बीजेपी को मिजोरम भी चाहिए और तेलंगाना भी

दिल्ली ब्यूरो: दिल्ली के 11 अशोक रोड से दीन दयाल उपाध्याय मार्ग तक अगर आप राजनितिक तापमान को नापने की कोशिश करेंगे तो पता चलेगा कि बीजेपी के भीतर बहुत कुछ चल रहा है। बीजेपी के कार्यकर्ताओं, कर्मचारियों, नेताओं और उनके लोगों की मनसा साफ़ झलक जाती है। बता दें कि ये दोनों जगह बीजेपी के ऑफिस हैं। दीनदयाल उपाध्याय रोड पर प्रधान कार्यालय है तो पुराने 11 अशोक रोड पर चुनावी राजनीति और कूटनीतिक केंद्र। पार्टी के वार रूम। यहां बहुत कुछ होता है लेकिन देशवासियों को केवल नेताओं के बयान ही पढ़ने देखने को मिलते हैं।

बीजेपी के इन कार्यालयों में एक ही बात पर चर्चा चलती है। बीजेपी का शासन पूरे देश में हो। चाहे जैसे भी हो। पूरे भारत पर उनकी सत्ता होने की बात समझ में आती है। देश के सभी राज्यों में भगवा ध्वज के सपने हिलोरें मारती नजर आती है। एक से बढ़कर एक बातें निकलती है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। कूटनीति और रणनीति ऐसी कि सामने वाला पानी पीने लगे। आसन्न पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव में जैसे ही हार जीत को लेकर चर्चा होती है बीजेपी के लोग मुस्कुरा उठते हैं। कहते हैं कि ” बाहर जो नौटंकी चल रही है उससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। हम सब जगह जीत रहे हैं। और खासकर जहां हमारी सरकार है वहाँ तो हम फिर आ ही रहे हैं। हमारी चिंता तो मिजोरम और तेलंगाना को लेकर है। इन दोनों राज्यों में भी हम इस बार सरकार बनाने जा रहे हैं। कोई रोकेगा क्या ? हमारे सामने कौन है ? जबतक हम पूरे देश में सरकार नहीं बना लेंगे तबतक बीजेपी का विस्तारवादी अभियान चलता रहेगा। ”

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11 अशोक रोड पर कई साथी पत्रकार मिले। कई कर्मचारी भी मिले। सबकी अपनी अपनी समझ। लेकिन विस्तारवादी राजनीति पर सब की समझ एक जैसी। पत्रकारों की समझ और नेता कर्मचारियों की समझ में कोई फर्क नहीं। एक सज्जन ने कहा कि ”हमारी बीजेपी इस बार कही कुछ लूज नहीं कर रही है। हमारी जीत हर जगह हो रही है। हम तेलंगाना में भी सरकार बनाएंगे और मिजोरम में भी। अभी तो आप देखते रहिये। हम बंगाल और ओडिशा में भी दखल रख रहे हैं। अगले चुनाव में सत्ता पलट जाएगी। पूरा देश भगवा मय हो जाएगा। ”

जहां यह ज्ञान सुनने को मिल रहा था वहाँ कोई 6 पत्रकार थे। पांच चुप थे जबकि एक हमें ज्ञान सीखा रहे थे। हमने एक परिचित पत्रकार से पूछा कि ये सज्जन कब से पार्टी के साथ है। परिचित ने बताया ”अरे भाई ये बीजेपी के नहीं है ये हमारे साथी पत्रकार ही है। और एक अखवार से उनके जुड़ने का परिचय दिया। हमने कहा कि ये तो बीजेपी प्रवक्ता की तरह बोल रहे हैं।पत्रकार साथी ने कहा कि हाँ अब ऐसा ही चल रहा है। हमें बीट मिली है तो हम पार्टी की तरफ से ही बात करते हैं। फिर सब तो ऐसा ही करते हैं। आपको कोई परेशानी ? चुपचाप वहाँ से चलने में ही भलाई समझा। नहीं चलता और कुछ बोलता तो झगड़ा जरूर होता।

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गौरतलब है कि भाजपा इस वक्त देश में सर्वाधिक राज्यों पर शासन करने वाली पार्टी है, इस लिहाज से ये विधानसभा चुनाव उसके लिए काफी अहम हैं। उसे पूर्वोत्तर में मिजोरम भी चाहिए और दक्षिण में तेलंगाना भी। इसके अलावा राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में अपनी सत्ता भी बचानी है।राजस्थान में तो पांच सालों की ही सरकार है., लेकिन मप्र और छग में 15 बरसों की सत्ता का सवाल है। वैसे इन तीनों राज्यों में एंटी इन्कमबेन्सी फैक्टर जोर पकड़ रहा है, ऐसी खबरें हैं। इन हालात में कांग्रेस के लिए चुनावी बाजी बहुत आसान होनी चाहिए थी, बिल्कुल थाली में परोसी हुई। लेकिन ऐसा नजर नहीं आ रहा है। ये विधानसभा चुनाव और किसी के लिए सेमीफाइनल हों न हों, राहुल गांधी के लिए सचमुच प्रतिष्ठा का सवाल बन गए हैं। उनके नेतृत्व में बीते समय में जितने भी चुनाव लड़े गए, उसमें केवल पंजाब में कांग्रेस को जीत हासिल हुई, और कर्नाटक में जेडीएस के साथ गठबंधन के बाद सरकार बनाने का मौका मिला। गुजरात में हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठकोर के साथ के बावजूद कांग्रेस नहीं जीत पाई।

