बच गए स्वर्णिम उन्माद से

कहते हैं झूठ के पांव और फर्जी खबरों के स्रोत नहीं होते। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा और शाहीन बाग के मशरूमी विस्तार के हल्ले के बीच जिस खबर ने समूचे भारत को गदगद कर दिया था, वह थी उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में करीब 3 हजार टन सोना मिलने की बात। एक पल को लगा कि भारत विश्व का ‘स्वर्ण गुरु’ बनने ही वाला है। बहुतों को मलाल रहा कि उनकी पैदाइश सोनभद्र में क्यों नहीं हुई? खुद सोनभद्र के रहवासी अवाक् थे कि इतना सोना उनकी धरती अपने पेट में अब तक छिपाए क्यों रही? वरना वहां चल रहे पॉवर प्लांटों की जगह न जाने कितने गोल्ड प्लांट ले लेते। लेकिन भोर के कुंवारे सपने-सी इस खबर पर दूसरे ही दिन मानो पत्थर पड़ गया। मीडिया ने जो रंग-रोगन के साथ बताया वह ‘एक्चुअल’ तो दूर ‘वर्चुअल’ भी नहीं निकला। इस पर देश में खनिज खोजने वाली सरकारी एजेंसी जीएसआई ने इस सुनहरी कढ़ी में यह कहकर काली मिर्च का तड़का लगा दिया कि 3 हजार टन सोने जैसा कुछ नहीं है, निकला भी तो 160 किलो निकलेगा। ऐसा सुनते ही उन चेहरों का रंग धूसर हो गया, जो सोना मिलने की खबर से चमक उठे थे। जिन रिपोर्टरों ने अपनी ‘खोजी’ पत्रकारिता से ताबड़तोड़ ‘बाय लाइन’ ले ली थी, वे दाएं-बाएं होते दिखे। सुनहरे आकाश में उड़ता देश फिर अपनी औकात में आ गया।

यूं अक्सर सोशल मीडिया को फर्जी खबरों की फैक्ट्री माना जाता है। लेकिन मुख्य धारा की मीडिया में भी ऐसी खबरों का उत्पादन होता है, जो केवल सनसनी फैलाने के लिए होती है। सोनभद्र में टनों सोना मिलने की खबर इसी श्रेणी की थी। लोगों ने भी तुरंत भरोसा इसलिए किया कि उत्तर प्रदेश के जिस जिले से यह स्वॢणम सूचना आई, उसका नाम ही सोनभद्र है। ‘विशेषज्ञों’ ने हमें तत्काल बताया कि प्राचीनकाल में सोनभद्र में सोने के भंडार हुआ करते थे, जिसे हम वर्तमान में भुला बैठे हैं। अब वह समय आ गया है, जब हर जिला ‘सोनभद्र’ होने वाला है। हमें यह भी समझाया गया कि अनेक सोनभद्रों के कारण ही भारत ‘सोने की चिडिय़ा’ कहलाता था।
पहले सोनभद्र की बात। सोनभद्र जिला अपने आप में विशिष्ट है। 31 साल पहले वजूद में आया यह देश का एकमात्र जिला है, जिसकी सीमाएं चार राज्यों से लगती हैं। यानी मप्र, छत्तीसगढ़, झारखंड और बिहार। लेकिन इसका जिला मुख्यालय राबट्र्सगंज (इसका नाम अभी तक नहीं बदला गया है) में है। विंध्य अंचल में आने वाला सोनभद्र जिला प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है। यहां पर देश की कई बड़ी सीमेंट फैक्ट्रियां, बिजलीघर, एल्युमिनियम कारखाने एवं रासायनिक इकाइयां स्थित हैं। सोनभद्र यूपी का दूसरा सबसे बड़ा जिला है। यहां का ‘सलखन फॉसिल पार्क’ दुनिया का सबसे पुराना जीवाश्म पार्क है, जिसे देखने दूर-दूर से लोग आते हैं।

