बूढ़े अन्ना के ‘करो या मरो’ से नारे से घबराहट क्यों है?

अजय बोकिल

‘करो या मरो’ का नारा इस देश में नया नहीं है, लेकिन ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के 76 साल बाद भी अगर इस नारे की अहमियत बनी हुई है तो समझा जा सकता है कि देश किन स्थितियों में जी रहा है। क्योंकि गांधीवादी अन्ना हजारे फिर इसी नारे की ध्वजा हाथ में लेकर 23 मार्च से दिल्ली के रामलीला मैदान पर आंदोलन शुरू  करने जा रहे हैं। सीक्वल के जमाने में इसे ‘अन्ना मूवमेंट पार्ट-टू’ भी कह सकते हैं। 2011 में अन्ना के आंदोलन ने तत्कालीन यूपीए सरकार को हिला दिया और पूरे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ हवा बह निकली थी।

दुर्भाग्य से अन्ना अभी भी लगभग उन्हीं मांगों लेकर अपना बुढ़ापा दांव पर लगा रहे हैं। क्योंकि सत्ता बदली लेकिन व्यवस्था सुधरने की बजाए और बड़ी फांस में बदल गई। अन्ना की  मुख्य मांग देश में जनलोकपाल व राज्यों में सशक्त लोकायुक्तों की नियुक्ति, किसानों की आर्थिक सामाजिक दशा में आमूल परिवर्तन, कृषि मूल्य आयोग और चुनाव अायोग को पूर्ण को स्वायत्तता देने आदि की है। शुरूआती आनाकानी के बाद सरकार ने अन्ना को रामलीला मैदान पर आंदोलन की अनुमति दे दी है। यह कब तक चलेगा,यह अभी तय नहीं है। उधर देश भर से किसानों के जत्थे अन्ना के समर्थन के लिए दिल्ली कूच करने लगे हैं। हालांकि मीडिया में अन्ना के आंदोलन को वैसा कवरेज नहीं मिल रहा है या नहीं दिया जा रहा है, जैसा 2011 के आंदोलन के समय मिला था। लेकिन इससे अन्ना के हौसले कम नहीं हुए हैं। तब और अब में बेसिक फर्क यह है कि तब केन्द्र में कम बोलने वाली मनमोहन सरकार थी तो अब बोलते रहने वाली मोदी सरकार है।

राजनीतिक परिदृश्य बदला है, लेकिन देश के आर्थिक सामाजिक हालात कमोबेश वैसे ही हैं। अपेक्षाअो का आसमान और ऊंचा हुआ है तो जमीनी हकीकत और धुंधला गई है। अन्ना की तकलीफ यह है कि विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने जनलोकपाल का समर्थन किया था, लेकिन सत्ता में आते ही उसका मन बदल गया। भ्रष्टाचार का यह एंटी वायरस उसे अपने ही खिलाफ लगने लगा। अन्ना सोचते रहे कि ‘न खाऊंगा’ के आगे की स्टेप में ‘किसी के खाने पर कड़ी नजर’ रखने वाला स्तम्भ भी लोकतंत्र की छत को सम्हालने के लिए खड़ा होगा। लेकिन मोदी सरकार तकनीकी कारणों से इस लोकपाल को द्वारपाल की जगह भी नहीं दे पा रही। अन्ना की पीड़ा यह भी है कि तमाम सरकारी दावों के बाद भी देश में न तो किसानों की माली हालत सुधर रही है और न ही किसानों की आत्महत्याएं रूक रही हैं।

