बिहार ने नए डीजीपी द्विवेदी पर लगे हैं भागलपुर दंगे के दाग

लखनऊ ट्रिब्यून दिल्ली ब्यूरो: बिहार के मुखिया नीतीश कुमार आखिर क्या चाह रहे हैं ,समझ से परे है। उनका समाजवाद अब कितना बचा है ,कहा नहीं जा सकता। लेकिन जिस तरीके का खेल बिहार में होता दिख रहा है उससे तो यही लगता है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समाजबाद का अंतिम जामा भी उतार कर फेंक दिए हैं।

आज बिहार से दो खबरे आयी। एक बजट से जुडी खबरे और दूसरी बिहार में नए डीजीपी की बहाली को लेकर। बिहार की विकास गाथा सुनकर देश वासियों को अच्छा लगा। देश के विकास दर से ज्यादा बिहार की विकास दर होने की बात सबको लुभा गयी। यह भी अच्छा लगा कि बिहार के किसान देश में सबसे ज्यादा सब्जियों का उत्पादन कर रहे हैं। शिक्षा से जुडी ख़बरें भी अच्छी लगी कि सरकार सूबे की सरकार शिक्षा व्यवस्था को बदलने के लिए बड़ी राशि खर्च करने जा रही है। लेकिन डीजीपी की बहाली खबर अतीत में खिंच कर ले गयी।

के. एस. द्विवेदी होंगे बिहार के नए डीजीपी। यह जाना पहचाना नाम है। द्विवेदी की कहानी भागलपुर के बदनाम दंगों से जुड़ी है। 1989 में रामशिला पूजन के बीजेपी का कार्यक्रम के दौरान हुए दंगों में 1,000 से ज्यादा लोग मारे गए थे। द्विवेदी उस समय भागलपुर के एसपी थे। इन दंगों की जांच के लिए बने न्यायिक आयोग ने अपनी रिपोर्ट में द्विवेदी को इन दंगों के लिए दोषी ठहराया था। जस्टिस प्रसाद कमीशन की रिपोर्ट में लिखा है – His communal bias was fully demonstrated, not (only) by the manner of arresting the Muslims but also by not extending adequate help to protect them.”

यानी “द्विवेदी सांप्रदायिक रूप से पक्षपात कर रहे थे। यह बात न सिर्फ मुसलमानों की गिरफ्तारी के उनके तरीकों से दिख रही थी, बल्कि वे उनकी सुरक्षा का बंदोबस्त भी नहीं कर रहे थे।” द्विवेदी ने एसपी रहने के दौरान बीजेपी के जुलूस को मुसलमान बस्तियों से गुजरने की इजाजत दी और उपद्रव होने दिया। न्यायिक आयोग की इतनी स्पष्ट रिपोर्ट के बावजूद न सिर्फ द्विवेदी की नौकरी बची रही, बल्कि अब वे बिहार में पुलिस के मुखिया भी बन गए। जबकि एक विपरीत टिप्पणी के बाद कितने अफसरों का करियर बर्बाद होते हम सबने देखा है।

लगता है नीतीश कुमार कुछ नया करने को सोच रहे हैं। नए वोट बैंक की तलाश है उन्हें। लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को वोटबैंक बनाने की मनाही नहीं है। लेकिन एक ऐसे अफसर को आगे बढ़ाने की कोशिश बहुत कुछ सोचने को बाध्य करती है। क्या द्विवेदी को डीजीपी बनाकर जदयू ब्राह्मण वोट बैंक को अपनी तरफ खींचना चाह रहे हैं ? अभी इस पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।

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