बड़ी लकीर: दरकता भरोसा

दिनेश दीनू

देश की संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और साख खत्म हो रही है मोदी-राज में, यह बात कांग्रेस और विपक्षी पार्टियों ने 26 अक्टूबर को फिर कही। राहुल गांधी की अगुवाई में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों ने दिल्ली की सड़कों पर मार्च निकालकर, प्रदर्शन करके सबका ध्यान खींचा। वास्तव में जिस तरह से मोदी-राज में संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और साख में बट्टा लगा है, वह चिंता का विषय है। पहले निर्वाचन आयोग, फिर भारतीय रिजर्व बैंक, फिर सुप्रीम कोर्ट और अब सीबीआई जैसी संवैधानिक संस्थाओं की गिरती साख क्या मोदी जी के न्यू इंडिया की तस्वीर है?

पिछले दो वर्षों में इन संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता में गहरी गिरावट दर्ज की गई है। जिस तरह से एक के बाद एक संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा पर सवाल उठ रहे हैं उससे तो यही लगता है कि चुनाव-चुनाव खेलने वाले मोदी और उनकी सरकार को इन संस्थाओं की चिंता नहीं है। यह स्थिति उन मोदी-राज में है जो यूपीए के कार्यकाल में इन स्थितियों पर मोदी चिंता प्रकट कर चुके थे। 5 जून 2013 को नरेंद्र मोदी ने एक ट्वीट किया था, जिसमें कहा गया था- ‘यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को निशाना बनाने की इच्छा के चलते केंद्र खुफिया तंत्र को कमजोर कर रहा है। सीबीआई की जो हालत मोदी-राज में हुई है उनका ही ट्वीट उनके लिए आइना है।

सुप्रीम कोर्ट के विशेषण ‘तोता’ से नवाजे जाने के बाद भी सीबीआई की साख बची हुई थी। सीबीआई जांच पर लोगों का भरोसा बना हुआ था। सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्था तक उलझे हुए मामलों की जांच सीबीआई से ही कराती रही है। लेकिन पिछले हफ्ते घटे घटनाक्रम से देशवासियों का सीबीआई पर से भरोसा टूटता साफ दिखाई पड़ रहा है।’सत्ता का तोता’ के बाद सब कुछ दबा हुआ था, पर अब देश जान चुका है कि सीबीआई सत्ता की कठपुतली रही है। भ्रष्टाचार इसके भी ‘खून’ में समा चुका है।

55 साला सीबीआई में जो कुछ हुआ है, उसका श्रीगणेश तो पिछले वर्ष उस समय हुआ जब गुजरात काडर के आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना को पीएम मोदी स्पेशल डायरेक्टर बनाकर सीबीआई मुख्यालय ले आए थे सीबीआई के डायरेक्टर आलोक वर्मा इस नियुक्ति के खिलाफ थे, क्योंकि उनकी रिपोर्ट थी कि अस्थाना का पूर्व रिकार्ड संदिग्ध है। सीबीआई-विवाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘गुड गवर्नेस’ के दावे की पोल भी खोलता है। आलोक वर्मा ने प्रधानमंत्री कार्यालय को एक पत्र लिखा था, जिसमें स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के खिलाफ 2 करोड़ की रिश्वत के मामले में चल रही जांच पूरी होने तक निलम्बित किए और उन्हें उनके मूल काडर गुजरात वापस भेजे जाने की बात थी। पर इस पत्र पर प्रधानमंत्री कार्यालय ने सक्रियता नहीं दिखाई। नतीजा आरोप-प्रत्यारोप में बदला, फिर सीबीआई और सरकार के साख पर बट्टा लगने वाली घटनाएं शुरू हो गईं।

सीबीआई में चले घटनाक्रम इस ओर भी इशारा करते हैं कि कहीं न कहीं सरकार भी डरी हुई है। वरिष्ठ पत्रकार और कभी अटल बिहारी वाजपेयी मंत्रिमंडल में रहे अरुण शौरी कहते हैं कि ये कितनी हैरानी की बात है कि जो नरेंद्र मोदी सभी को सीबीआई के डंडे से डरा रहे थे, अब खुद उसी सीबीआई से डरे हुए हैं। डरने की वजह है-उन्हें ये डर था कि सीबीआई में उनके खास आदमी राकेश अस्थाना पर अगर अधिक दबाव पड़ा, तो वह राज खोल सकते हैं। आलोक वर्मा जैसा अधिकारी राफेल पर जांच बैठा देता तो क्या होता ? क्योंकि सीबीआई के डायरेक्टर को जांच शुरू करने के लिए प्रधानमंत्री या किसी और की अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होती है।

इन्हीं ‘डरों’ का नतीजा कहा जा सकता है कि सरकार ने जिस तरह 23 अक्टूबर की रात में आलोक वर्मा को अधिकारविहीन करते हुए छुट्टी पर भेजने का फैसला किया, वह इसी चश्मे से देखा जाना चाहिए। मामला एक तरफा न लगे इसलिए राकेश अस्थाना को भी निपटाया गया। इसी रात अंतरिम डायरेक्टर के तौर पर नागेश्वर राव ने सीबीआई हेडक्वार्टर की उन मंजिलों (10वीं और 11वीं) को सील करवा दिया जिन पर आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना अपना कामकाज करते थे। | ‘डर’ की कहानी के पीछे इस बात की भी चर्चा है कि आलोक वर्मा राफेल पर जांच करने का मन बना चुके थे। संभवतः वह 24 अक्टूबर की सुबह जांच से जुड़ी फाइल पर दस्तखत करने वाले थे। इस चर्चा में जोड़ यह है कि आलोक वर्मा को यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और प्रशांत भूषण 132 पृष्ठों की रिपोर्ट सौंप चुके थे।

स्थिति यह है कि सीबीआई के ऊपर से विश्वसनीयता की वर्दी उतर चुकी है। ऐसे में क्या सरकार के पास इसकी साख बचाने के लिए कुछ बचा है? क्योंकि अधिकार विहीन नंबर एक अधिकारी का कहना है कि सीबीआई सरकार के इशारों पर काम करती है। निष्पक्षता बची ही नहीं है।

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