फिर से जौहर ! सदियां गुजर गयी लेकिन हम नहीं बदले

अखिलेश अखिल


नई दिल्ली: संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावत’ पर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। फिल्म के विरोध में अब राजपूत महिलाएं सामने आ गई हैं। श्रीराजपूत करणी सेना के प्रमुख महिपाल मकराना ने कहा है कि 24 जनवरी को राजपूत महिलाएं चित्तौड़गढ़ में जौहर करेंगी। अभी तक जौहर के लिए 1826 महिलाएं राजी हुई हैं। ये जौहर फिल्म के विरोध में चित्तौड़गढ़ की सर्व समाज समिति और श्रीराजपूत करणी सेना कराएगी। उधर, दूसरी ओर करणी सेना ने लोगों से सिनेमाघरों पर कफ्यू लगाने को कहा है।

उन्होंने कहा कि किसी भी हाल में ये फिल्म रिलीज नहीं हो सकती। आपको बता दें कि ‘पद्मावत’ को सेंसर बोर्ड द्वारा दिए गए सर्टिफिकेट को गैर कानूनी बताने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है। इस याचिका को खारिज करते हुए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा की अध्‍यक्षता वाली तीन जजों की बैंच ने कहा, ‘अदालत, संविधान के अनुसार चलती है और हम कल ही अपने अंतरिम फैसले में यह कह चुके हैं कि राज्‍य सरकारों के पास किसी भी फिल्‍म की स्‍क्रीनिंग रोकने का अधिकार नहीं है। ‘

इसे विडंबना ही कहिये कि सदियों के बाद एक बार फिर इतहास करवट लेता दिख रहा है। हम एक ऐसे समाज का निर्माण करते जा रहे हैं जहां फिर से पुरातन संस्कृति जीवित होती दिखती है। महज सिर्फ एक फिल्म के नाम पर। जिस तरह से हमारी हजारों छत्राणी माँ -बहनो ने फिल्म पद्मावत के नाम पर अपना जौहर देने की कसम खा रही है वह किसी भी सभ्य और वैज्ञानिक समाज के लिए किसी कलंक से कम नहीं। यह लोकतंत्र के नाम पर भी धब्बा ही होगा। इस वैज्ञानिक समाज पर कलंक होगा और इस सत्ता सरकार पर कालिख पुतने जैसा ही होगा। इसलिए सबसे जरुरी है उस पद्मावत फिल्म के बारे में फिर से सोचने की।

पद्मिनी ,पद्मावती के बारे में हमारा इतिहास बड़ा ही गड मड है। जैसी की किताब पद्मावत के जरिये बहुत कुछ जान्ने की कोशिश की जाती है लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि मोहमद जायसी ने कल्पना के जरिए एक सुंदरी पर आधारित साहित्य का निर्माण किया था। हमारे देश में आज भी दिव्या सुंदरी को पद्मिनी कहा जाता है और जायसी ने भी पद्मिनी जैसी महिला का ही वर्णन किया है। खैर कथा कहानी जो भी हो लेकिन आज हमारा परम्परावादी समाज उस पद्मिनी के नाम पर मैदान में खड़ा है।

लेकिन यह भी उतना ही सच है कि राजस्थान का इतिहास हमें बहुत कुछ सिखाता है और ललकारता भी है। चित्तौड़गढ़, वह वीरभूमि है, जिसने समूचे भारत के सम्मुख शौर्य, देशभक्ति एवं बलिदान का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया। यहाँ के असंख्य राजपूत वीरों ने अपने देश तथा धर्म की रक्षा के लिए असिधारारुपी तीर्थ में स्नान किया। वहीं राजपूत वीरांगनाओं ने कई अवसर पर अपने सतीत्व की रक्षा के लिए अपने बाल-बच्चों सहित जौहर की अग्नि में प्रवेश कर आदर्श उपस्थित किये। इन स्वाभिमानी देशप्रेमी योद्धाओं से भरी पड़ी यह भूमि पूरे भारत वर्ष के लिए प्रेरणा स्रोत बनकर रह गयी है। यहाँ का कण-कण हममें देशप्रेम की लहर पैदा करता है। यहाँ की हर एक इमारतें हमें एकता का संकेत देती हैं। कहा जाता है कि पद्मावती भी अपने 16 हजार महिलाओं के साथ जौहर ले ली थी।

जौहर पुराने समय में भारत में राजपूत स्त्रियों द्वारा की जाने वाली क्रिया थी। जब युद्ध में हार निश्चित हो जाती थी तो पुरुष मृत्युपर्यन्त युद्ध हेतु तैयार होकर वीरगति प्राप्त करने निकल जाते थे तथा स्त्रियाँ जौहर कर लेती थीं अर्थात जौहर कुंड में आग लगाकर खुद भी उसमें कूद जाती थी। जौहर कर लेने का कारण युद्ध में हार होने पर शत्रु राजा द्वारा हरण किये जाने का भय होता था।जौहर क्रिया में राजपूत स्त्रियाँ जौहर कुंड को आग लगाकर उसमें स्वयं का बलिदान कर देती थी। जौहर क्रिया की सबसे अधिक घटनायें भारत पर मुगल आदि बाहरी आक्रमणकारियों के समय हुयी। ये मुस्लिम आक्रमणकारी हमला कर हराने के पश्चात स्त्रियों को लूट कर उनका शीलभंग करते थे। इसलिये स्त्रियाँ हार निश्चित होने पर जौहर ले लेती थी। इतिहास में जौहर के अनेक उदाहरण मिलते हैं।

तो अब क्या होगा ? एक ही उपाय बचता है राष्ट्रपति का निर्णय। लेकिन जो उत्तेजना दिख रही है उसका क्या किया जाय ? अगर सरकार अपनी लोकतांत्रिक जिद पर अरी रही और उधर जौहर की कहानी दुहरा दी गयी तब इस देश का क्या होगा ?

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