फिर किंगमेकर बनने की फिराक में हैं चंद्रबाबू नायडू

अखिलेश अखिल

चंद्रबाबू नायडू राजनीति के मंझे खिलाड़ी हैं। देश में अभी ऐसे बहुत कम ही नेता हैं जो नायडू जैसी राजनीतिक सूझ बूझ रखते हों। वे आगे की राजनीति को समझते हैं और राजनीतिक मौसम का भी आकलन कर लेते हैं। रामविलास पासवान को लालू प्रसाद ने मौसम विज्ञानी कहा था लेकिन नायडू ओरिजनल मौसम विज्ञानी हैं। जिस तरह से नायडू ने आंध्रा को विशेष राज्य देने की मांग कर केंद्र सरकार और एनडीए से अपने को अलग किया है वह कोई मामूली बात नहीं है।

देवगौड़ा-गुजराल के समय में नायडू केंद्र सरकार के किंग मेकर हुआ करते थे। आज जिस हालत से राजनीति गुजर रही है वैसे में उन्हें लगने लगा है कि वे फिर से ना सिर्फ किंग मेकर बन सकते हैं वल्कि पीएम की कुर्सी भी पा सकते हैं। लोक सभा चुनाव से पहले नायडू का यह पैतरा बहुत कुछ बताता दिख रहा है। उनका उठा कदम चुनावी नफ़ा नुकसान के आकलन के बाद ही संभव हुआ है। बता दें कि अभी चंद्रबाबू के पास लोकसभा में 16 सांसद हैं। हाल में कई उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा है। केंद्र में सोनिया गांधी ने मोदी सरकार को 2019 में सरकार से बाहर करने की सौंगंध ली है।

वहीं, शरद पवार फेडरल फ्रंट गठन के लिए सक्रिय हैं और उसकी बैठक में इस माह के अंत में ममता बनर्जी शामिल हो रही हैं। देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश के दो बड़े नेता अखिलेश व मायावती एक साथ आने को तैयार हैं। ये ऐसे संकेत हैं जो विपक्ष की उम्मीदों को परवान चढ़ाते हैं। इसमें कुछ वैसे दल भी हिस्सेदारी की संभावना देखते हैं जो भाजपा को लेकर हां या ना की स्थिति में हैं।

अगर 2019 में कांग्रेस की जगह फेडरल फ्रंट आकार लेकर ज्यादा सीटें हासिल करता है तो वैकल्पिक राजनीति की बात उसी के नेतृत्व में होगी और इसमें चंद्रबाबू जैसे क्षत्रपों का बड़ा रोल हो सकता है। वहीं, नरेंद्र मोदी-अमित शाह के नेतृत्व में अगर भाजपा मजबूत संख्या के साथ फिर सत्ता में लौटती है तो वहां सहयोगियों की हैसियत बहुत बड़ी नहीं होगी। नायडू के राज्य में भाजपा का प्रभाव कम है और आंध्रप्रदेश बंटवारे के फार्मूले को लेकर कांग्रेस वहां अपनी जमीन गंवा चुकी है। ऐसे में नायडू के पास यह अधिक आसान विकल्प है कि वह केंद्र में किसी के साथ चला जाये।

दिलचस्प बात यह कि जगनमाेहन के नेतृत्व वाली वाइएसआर कांग्रेस के बारे में यह कहा जा रहा था कि नायडू के भाजपा से दूर होने पर वे एनडीए में शामिल हो सकती है, लेकिन आंध्र हित के मुद्दे पर दोनों दल एकजुट नजर आ रहे हैं। बता दें कि आंध्र के मसले पर ही जगनमोहन केंद्र सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी में है जिसका समर्थन तमाम विपक्षी पार्टी कर रही है,नायडू भी। यह एक अलग तरह की राजनीति है। बता दें कि चंद्रबाबू नायडू कोई औसत राजनेता नहीं हैं और चीजों को वे औसत ढंग से न लेते हैं और न ही देखते हैं। उनकी नजर हमेशा भविष्य पर होती है। नायडू युवावस्था के शुरुआती सालों में ही युवा कांग्रेस से जुड़े थे और संजय गांधी के करीबी थे।

चित्तूर के किसान परिवार में जन्मे नायडू कांग्रेस से विधायक चुने जाते रहे, लेकिन जब फिल्म से राजनीति में आये एनटीआर यानी एनटी रामाराव ने राजनीति में कदम रखा और अपनी पार्टी बनायी तो कांग्रेस चारों खाने चित हो गयी। एनटीआर ने 1982 में तेलगू देशम पार्टी बनायी, जिसके सर्वेसर्वा आज चंद्रबाबू नायडू हैं। चंद्रबाबू नायडू 1995 में मुख्यमंत्री बने और अपनी राजनीतिक आभा के कारण उन्हें महज साल भर बाद 1996 में संयुक्त मोर्चा के संयोजक की हैसियत मिली, जिसकी केंद्र में सरकार थी और एचडी देवेगौड़ा व आइके गुजराल के रूप में दो प्रधानमंत्री मिले। उस दौरान नायडू दो-तीन वैसे नेताओं में थे जो मीडिया में सबसे ज्यादा जगह पाते थे।

चंद्रबाबू को लग रहा है कि इतिहास फिर से उसे पुकार रहा है। ऐसा हो भी सकता है। जिस तरह से बीजेपी के खिलाफ एकजुटता बढ़ती जा है उसमे नायडू अपनी महती भूमिका को देख रहे हैं।

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