बीजेपी के आतंरिक सर्वे से पार्टी हलकान ,यूपी में भारी नुकसान की संभावना

दिल्ली ब्यूरो: बीजेपी का आतंरिक सर्वे पार्टी नेताओं को परेशान किये हुए है। पार्टी के रणनीतिकारों के पसीने छूट रहे हैं। पिछले एक महीने में भाजपा की तरफ से दो सर्वे हुए और दोनों के नतीजों ने पार्टी के पसीने छुड़ा दिए हैं। इनके मुताबिक भाजपा को सबसे ज्यादा नुकसान उत्तर प्रदेश में हो रहा है। भाजपा के एक आंतरिक सर्वे के मुताबिक यहां उसकी कम से कम तीस सीटें घट रहीं हैं। दूसरे सर्वे ने तो भाजपा की सीटें 40 के करीब घटा दी हैं। इसका मतलब यह हुआ कि भाजपा का अपना आतंरिक सर्वे ही यह बता रहा है कि इस बार भाजपा को उत्तर प्रदेश में सिर्फ तीस से चालीस सीटें ही मिल रही हैं।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की हालत कुछ खास अच्छी है. पिछली बार कांग्रेस यहां की सिर्फ दो सीटें जीती थी और इस बार वह ज्यादा से ज्यादा चार सीटें जीत सकती है। लेकिन भाजपा के दोनों ही सर्वे महागठबंधन को जबरदस्त फायदा दिखा रहे हैं. भाजपा के पहले सर्वे के मुताबिक टक्कर बराबरी की है और अखिलेश यादव और मायावती को प्रदेश की तीस सीटें मिल सकती है। दूसरे सर्वे के मुताबिक महागठबंधन इस वक्त चालीस सीटों पर आगे चल रहा है। इन सर्वेक्षणों के बाद भाजपा नेतृत्व ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी फीडबैक मंगाया और फिर इसको ध्यान में रखते हुए पूरे देश में भाजपा के सिटिंग सांसदों की टिकटें काटी गई।

भाजपा ने 11 अशोक रोड में एक वॉर रूम बनाया है. इस वॉर रूम का एक हिस्सा फीडबैक और फॉर्मूलेबाजी के लिए है। यहां भाजपा के नेता सीट बढ़ाने का हिसाब-किताब लगा रहे हैं। नई रणनीति के तहत उत्तर प्रदेश के घाटे को पश्चिम बंगाल, ओडिशा, उत्तर-पूर्व के राज्यों और दक्षिण के सहयोगियों की मदद से भरने की कोशिश की जा रही है। लेकिन नुकसान सिर्फ उत्तर प्रदेश से ही होता नहीं दिख रहा है। पिछली बार भाजपा ने गुजरात की शत-प्रतिशत सीटें जीती थी। राजस्थान की भी सभी सीटें भाजपा के पास थी। मध्य प्रदेश की भी दो सीटें छोड़ दें तो सभी सीटों पर कमल खिला था। छत्तीसगढ़ में भी एक सीट के अलावा सभी सीटों पर भाजपा के उम्मीदवार जीते थे। गुजरात की 26 में से 20 सीटें पिछली बार भाजपा के पास थीं। लेकिन इन सभी राज्यों में अब हालात पहले जैसे नहीं हैं।

इसलिए संघ के और स्थानीय इनपुट के बाद भाजपा नेतृत्व ने गुजरात जैसे राज्य में भी सिटिंग सांसदों के टिकट खूब काटे हैं। सिर्फ लालकृष्ण आडवाणी का ही नहीं, यहां के दस से ज्यादा सांसदों के टिकट कट चुके हैं लेकिन फिर भी पहले वाली बात नहीं दिख रही है। भाजपा का अपना सर्वे ही बताता है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस उससे बहुत आगे है और सिटिंग सांसदों के टिकट काट देने से स्थिति में कोई खास अंतर नहीं पड़ने वाला है मध्य प्रदेश में कांग्रेस के कमलनाथ हर सीट के हिसाब से भाजपा को हराने की रणनीति बना रहे हैं और वहां भाजपा की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं।

