‘बुआ-भतीजा’ की जोड़ी से ध्वस्त हुए ‘भगवा’ किले

गोरखपुर/फूलपुर: इसे कहते हैं ‘जंग जीतने के लिए सभी कदम चले जाते हैं।’ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का ‘भगवा’ किला ध्वस्त करने लिए बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) अपनी 23 साल पुरानी दुश्मनी भूल गए और जहां गोरखपुर में 28 साल पुराना गोरक्षपीठ का ‘मठ’ ध्वस्त कर दिया, वहींफूलपुर मेंआजादी के बाद पहली बार खिला ‘कमल’ महज चार साल में ही मुरझा गया है।

साल 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंश के बाद उपजे ‘राम लहर’ को रोंकने के लिए बसपा संस्थापक कांशीराम और सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने गलबहियां डाल कर ‘मिले मुलायम-कांशीराम, हवा उड़ गए जय श्रीराम’ का नारा दिया और राम लहर में विराम लगा दिया था। लेकिन दो जून 1995 का स्टेट गेस्ट हाउस कांड़ ने मुलायम और मायावती के बीच ऐसी खाई बनाई कि उसका सीधा फायदा राजनीतिक वनवास झेल रही भाजपा को मिला और अप्रत्याशित तौर पर 2014 के लोकसभा चुनाव में 80 में से 73 सीटे भाजपा जीती ही नहीं, बल्कि 2017 के विधानसभा चुनाव में भी ‘अच्छे दिन’ का लालच देकर प्रचंड़ बहुमत से सूबे में सरकार भी बना ली। लेकिन, शायद भाजपा को यह आभास नहीं रहा होगा कि जूठ का ‘जुमला’ ज्यादा दिन तक चलने वाला नहीं है और गोरखपुर व फूलपुर लोकसभा उपचुनाव इसी की बानगी है।

बसपा के समर्थन से गोरखपुर और फूलपुर की सीट जीतने के बाद सपा प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बुधवार को कहा था कि ‘यह सामाजिक न्याय की जीत है।’ उन्होंने बसपा सुप्रीमों मायावती के सरकारी आवास 13 ए माल एवेन्यू में जाकर तकरीबन 40 मिनट की मुलाकात में बसपा द्वारा समर्थन दिए जाने पर आभार भी जताया था।

मायावती के सरकारी घर में रह रहे उनके खासमखास अमरनाथ भाष्कर (बांदा वाले)ने गुरुवार को बताया कि ‘दो पूर्व मुख्यमंत्रियों की मुलाकात कराने में बिल्डर और सपा के राज्यसभा सांसद संजय सेठ ने अहम भूमिका अदा की है, सेठ ने बहन जी का भी बंगला बनाया है। करीब चालीस मिनट की मुलाकात में अखिलेश और बहन जी की क्या बात हुई, यह तो नहीं बता सकते। लेकिन, अखिलेश जब बाहर निकले तो उनका चेहरा खुशी से लबरेज था।’ उन्होंने बताया कि ‘बहुजन नायक कांशीराम की जयंती में बहन जी इस समय चंड़ीगढ़ में है।अगर आगामी लोकसभा चुनाव में ‘बुआ-भतीजा’ की जोड़ी बरकरार रही तो भाजपा किसी लायक नहीं बचेगी।’

राजनीतिक विश्लेषक रणवीर सिंह चैहान का कहना है कि ‘मायावती में अब भी दलित मत स्थानांरित करने की कूबत है, भाजपा को ऐसा भरोसा ही नहीं था। सच तो यह है कि सपा दोनों सीटें बसपा की बदौलत जीती है, वरना कांग्रेस तो नाव मझधार में डुबो देती।’ उन्होंने कहा कि ‘विपक्षी दलों का भविष्य के महागठबंधन का यह एक रिहर्सल मात्र था, यदि यह जोड़ी सलामत रही तो 2019 के लोकसभा चुनाव में देश की दिशा बदल जाएगी और बुआ-भतीजा मिलकर भगवा को उबरने नहीं देंगे।’

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