बजट आ रहा है, जानिए इसके राजनीतिक रसायन शास्त्र को

अखिलेश अखिल


लखनऊ ट्रिब्यून दिल्ली ब्यूरो: फिर से देश का बजट आपके सामने आने वाला है। हर साल बजट आता है और निकल जाता है। हम सब जानते हैं कि बजट मोटे तौर पर आमदनी और खर्च का हिसाब है। लेखा जोखा है एकवर्ष का। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह शब्द आया कहां से? बजट शब्द की उत्पत्ति फ्रेंच भाषा के शब्द ‘बोजते’ से हुई है। ‘बोजते’ का मतलब होता है चमड़े की थैली। आज के परिदृश्य में आप इसे बैग समझ सकते हैं।

बहरहाल, बजट के मौजूदा स्वरूप का अगर इतिहास टटोलें, तो हम पायेंगे कि इसका सबसे पहला उल्लेख सन् 1770 के दशक में मिलता है। उन दिनों ब्रिटिश वित्तमंत्री रॉबर्ट वाॅलपोल अपनी सरकार के वित्तीय प्रस्ताव को चमड़े के बैग में रखकर ब्रिटिश संसद में लाते, और सांसदों के समक्ष इन प्रस्तावों को रखते। तब ही से बजट शब्द का प्रयोग सरकारी लेखा-जोखा के तौर पर होने लगा। इंग्लैंड के वित्त मंत्री जिस ब्रीफकेस में बजट प्रस्ताव लेकर आते हैं, उसे ‘बजट बॉक्स’ कहते हैं। यह परंपरा आज भी जारी है। यह लाल रंग का होता है। 1860 में इंग्लैंड के तत्कालीन वित्त मंत्री विलियम एवर्ट ग्लैडस्टोन ने इस परंपरा की शुरुआत की थी। कहते हैं कि कुछ अवसरों को छोड़कर 2010 तक इसी बॉक्स से बजट पेश किया गया। काफी पुराना पड़ जाने से यह बैग संग्रहालय में रख दिया गया और नया ब्रीफकेस तैयार किया गया।

भारत में बजट का इतिहास आजादी से पहले का है। गुलाम भारत में 18 फरवरी 1860 को वायसराय की परिषद में जेम्स विल्सन ने भारत का पहला बजट पेश किया था। वहीं, आजाद भारत का पहला बजट आरके शणमुगम चेट्टी ने 26 नवंबर 1947 को पेश किया था। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि भारतीय संविधान में बजट शब्द का उल्लेख कही भी नहीं है। हां, संविधान के अनुच्छेद 112 में इस बात का उल्लेख है कि सरकार हर साल आय-व्यय का एक लेखा-जोखा प्रस्तुत करेगी, जिसमें सरकार आगामी वित्तीय वर्ष में किस मद में कितना व्यय करेगी और इस व्यय को पूरा करने के लिए सरकार आय कहां से प्राप्त करेगी।

आईये ज़रा बजट की गोपनीयता के बारे में भी थोड़ी जानकारी कर लें। बजट में पेश किये जा रहे प्रस्तावों को बेहद गोपनीय माना जाता है और उन्हें छिपाकर, संभालकर रखा जाता है। वित्त मंत्री का कार्यालय, यानी दिल्ली के नॉर्थ ब्लॉक की सुरक्षा सामान्य दिनों की अपेक्षा ज्यादा कड़ी कर दी जाती है। आपको यह जान कर हैरानी होगी कि सन् 2006 से भारत की जासूसी एजेंसी आईबी के एजेंट वित्त मंत्री के कार्यालय की निगरानी करते हैं। वे लोग बजट के लिए काम कर रहे लोगों के घरों और मोबाइल फोनों को टैप करते हैं।बजट तैयार करने में लगभग एक दर्जन लोग काम करते हैं और वे लोग कहां जा रहे हैं, किससे मिल रहे हैं, क्या कर रहे हैं, हर बात पर आईबी की नजर रहती है।

यहां तक कि भारत के वित्त सचिव तक की भी निगरानी की जाती है। बजट से पहले वित्त सचिव को जेड श्रेणी की सुरक्षा उपलब्ध करायी जाती है और आईबी नजर रखती है कि उनके आसपास क्या हो रहा है। बजट निर्माण की प्रक्रिया इतनी गोपनीय रखी जाती है कि संसद में पेश होने तक इसकी किसी को भनक भी न लगे। यह गोपनीयता बरकरार रहे, यह सुनिश्चित करने के लिए वित्त मंत्रालय के नाॅर्थ ब्लाॅक स्थित दफ्तर को बजट पेश होने के कुछ दिनों पहले से एक अघोषित कैदखाने में तब्दील कर दिया जाता है।

बजट की छपाई से जुड़े कुछ कर्मचारियों को यहां पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के कड़े पहरे में दिन-रात रहना होता है। बजट के दो दिन पहले नाॅर्थ ब्लाॅक में वित्त मंत्रालय का हिस्सा तो पूरी तरह सील कर दिया जाता है। यह व्यवस्था वित्त मंत्री के बजट भाषण के पूरा होने और वित्त विधेयक के रखे जाने के बाद ही समाप्त होती है। बजट तैयार हो जाने के बाद उसे छपाई के लिए भेजा जाता है। यह बात सार्वजनिक नहीं की जाती कि बजट भाषण की छपाई कब होती है। केंद्रीय बजट की छपाई एक खास प्रेस में होती है, जो नॉर्थ ब्लॉक में मौजूद है. बेसमेंट में बनायी गयी इस खास प्रेस में आधुनिक सुविधाएं मुहैया करायी गयी हैं। बजट के छपाई के लिए जाने से लेकर बजट भाषण के पढ़े जाने तक इसे तैयार करने वाले अधिकारी लगभग कैद में रहते हैं।

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया The Lucknow Tribune के  Facebook  पेज को Like व Twitter पर Follow करना न भूलें... --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
Loading...
E-Paper