल क्या था? अब तो इसकी गहराई में जाने के खयाल मात्र से रूह कांप रही है।

प्रकाश भटनागर

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