बदली राजनीतिक चाल

नई दिल्ली: देश की राजनीति एक बार फिर करवट ले रही है। यह करवट हिंदुत्व और मुस्लिम परक राजनीति के रूप में दिख रही है। आम तौर पर हिंदुत्व कार्ड पर आधारित रही भारतीय जनता पार्टी की राजनीति अब मुस्लिम समाज की तरफ भी झोली फैलाती नजर आ रही है। उसमें आई युगान्तरकारी इस तब्दीली को तीन तलाक और मदरसों में उच्च शिक्षा की अलख जगाने के तौर पर देखा जा रहा है। इसी क्रम में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस अपने तथाकथित मुस्लिम तुष्टीकरण के चोले से बाहर आने को छटपटाती दिख रही हैं। कांग्रेस पर, तो गुजरात में उसके मंदिर दर्शन के जरिए हिंदुत्व की बांहें थामने की मुहर भी लग चुकी है। इसी तरह की मुहर सपा और तृणमूल खुद पर लगते हुए देखना चाहती हैं। हो सकता है, ये पार्टियां ओपनली इस तब्दीली को न कबूल करें, या करें तो घुमा-फिराकर, पर इनके राजनीतिक आईने में परिवर्तनकारी सूरत ही दिख रही है। और इस परिवर्तन का ध्येय है ज्यादा से ज्यादा वोट पाना।

अपने दम पर राजनीति की कई ऊंची-ऊंची चढ़ाइयां चढ़ चुके मुलायम सिंह यादव अब सपा के जन्मदाता भर हैं। सपा की कमान अब उनके बेटे अखिलेश यादव के हाथ में है। अखिलेश पांच साल तक उत्तर प्रदेश सरकार के अगुवा रह चुके हैं। मतदाताओं के ध्रुवीकरण के दौर को इस युवा नेता ने न केवल देखा है, बल्कि उसके नफे-नुकसान को भी तौला है। इसीलिए, संभवत: उन्हें पार्टी का तथाकथित मुस्लिम परस्त राजनीतिक चेहरा असहज करता रहा है। तभी, तो उन्होंने सत्ता से वनवास के दिनों में इस लेबल से मुक्ति की राह ढूंढ़ निकाली है। हो सकता है, उन्होंने इस चेहरे से मुक्ति का ज्ञान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के गुजरात चुनाव के दौरान मंदिर-मंदिर माथा टेकने की पाठशाला से लिया हो। सबको पता है, राहुल के इस कदम ने हिंदुत्व पर सवार होकर किला दर किला जीतने वाली भाजपा को उसके गढ़ गुजरात में झकझोर कर रख दिया था।
जो भी हो, अखिलेश यादव भी हिंदुत्व कार्ड खेलने को तैयार दिख रहे हैं।

मुस्लिमों में पैठ को बेकरार भाजपा

उनके इस कार्ड के किरदार होंगे रामलीला का मंचन-गायन करने वाले कलाकार। जग जाहिर है कि दशहरा और दीपावली के अवसरों पर ग्राम्यांचलों में जगह-जगह रामलीलाएं होती हैं। अखिलेश का मानना है कि राम, लक्ष्मण, सीता आदि का वेष धर रामलीला का मंचन करने वाले कलाकारों की कोई सुधि नहीं लेता, जबकि यही कलाकार गांवों में सहज रूप से प्राचीन धार्मिक परम्पराओं को जीवित किए हुए हैं। इन कलाकारों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होती है। अभिनय के एवज में इन्हें जो मिलता है, वह न के बराबर होता है। इनकी आर्थिक मदद की जानी चाहिए, ताकि परम्पराएं जन-जन तक पहुंचती रहें। उन लोक कलाकारों की भी स्थिति सुधारनी होगी, जो अपने हुनर से लोक संस्कृति के अन्य रूपों को भी जीवित किये हुए हैं। अभी, तो सपा ने योगी आदित्यनाथ सरकार से मांग की है कि इन कलाकारों की वह सुधि ले और इनकी आर्थिक हालत के मद्देनजर उन्हें पेंशन मुहैया कराये। मौजूदा सरकार इस मांग पर अमल करती है, तो अच्छी बात है, और नहीं करती, तो सपा जब सत्ता में वापसी करेगी, तो वह रामलीला और लोक संस्कृति से जुड़े कलाकारों को पेंशन मुहैया करायेगी।