अपने आंदोलन की ‘मजबूरी’ को अन्ना ने कुछ दिन पहले जम्मू में हुई उनकी रैली में स्पष्ट किया था। बोले कि मैं तीन साल से अच्छे दिन आने की आस लगाए हुए था। लेकिन उनका कहीं अता-पता नहीं है। काला धन बाहर लाने की बात हुई। लेकिन कुछ नहीं हुआ। सवाल यह है कि क्या ‘अन्ना पार्ट-टू’ फिल्म चलेगी या बुरी तरह पिटेगी? क्या अन्ना मनमोहन सरकार की तरह मोदी सरकार को झुका पाएंगे या खुद ही बोरिया-बिस्तर समेट कर घर जाने पर मजबूर होंगे? कारण एक मुहिम यह भी चल रही है कि अन्ना अब एक फुंके हुए बल्ब हैं। उनके ज्यादातर संगी-साथी राज महलों में जा बसे हैं। अन्ना की कुटिया में अब कोई लौटना नहीं चाहता। मीडिया भी अन्ना से सुरक्षित दूरी बनाए है। प्रचार ही न होगा तो वो मोमेंटम कैसे बनेगा, जो 2011 में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में बना था। अांदोलन अन्ना की खुजाल है, उन्हें पूरी कर लेने दो। यूं देश अच्छे दिनों को महसूस कर रहा है, लेकिन अन्ना के पास ऐसा नया चश्मा नहीं है तो सरकार इसमें क्या कर सकती है?

मगर बात इतनी सपाट नहीं है। अन्ना को इस आंदोलन से रोकने की कोशिशें आखिरी दम तक हुईं। महाराष्ट्र के वरिष्ठ मंत्री गिरीश महाजन को इस काम पर लगाया गया था। वो दो-तीन बार रालेगण सिद्दी गए। उन्होने सेहत और उम्र का हवाला देकर अन्ना से बार- बार गुजारिश की कि वे अपना आंदोलन स्थगित कर दें। लेकिन अन्ना ने उन्हें उलटे पैरों लौटा दिया। उनका सर्वाधिक गुस्सा इस बात को लेकर है कि उन्होंने लोकपाल और अन्य मुद्दों को लेकर प्रधान सेवक नरेन्द्र मोदी को 40 चिट्ठियां लिखीं, लेकिन एक जवाब तक नहीं आया। यहां तक कि दिल्ली में आंदोलन की परमिशन भी बड़ी मुश्किल से उन्हें ऐन वक्त पर मिली।

मुद्दा यह है कि अगर इक्यासी साल के अन्ना में अब कोई दम नहीं बचा तो सरकार उनके आंदोलन से इतनी सहमी हुई क्यों है? एक स्पष्ट बहुमत वाली सरकार का दुबले-पतले अन्ना क्या बिगाड़ लेंगे? अहंकार में लिपटा यह तर्क सतही तौर पर जंचता भी है। क्योंकि ऐसी लड़ाई के लिए जैसी स्वत:स्फूर्त और प्रतिबद्ध फौज की जरूरत होती है, वैसी अब अन्ना के पास कहां है? अन्ना ये मुददे तो बरसों से उठाते रहे हैं। राजनीतिक दलों ने इनका समर्थन या विरोध अपनी सुविधा से किया। आगे भी यही होगा। लेकिन यह भी याद रखें कि बुनियादी मुद्दे उन गरम कपड़ों की तरह होते हैं, जो साल के बाकी दिनों में भले संदूक में बंद रहें, चुनावों की सर्दियों में निकलते हैं तो फिर निकलते ही जाते हैं। पिछले आंदोलन के समय भी अन्ना को हल्के में ही लिया गया था। लेकिन देश का नौजवान बदलाव की आस में स्वप्रेरणा से अन्ना के पीछे खड़ा हो गया था। उन्होंने जो चिंगारी सुलगाई वह धीरे धीरे फैलकर बड़े राजनीतिक परिवर्तन का कारण बनी। उनकी बनाई जमीन पर दूसरों ने जुताई  की।

अन्ना के आंदोलन से उठी लहरें ही पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी के तूफान में बदलीं। दिल्ली में आम आदमी पार्टी वजूद में आई और उसने देश की राजधानी में ही शक्तिशाली भाजपा को धूल चटा दी। दिल के कोने में खुटका इसी बात का है कि अन्ना का यह अलाव कहीं जंगल की आग में तब्दील न हो जाए। यदि नाराज किसान अराजनीतिक अन्ना के साथ सचमुच खड़े होने लगे तो मेहनत से खड़ी की गई वोटों की फसल पर अन्नदाता के गुस्से का ट्रैक्टर घूम जाएगा। तब क्या करेंगे? यूं भी कर्ज में डूबा किसान अगर हकीकत में ‘करो या मरो’ पर उतर आया तो फिर करने के लिए शायद ही कुछ बचे, सिवाय राजनीतिक मरण के।

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