बागी विधायकों के सामने ‘एक तरफ कुआ, दूसरी तरफ खाई’ के हालात

कांग्रेस से बगावत करने वाले 22 विधायकों में से 6 के इस्तीफे स्वीकार हो चुके हैं। उनके लिए चिंता की बात इसलिए नहीं हैं क्योंकि उनके इस्तीफे स्वीकार हुए हैं, उन्हें अयोग्य घोषित नहीं किया गया। इसलिए उप चुनाव में उनके टिकट लगभग पक्के हैं। शेष बचे 16 बागी विधायकों के सामने ‘एक तरफ कुआ, दूसरी तरफ खाई’ के हालात हैं। कांग्रेस की मंशा इनके इस्तीफे स्वीकार न करने की है। सरकार चाहती है कि विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव लाए और उस पर फ्लोर टेस्ट हो। बागी विधायक पार्टी व्हिप का उल्लंघन करें ताकि दलबदल कानून के तहत उनकी सदस्यता ही न जाए, वे चुनाव लड़ने से भी अयोग्य हो जाएं। इस डर ने बागी विधायकों की नींद उड़ा रखी है। एक तरफ मंत्री पद गया, दूसरा विधायकी जा रही और तीसरा यदि अयोग्य हुए तो उप चुनाव भी नहीं लड़ पाएंगे। इसी कारण वे इस्तीफा स्वीकार किए जाने पर अड़े हैं। हालात यह हैं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया का राज्यसभा जाना तय हो गया है। वे केंद्र में मंत्री भी बन जाएंगे लेकिन उनके समर्थक विधायक उलझ गए हैं।

– भाजपा को सिर्फ सरकार बनाने की चिंता
प्रदेश में जो सियासी घटनाक्रम चल रहा है, उसमें सिंधिया के राज्यसभा जाने से भले भाजपा का एक नेता रह गया लेकिन बड़े स्तर पर देखें तो भाजपा के पास खोने के लिए कुछ ज्यादा नहीं है। उसकी चिंता सिर्फ यह है कि कांग्रेस सरकार गिरे और भाजपा की बने। इसके लिए सिंधिया समर्थक 16 बागी विधायकों का सरकार के खिलाफ जाना जरूरी है। यदि किसी वजह से सरकार नहीं गिरती तब भी उसे कोई नुकसान नहीं। भाजपा के फायदे में तो यह है कि 16 बागी विधायक कांग्रेस के व्हिप का उल्लंघन करें और अयोग्य करार दिए जाएं। ऐसा होने पर भाजपा को उपचुनाव में अपने उम्मीदवार खड़े करने की राह मिल जाएगी। कमलनाथ ने ताल ठोंक रखी है कि यदि विपक्ष में हिम्मत है तो अविश्वास प्रस्ताव लेकर आए। अविश्वास प्रस्ताव आने पर यदि कमलनाथ सरकार चली गई, तब सिंधिया समर्थक कांग्रेस के बागी भी कहीं के नहीं रहेंगे।

– ‘तू डाल-डाल, मैं पात-पात’ की तर्ज पर रणनीति
कांग्रेस-भाजपा के नेताओं को मालूम है कि कौन क्या सोच रहा है। इसी कारण राजनीति की बिसात पर ‘तू डाल-डाल, मैं पात-पात’ की तर्ज पर चालें चली जा रही हैं। राज्यपाल भाजपा को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से सक्रिय हैं और मुख्यमंत्री एवं विधानसभा स्पीकर सरकार बचाने को ध्यान में रखकर काम कर रहे हैं। मामला चूंकि सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है, इसलिए पत्रों व चालों के जरिए वहां के लिए दस्तावेज तैयार किया जा रहे हैं। राज्यपाल ने अपने पत्र इसे ध्यान में रखकर लिखे और मुख्यमंत्री एवं स्पीकर ने राज्यपाल को इस रणनीति के तहत ही जवाब दिए। भाजपा और कांग्रेस सरकार सुप्रीम कोर्ट गए ही, बागी विधायकों के कुछ परिजन भी कोर्ट की शरण में चले गए। बागी विधायकों ने भी सुप्रीम कोर्ट याचिका भेजकर इस्तीफे स्वीकार करने की मांग कर डाली। लिहाजा, गेंद अब पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट के पाले में है। बुधवार को होने वाली उसकी सुनवाई पर सबकी नजर है। सबसे ज्यादा धुकधुकी में कोई है तो वह है कमलनाथ सरकार और बागी विधायक।

दिनेश निगम ‘त्यागी’

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