इस रणनीति के तहत, लगता है, अखिलेश ने इस वास्ते बड़ा खाका खींच रखा है। योगी सरकार सपा की मांग मान लेती है तो भी उसका मकसद पूरा हो जाएगा क्योंकि इसका श्रेय सपा कोे ही मिलेगा। बहरहाल, सपा सीधे-सीधे जय श्रीराम-जय श्रीराम करने के बजाय रामलीला में जय श्रीराम का उद्घोष करने वाले कलाकारों के जरिए गांवों में एक जाति विशेष भर ही नहीं, हिंदुओं के हर वर्ग में उतरना चाहेगी। वैसे भी, रामलीला के मंचन में किसी एक वर्ग के कलाकार नहीं होते हैं। इस तरह कलाकारों के माध्यम से सपा घर-घर में एंट्री करना चाहेगी। और जब, इन कलाकारों के जरिए उनके घरों में बतौर पेंशन कुछ धनराशि आएगी, तो वे सब सपा का जयकारा लगाने से पीछे नहीं होंगे, क्योंकि पैसा बोलता है। इस तरह से सपा प्रतिद्वंद्वी भाजपा के हिंदुत्व कार्ड में सेंधमारी, तो करेगी ही, अपने चेहरे पर अरसे से चस्पे मुस्लिम हितैषी पार्टी के लेबल को कुछ हद तक हल्का करना चाहेगी।

-हिंदुत्व के रंग में रंग रही कांग्रेस

याद करें, गुजरात में, हिंदुत्व की राह में राहुल के खुद के बीजारोपण से भाजपा सन्न रह गई थी। पहले तो भाजपा ने राहुल के पूजा-पाठ को हल्के में लिया था, पर बाद में गंभीर हो गई थी। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्ग मोदी को तीन मंदिरों की शरण में जाना पड़ा था। हालांकि मंदिर दर्शन में वह राहुल गांधी से पीछे रह गये थे। सोमनाथ मंदिर में गैर हिंदुओं के रजिस्टर पर राहुल गांधी का नाम दर्ज होने का एक मौका जरूर भाजपा के हाथ आया था, लेकिन कांग्रेस उसमें भी तब आगे निकल गई जब राहुल न केवल पक्के शिवभक्त बताये गये, बल्कि उन्हें जनेऊधारी हिंदू के तौर पर पेश किया गया। ओवरऑल, कांग्रेस ने अपने राजनीतिक चरित्र के उलट पहली बार अपने हिंदुत्वादी कदम से हिंदुत्व लहर पर सदा सवार रहने वाली भाजपा को उसे उसके ही इस रंग में रंगने नहीं दिया था।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर भी मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति के आरोप लगते रहे हैं। वह भी इस आरोप से उबरना चाह रही हैं, क्योंकि बहुसंख्यक हिंदुओं की उपेक्षा से राजनीतिज्ञों का भला नहीं होने वाला। इसी लिए, नये साल की दूसरी तारीख को बीरभूम जिले में एक मंदिर में उनके द्वारा पूजा-अर्चना करना व मकर संक्रांति पर गंगा सागर द्वीप में हिंदू श्रद्धालुओं के सैलाब के आगमन के मद्देनजर इस महापर्व की तैयारियों का जायजा लेना, इसी दिशा में देखा जा रहा है। उनके इन कदमों को, अगर हिंदू कार्ड खेलने की राजनीति से अलहदा भी कर दिया जाए, तो भी उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के हिंदुत्व की तरफ हो रहे झुकाव को नकारा नहीं जा सकता। इसका प्रमाण है जनवरी के दूसरे सप्ताह के पहले दिन बीरभूम जिले के बोलपुर कस्बे में ब्राह्मण-पुरोहित सम्मेलन का आयोजन कराना। इसका आयोजन तृणमूल कांग्रेस के बीरभूम जिले के अध्यक्ष अनुव्रत मंडल ने किया था।