गोवा में जीती बाजी उसने हार दी और अब दोबारा मौका मिला, तब भी अमित शाह की चाल के आगे उसने घुटने टेक दिए। बिहार में भी नीतीश कुमार के पलटी मारने के कारण वह सत्ता से बाहर हो गई। अब राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में राहुल गांधी चुनाव प्रचार के लिए जी जान लगा रहे हैं। लेकिन क्या केवल दिन-रात प्रचार करने से जीत हासिल होगी, या उसके लिए सही रणनीति और सही लोगों का साथ भी जरूरी है, इस पर राहुल गांधी विचार करेंगे? राजस्थान में वसुंधरा राजे के खिलाफ माहौल को कांग्रेस भुनाने में लगी है।लेकिन अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच क्या सब ठीक है? क्या सीपी जोशी और मोहन प्रकाश जैसे दिग्गज कांग्रेसी अपनी उपेक्षा को शांति से बर्दाश्त करेंगे? उधर मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस की भीतरी खींचतान विरोधियों से छिपी नहीं है।

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मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह न चुनावी पोस्टरों में हैं, न सभाओं में। उनका एक बयान भी सामने आया कि उनके भाषण देने से कांग्रेस के वोट कटते हैं। अब यह उनका दर्द है या चेतावनी, यह राहुल गांधी को समझना होगा। कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच संतुलन बिठाना भी बड़ी चुनौती है। और आपस की इस लड़ाई से कांग्रेस निबटे तो फिर भाजपा सरकार को घेरने की तैयारी करे। बीते बरसों में व्यापमं घोटाला एक बड़ा मुद्दा बन सकता था। लेकिन कांग्रेस इसे चुनाव में हार-जीत तय करने वाला फैक्टर नहीं बना पाई।

छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस अंदरूनी खींचतान का शिकार है। नया प्रदेश बना, तब अजीत जोगी ने सत्ता संभाली। उसके बाद कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और अब अजीत जोगी भी कांग्रेस के प्रतिद्वंद्वी हैं। उनके साथ मायावती भी आ गई हैं। लिहाजा कांग्रेस के सामने भाजपा और अजीत जोगी, दोनों से मुकाबले की चुनौती है। राजनीति में ऐसी चुनौतियां आती ही हैं, लेकिन इसका मुकाबला करने के लिए इन चुनौतियों से बड़ा काम करके दिखाने की जरूरत होती है। कांग्रेस के पास फिलहाल ऐसी कोई उपलब्धि नहीं है।

राहुल गांधी हर रैली में राफेल , नीरव मोदी, नोटबंदी जैसी बातें करते हैं, लेकिन ये विधानसभा से ज्यादा आम चुनावों के मुद्दे हैं। और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी या भाजपा की कमियां गिनाने से बेहतर होता, कांग्रेस अपना भावी कार्यक्रम यथार्थ की धरातल पर पेश करती। और यह केवल घोषणापत्र से पेश नहीं किया जा सकता। उसके लिए जनता के बीच लगातार पैठ बनानी पड़ती है। बीते 15 बरसों में तो कांग्रेस ऐसा कुछ कर नहीं पाई, अब एकाध महीने में क्या कमाल वह करती है, यह देखना दिलचस्प होगा।

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उधर दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर स्थित पांच सितारा होटल नुमा बीजेपी का दफ्तर जगमगा रहा है। यहां कितने लोग आते हैं और जाते हैं कौन बताये। कोई बोलता ही नहीं। कोई सुनता भी नहीं। जिससे बात करो वह गुमान से भरा हुआ। दर्प से चमकता हुआ। याना खुदरिया नेताओं को बोलने की मनाही है और कर्मचारी जो बहुत कुछ जानते हैं उनकी बोलने की इजाजत नहीं। कई राज कई कर्मचारियों के सीने में बंद हैं लेकिन उन्हें उगलते बनता नहीं। पता नहीं कहीं पोल ना खुल जाए। दो सज्जन मिले। चाय पर बात हुयी। पुराने लोग थे। बहुत कुछ पूछा तो बोले देखिये आप लोग अपना आंकड़ा लगाते रहिये। यहां तो हम सब नए राज्यों में सरकार बनाने की पूरी तैयारी कर रखी है। पूछा कहाँ और कैसे ?

जबाब मिला -कांग्रेस को देख रहे हैं। उसके पास कहने को कुछ भी नहीं। राहुल जो बोल रहे हैं लोग सुनते नहीं। और चुनाव भाषण से नहीं कोई जीत सकता। मोदी जी भाषण से जीते थे अब उनकी दूसरी रणनीति है। आप समझ रहे हैं ? हमने कहा नहीं समझे। सज्जन बोले -तब क्या लिखते पढ़ते हैं। देखिये हम लोग इस बार तेलंगाना और मिजोरम में सरकार बनाएंगे और जब किसी भी पार्टी के पास चुनाव के लिए पैसे ही नहीं है तब हमारा मुकाबला कौन करेगा भाई जी। और अब आगे नहीं बोलेंगे। थोड़ा पढ़िए तब समझियेगा।

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