बेशक सोने होने की खबर जिस न्यूज एजेंसी ने चलाई थी, वह काफी विश्वसनीय मानी जाती रही है। ऐसे में हलचल मचना स्वाभाविक था। भारत में खनिज खोजने वाली अधिकृत एजेंसी जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जीएसआई) के अफसर भी चौंक पड़े। उन्होंने साफ किया कि सोनभद्र में ऐसे कोई विशाल स्वर्ण भंडार नहीं मिले हैं। सोनभद्र जिले में सोना है जरूर, लेकिन ‘थोड़ा सा।’ तो फिर यह खबर चली कैसे? पड़ताल में सामने आया कि सारा खेल उत्तर प्रदेश के खनन विभाग और सोनभद्र जिला कलेक्टर के बीच हुए पत्र-व्यवहार के लीक होने से शुरू हुआ। जिसके मुताबिक, उत्तर प्रदेश के भूतत्व एवं खनिक निदेशालय (माइनिंग डायरेक्टरेट) ने 31 जनवरी, 2020 को एक पत्र लिखा था। इसमें सोनभद्र जिले के सोना पहाड़ी ब्लॉक में कुल 2943.26 टन और हरदी ब्लॉक में 646.15 किलोग्राम सोना होने की संभावना जताई गई थी। पत्र के मुताबिक, इन खनिजों के ब्लॉकों की नीलामी से पहले भूमि का चिह्नांकन किया जाना है। सोना निकालने के लिए पत्र में सात सदस्यीय टीम के गठन की भी जानकारी दी गई है। 31 जनवरी, 2020 की यह चिट्ठी 19 फरवरी को सोनभद्र की स्थानीय मीडिया के हाथ लगी, तो मानो आग लग गई। उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव मौर्य ने इसे ‘भगवान का आशीर्वाद’ बताया। महाशिवरात्रि के पहले ही लोगों की आंखों में जुगनू नाचने लगे। उधर, इस सूचना से हतप्रभ जीएसआई को बयान जारी करना पड़ा कि असलियत क्या है। जीएसआई के महानिदेशक एम. श्रीधर ने कहा कि जीएसआई की ओर से इस तरह का डाटा किसी को नहीं दिया जाता। हमने सोनभद्र जिले में इतना सोना होने का कोई अनुमान नहीं लगाया है। हम ‘राज्य यूनिट’ के साथ सर्वे करने के बाद ही किसी भी धातु के भंडार की जानकारी को साझा करते हैं। जीएसआई ने इस क्षेत्र में 20 वर्ष पूर्व खुदाई की थी, जिसे आगे की कार्रवाई के लिए डीएम से साझा किया गया था। यहां खुदाई के परिणाम बहुत उत्साहजनक नहीं थे। यह जरूर है कि सोनभद्र में स्वर्ण अयस्क मौजूद है, जिसका प्रक्रियन करने के बाद ज्यादा से ज्यादा 160 किलो सोना निकाला जा सकता है।

हम भारतीयों के लिए 160 किलो सोना भी ‘बहुत कुछ’ होता है। वैसे तो सोना शब्द भी हमें भीतर तक रोमांचित करता है। क्योंकि सोना हमारी सम्पन्नता, विश्वसनीयता और लोकाचार का अघोषित और अर्थ-व्यवहार का घोषित पैमाना है। शायद इसीलिए हम ‘सोना बरसने’ जैसा मुहावरे को हकीकत में बदलते देखना चाहते हैं। जहां तक 3 हजार टन सोना मिलने का सवाल है, तो जाहिर है इस खबर का आधार केवल अटकल थी, जिसे अटारी बनाकर पेश किया गया। किसी ने इस बारे में जीएसआई से बात करना भी जरूरी नहीं समझा। मानकर कि चिट्ठी चली है, तो सोना ही होगा। वैसे भी 3 हजार टन का आंकड़ा इतना ‘प्यारा’ है कि अगर सच में सोनभद्र में इतना सोना मिल जाए, तो भारत के सारे दरिद्र दूर हो जाएं। क्योंकि 3 हजार टन मतलब 30 लाख किलो। अगर आज के सोने के औसत भाव से इसका मूल्य निकाला जाए तो इंडिया की इकोनॉमी चट से 5 ट्रिलियन डॉलर के सपने के करीब जा बैठती। यूं हम भारतीयों के पास कितना सोना है, इसका ठीक-ठीक अंदाज किसी को नहीं है। फिर भी सीईआईसी की रिपोर्ट को मानें, तो भारत में 614 टन सोना मौजूद है। इसमें भी रिजर्व बैंक के पास 61 टन सोना सुरक्षित रखा है। सोनभद्र को अलग रखें, तो भारत में सोना उत्पादन दो राज्यों कर्नाटक और झारखंड की सोना खदानों में होता है। हालांकि यह उत्पादन हर साल घट रहा है। 2017 में देश में 1400 किलो सोना ही निकला। दूसरी तरफ सोना खपत में हम विश्व में नंबर वन है।

बहरहाल ‘सोने पे सुहागा’ यह है कि जीएसआई के स्पष्टीकरण से देश एक नए और ‘स्वॢणम उन्माद’ का शिकार होने से बच गया। हो सकता था कि कुछ अति उत्साही स्वर्ण भक्त सोनभद्र की खोज का श्रेय प्रधानमंत्री और राज्य के मुख्यमंत्री को देने से नहीं चूकते। राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी तो लखनऊ में आयोजित एक मीडिया कार्यक्रम में कह ही गए कि राममंदिर बनने का रास्ता साफ होते ही सोने का भंडार मिल गया है। इतिहास के पन्ने पलट कर हमें बताया जाता कि विदेशी आक्रांताओं, अंग्रेजों और देशद्रोहियों ने षड्यंत्र पूर्वक देश के स्वर्ण भंडारों को पीतल में तब्दील कर दिया। हमें उस पीतल को फिर से सोने में बदलना होगा। देश का ‘स्वर्ण इतिहास’ फिर से लिखना होगा..!

अजय बोकिल

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया The Lucknow Tribune के  Facebook  पेज को Like व Twitter पर Follow करना न भूलें... ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------
-------------------------------------------------------------------------------------------------------------
---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
E-Paper