-समाजवादी का उभरा राम-प्रेम

हालांकि मंडल का कहना था कि यह आयोजन इसलिए कराया, ताकि लोग हिन्दू धर्म की सही व्याख्या से परिचित हों क्योंकि भाजपा हिंदू धर्म की व्याख्या गलत तरीके से कर रही है। ऐसी स्थिति में, पश्चिम बंगाल में भगवा जमीन तैयार कर रही भाजपा सत्ताधारी तृणमूल के हिंदुत्व की तरफ उठते कदम से सावधान हो गई है। इस सिलसिले में भाजपा के प. बंगाल अध्यक्ष दिलीप घोष का बयान काबिलेगौर है। घोष कह रहे हैं कि मुस्लिम तुष्टीकरण के बाद अब ममता बनर्जी हिंदुओं को लुभाने में लगी हैं। वह भाजपा के पक्ष में हिंदुओं को इकट्ठा नहीं होने देने के लिए ही नरम हिंदुत्व अपना रही हैं।

और अब, जबकि हिंदुत्व की पक्षधर भाजपा वाकिफ हो चुकी है कि उसके हिंदुत्व कार्ड की काट में कांग्रेस लग चुकी है, और पार्टियां भी इस दिशा में कदम उठा रही हैं, तो वह इमोशन से भरपूर तीन तलाक से मुक्ति और मदरसों में भी आधुनिक शिक्षा पर जोर देते हुए मुस्लिम कार्ड का दामन कसकर थाम चुकी है। फौरन तीन तलाक पर कड़ा कानून बनाने पर आमादा मोदी सरकार की बढ़त को इसी रूप में देखा जा रहा है। इसी क्रम में मदरसे में पढ़ने वाले छात्रों को उन्नत शिक्षा दिलाने पर इसलिए फोकस किया गया है, क्योंकि तालीम का मसला भी हर घर से जुड़ा हुआ है।

बहरहाल, अयोध्या प्रकरण से मुस्लिमों की नजरों में कंकण की तरह चुभती भाजपा क्या मुस्लिम महिलाओं और बच्चों की बेहतरी की दिशा में अपने कदम बढ़ाकर मुस्लिमों का विश्वास अब जीत पाएगी, यह सवाल पहले की तरह अब भी बना हुआ है। इसी तरह के सवाल कांग्रेस, सपा और तृणमूल के सामने मुस्लिम तुष्टीकरण के उठेंगे। और हां, यदि राहुल गांधी अपने मंदिर-दर्शन के जरिए पार्टी पर मुस्लिम तुष्टिकरण की परछाईं छांट सकते हैं तो, सपा को रामलीला के कलाकारों की बांह थामने, तृणमूल को नरम रुख अख्तियार करने, तो भाजपा को मुस्लिम महिलाओं को गहरे जख्म व उनके बच्चों को उच्च शिक्षा से लबरेज करने के एवज में क्रमश: बहुसंख्यकों और अल्पसंख्यकों के दिलों में कुछ न कुछ जगह मिलने के आसार तो दिखते ही हैं।

-तृणमूल भी नहाएगी गंगा

वैसे, मुलायम सिंह यादव के परिप्रेक्ष्य में जाएं, तो पाएंगे कि वह पुण्यदायिनी गंगा जी की पवित्र धारा में डुबकी लगाते दिखते रहे हैं, लेकिन तरणी में तरने के बावजूद वह हिंदुओं के हंड्रेड परसेंट नेता का चोला नहीं धारण कर पाये। उनके इस राह में रोड़ा बतौर मुख्यमंत्री उनके कर्तव्यपालन की एक घटना निरंतर बनी हुई है। इसी लिए जब-जब गुजरे जमाने की राजनीतिक चर्चाएं होती हैं या चुनावी बिगुल बजता है, रामजन्मभूमि अयोध्या में कारसेवकों पर फायरिंग की बात ताजा हो जाती है। ऐसी स्थिति में नेता जी का और उनकी समाजवादी पार्टी का चेहरा हिंदुओं के प्रति सख्त और मुस्लिमों के प्रति हितैषीपरक बन जाता रहा है।

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया The Lucknow Tribune के  Facebook  पेज को Like व Twitter पर Follow करना न भूलें... --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
Loading...
E-Paper