बड़ी लकीर: कालिख पर ‘नैतिकता’

दिनेश दीनू

एमजे अकबर का इस्तीफा। इसे क्या कहेंगे- ‘नैतिकता’ या ‘कालिख पर नैतिकता’। कायदे से इस्तीफा तो उसी दिन हो जाना ही चाहिए था, जिस दिन अकबर स्वदेश लौटे। तब होती नैतिकता। लेकिन अकबर ने तीन दिन लगाए इस्तीफा देने में। तब तक बवंडर आ चुका था। प्रिया रमानी के खिलाफ मानहानि का केस उन्होंने किया, तो बीस महिला पत्रकारों ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर बता दिया कि ‘हम गवाही देंगे’। देश के 92 पूर्व नौकरशाहों ने भी राष्ट्रपति को पत्र लिखकर इस प्रकरण की गंभीरता से अवगत करा दिया था।

भारतीय जनता पार्टी और मोदी-सरकार अकबर के ‘मी टू’ से घिर गई थी। राष्ट्रीय स्वयं संघ भी परेशानी महसूस करने लगा था। ऐसे में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल को लगाया कि वह अकबर से मिलकर स्थिति का आकलन करें और रिपोर्ट दें। डोभाल अकबर से 16 अक्टूबर को मिले। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को रिपोर्ट दी और अंतत: तय हुआ कि अकबर इस्तीफा दें। लेकिन तब तक नफा-नुकसान के चक्कर में मोदी-सरकार की फजीहत हो चुकी थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक टीवी इंटरव्यू में कहा था, ‘किसी पीडि़ता की जगह खुद को रख कर या उसके सगे-संबंधी बनकर सोचते हैं, तो रूह कांप जाती है। देश की कोई भी बेटी हमारी बेटी की तरह है।’ पीएम मोदी की दिल को छू लेने वाली यह सोच तार-तार हो रही थी। सोच नैतिकता के कठघरे में थी। अकबर पर कार्रवाई नहीं होती, तो यह संदेश निकलता कि 16 महिला पत्रकार क्या देश की बेटी नहीं हैं, जो एम.जे. अकबर के जिल्लत भरे कारनामों से आहत हैं। देश की आधी आबादी का सवाल भी सरकार के लिए फांस बन गया था।

अकबर ने अपने बचाव के लिए या कहिए ‘हरिश्चंद्र’ बनने के लिए कहा कि सभी महिलाएं झूठ बोल रही हैं। अपने ऊपर लगे आरोपों को चुनावी एजेंडा बताया। 97 वकीलों की फौज खड़ी करके अकबर ने सभी को डराने की कोशिश भी की। इनमें वे महिला पत्रकार भी रहीं, जो अकबर की उम्र से आधी उम्र की थीं, जिस समय उनके साथ अकबर ने यौन दुव्र्यवहार किया था। अकबर ने तो अपने मित्र की बेटी तक को नहीं छोड़ा, जिसकी उम्र घटना के समय मात्र 18 साल की थी। ऐसे में सवाल घुमडऩे लगे कि जिन महिला पत्रकारों ने खुद पर यौन उत्पीडऩ की आपबीती पीड़ा बताई है और दुनिया के सामने अपना नाम उजागर किया है, क्या उन्होंने महज एक चुनाव लडऩे के लिए ऐसा किया? ऐसी सोच पर घिन आती है।

सरकार के सामने एक स्थिति यह भी आ गई थी कि कलम ‘कैंडल मार्च’ की शक्ल लेने लगी थी। ‘खूब लड़ी मर्दानी…’ श्रृंखला की महिलाएं उठ खड़ी हुईं थीं अकबर के खिलाफ। ‘अकबर के खिलाफ’ का मतलब था सरकार के खिलाफ। स्याही विरोध का सैलाब बन रही थी। मी टू महिला पत्रकारों के समर्थन में संख्या बढऩे लगी थी। वरिष्ठ पत्रकार निधि राजदान हों या मृणाल पांडे, ‘द हिंदू’ की डिप्टी रेजिडेंट एडिटर सुहासिनी हैदर हों या लेखिका निलंजना रॉय, सब ने मोदी-सरकार पर सवाल दाग दिया। मृणाल पांडे ने तो कह दिया कि प्रिया रमानी के खिलाफ एम.जे. अकबर, उनके 97 वकील और ’56 इंच’ भी जोड़ लिया जाए, तो भी वह सवा सौ करोड़ से बहुत कम बैठता है। निलंजना रॉय ने तो एक तरह से पूछ ही लिया कि- एम.जे. अकबर का इस्तीफा न लेकर नरेंद्र मोदी सरकार ने यह साफ कर दिया है कि यौन उत्पीडऩ और कामकाजी महिलाओं की सुरक्षा को लेकर इस सरकार का रवैया क्या है?

एम.जे. अकबर की कानूनी कार्रवाई के कुछ घंटे बाद ही प्रिया रमानी ने कह दिया, ‘मैं लडऩे के लिए तैयार हूं। सच और सिर्फ सच ही मेरा बचाव है।’ प्रिया रमानी का यह कहना उन लोगों को तमाचा था, जो अकबर का बचाव कर रहे थे या उनका समर्थन कर रहे थे। राहुल गांधी ने 16 अक्टूबर को मध्यप्रदेश के मुरैना में अकबर को लेकर मोदी-सरकार को घेरा था। इसके पहले कांग्रेस ने यौन उत्पीडऩ से घिरे अपने एनएसयूआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष फिरोज खान को नमस्ते कह दिया था। मोदी-सरकार पर दबाव बढ़ता ही गया। भाजपा इस गफलत में रही कि पानी के बुलबुलों को पत्थर के ढेलों से काटा जा सकता है। यह मोदी-सरकार और भाजपा की रणनीतिक चूक थी। इस चूक से निकलने का एक ही रास्ता बचा कि अकबर का इस्तीफा हो। झूठ के पैर नहीं थे, इसलिए वह ज्यादा चल नहीं पाया।

मोदी-सरकार अकबर के इस्तीफे पर इस स्थिति में नहीं है कि कहे, उसने अकबर का इस्तीफा ले लिया। अकबर ने इस्तीफा दिया। इस्तीफे के बाद अकबर प्रकरण पर चुप लोग और खामोश हो गए हैं। पर एक बात अच्छी हुई कि जिस भाजपा के बड़े नेता कहते थे कि हमारे यहां इस्तीफा नहीं होता। ये यूपीए सरकार नहीं है, ये एनडीए सरकार है। हमारे मंत्री वह करते नहीं, जो उनके मंत्री करते थे, उस पार्टी में इस्तीफा हुआ, वह भी शर्मनाक प्रकरण पर। ‘अकबर महान’ ने मोदी-सरकार को वह आइना दे दिया है, जिसमें पार्टी और सरकार अपना अश्क नहीं देखना चाहेगी।

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