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कुछ पत्रकारों को बताया कि आज की तारीख में अगर ईमानदारी से बात करें तो भाजपा सिर्फ 220 से 230 सीटें जीतने की हालत में ही है। यानी कि उसे बहुमत से कम से कम 40 से 50 सीटें कम मिलने वाली हैं। सहयोगी दलों के साथ भाजपा बहुमत का आंकड़ा पार कर सकती है लेकिन पार्टी नेतृत्व हर हाल में अपने दम पर 273 के कटऑफ को पार करना चाहता है। इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियां ओडिशा, उत्तर-पूर्व, दक्षिण और पश्चिम बंगाल में ज्यादा करवाई जा रही हैं।

भाजपा के लिए सबसे बंजर जमीन आंध्र प्रदेश और तेलंगाना साबित हो रहे हैं। इन दोनों राज्यों में उसे फिलहाल एक भी सीटें मिलने की उम्मीद नहीं है। इसलिए भाजपा ने दूसरे दलों के मजबूत नेताओं को पार्टी का उम्मीदवार बनाने का फैसला किया है। केरल में भी अभी भाजपा को ज्यादा से ज्यादा एक सीट पाने की ही उम्मीद है। वहां राहुल गांधी के जाने के बाद से भाजपा के लिए हालात और बिगड़ गए हैं। अब वह अपनी रणनीति बदलकर इस चुनाव को यूडीएफ बनाम भाजपा बनाने की कोशिश कर रही है। केरल में वाम मोर्चा यानि एलडीएफ में भी मतभेद बढ़ रहा हैं जिसका फायदा कांग्रेस को मिल सकता है। सीताराम येचुरी गुट राहुल गांधी की कांग्रेस के प्रति नरम दिखता है जबकि प्रकाश करात गुट कांग्रेस को हराने में पीछे नहीं दिखना चाहता।

हालांकि तमिलनाडु में इस बार भाजपा पहले से थोड़ी ठीक हालत में है। यहां का पूरा चुनाव रेल मंत्री पीयूष गोयल देख रहे हैं। वे दिल्ली से ज्यादा वक्त तमिलनाडु में ही बिता रहे हैं. यहां भाजपा एआईएडीएमके सहित सात अन्य पार्टियों के साथ गठबंधन करके पांच सीटों पर चुनाव लड़ रही है।

पश्चिम बंगाल की बात करें तो यहां भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पूरी ताकत लगाई हुई है लेकिन नतीजा उम्मीद से कोसों दूर दिख रहा है। बंगाल की 42 सीटों में से ज्यादातर पर ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस बहुत आगे चल रही है। यहां कांग्रेस और लेफ्ट शून्य पर पहुंच सकती हैं. लेकिन भाजपा भी दस से ज्यादा सीटें जीतने की हालत में नहीं दिखाई देती। ओडिशा की 21 सीटों पर नवीन पटनायक की बीजेडी ज्यादा मजबूत दिख रही है और यहां भी भाजपा दहाई के आंकड़े से दूर है। इस तरह देश की सौ से ज्यादा ऐसी सीटें है जहां भाजपा कहीं दूर-दूर तक दिखाई तक नहीं देती। भाजपा का अपना सर्वे भी कहता है कि ओडिशा, पश्चिम बंगाल, उत्तर पूर्व और दक्षिण से अगर भाजपा को 50 सीटें ही मिली तो उसे अकेले दम पर बहुमत हासिल नहीं हो सकता। ऐसे में भाजपा इस वक्त हर दिन और हर सीट के हिसाब से अपनी रणनीति बनाने का काम कर रही है। जहां पार्टी पिछले 37 साल से कभी नहीं जीती अब उन्हीं सीटों पर उसकी सरकार बनाने की जिम्मेदारी आन पड़ी है।

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