बड़े काम के ‘कड़कनाथ’, स्वाद लाजवाब और औषधीय गुणों की खान

स्वाद में लजीज और अपने आप में औषधीय गुणों से परिपूर्ण कड़कनाथ मुर्गा अब जंगली क्षेत्रों से निकलकर देश-विदेश में लोगों की पसंद बनने लगा है। मांसाहार के शौकीन लोगों के लिए यह सबसे पसंदीदा चिकन बनता जा रहा है। यही वजह है कि स्टार होटलों में भी इसकी खपत दिनों-दिन बढ़ रही है। एक समय कड़कनाथ केवल मध्यप्रदेश के झाबुआ इलाके में पाया जाता था लेकिन अब छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र इसके उत्पादन में अग्रणी बन चुका है। हालांकि इसकी बढ़ती लोकप्रियता के कारण देश के कई हिस्सों में इसे पाला जा रहा है| इस विशेष प्रजाति के मुर्गे पर कई संस्थान आज अनुसंधान कर रहे हैं, जिसमें भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर मुंबई जैसे संस्थान भी शामिल हैं।

रायपुर स्थित इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय द्वारा कांकेर जिले में संचालित कृषि विज्ञान केन्द्र में पिछले करीब पांच वर्षों से कड़कनाथ प्रजाति के मुर्गे-मुर्गियों के प्राकृतिक प्रजनन एवं कृत्रिम हैचिंग का कार्य किया जा रहा है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एसके पाटिल बताते हैं कि यह स्पेशल ब्रीड है। रेगुलर चिकन की अपेक्षा इसमें कम चर्बी होती है। प्रोटीन और ऑयरन की अधिकता के कारण भी यह न्यूटीबर्ड बेस्ड माना गया है। बॉयलर चिकन की तुलना में इनमें बीमारी भी कम होती है। वर्तमान में कांकेर, दंतेवाड़ा और जगदलपुर में भी इसका उत्पादन किया जा रहा है। अकेले कांकेर में ही कड़कनाथ के हर माह दस हजार से अधिक चूजे तैयार किए जा रहे हैं। गौरतलब है कि कड़कनाथ का वजन आम मुर्गे से तीन गुना अधिक होता है। इसका खून व मांस दोनों काला होता है। कुलपति के मुताबिक कड़कनाथ प्रजाति के मुर्गे की प्रोसेसिंग व उत्पादन बढ़ाने के लिए भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर मुंबई को 25 कड़कनाथ भेजे गए हैं। रिसर्च सेंटर से सूप, मांस के क्यूब्स आदि तैयार करने की विधि सुझाने को कहा गया है। उन्हें उम्मीद है कि यह रिपोर्ट मिलने के बाद इस दिशा में और तेजी से काम हो सकेगा।

कुलपति पाटिल बताते हैं कि कड़कनाथ प्रजाति की मुर्गी अंडा देती है पर इसका सेचन नहीं करती। इसके चलते अंडा के सेचन के लिए विशेष उष्मा यंत्र (इन्क्यूबेटर) का उपयोग किया जाता है, जिसे तैयार करने में करीब एक लाख रुपये की लागत बैठती है। कृषि विश्वविद्यालय की ओर से करीब 30 हजार रुपये में ही इन्क्यूबेटर (उष्मा यंत्र) तैयार करने की दिशा में काम चल रहा है। कड़कनाथ की बढ़ती मांग को देखते इसे ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक आय का एक प्रमुख स्रोत बनाया जा सकता है।

कांकेर स्थित कृषि विज्ञान केन्द्र के प्रभारी डॉ. बीरबल साहू कई वर्षों से कड़कनाथ प्रजाति के मुर्गों पर अनुसंधान कर रहे हैं। उनके अनुसार कड़कनाथ मुर्गी-मुर्गों में अन्य पक्षी वर्ग की अपेक्षा अधिक औषधीय गुण पाए जाते हैं। इनमें प्रोटीन की मात्रा 44 प्रतिशत होती है, जबकि अन्य पक्षियों में 18 से 20 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है। कड़कनाथ के मांस में वसा की मात्रा 1.94 प्रतिशत से 2.6 प्रतिशत और अन्य पक्षियों में 13 से 25 प्रतिशत होती है। कोलेस्ट्रॉल की मात्रा अन्य पक्षियों के 100 ग्राम मांस में 218.12 मिलीग्राम ग्राम होती है, जबकि कड़कनाथ के 100 ग्राम मांस में मात्र 59-60 मिलीग्राम कोलेट्रॉल पाया जाता है। केंद्रीय खाद्य परीक्षण एवं अनुसंधान संस्थान मैसूर ने भी कड़कनाथ पर एक शोध किया था। जिसके अनुसार कड़कनाथ पक्षी का मांस स्वादिष्ट होने के साथ आसानी से पचने वाला होता है। कड़कनाथ नस्ल के मुर्गों में अनेक गुणों के साथ रोग प्रतिरोधक क्षमता अन्य पक्षियों की अपेक्षा अधिक होती है। डॉ.साहू के मुताबिक बस्तर अंचल की जलवायु कड़कनाथ के लिए उपयुक्त है और यही वजह है कि पिछले पांच साल में ही बस्तर संभाग में कड़कनाथ का रिकार्ड उत्पादन हो रहा है।

कड़कनाथ मुर्गे की अच्छी कीमत और बढ़ती मांग को देखते हुए सरकार ने भी इसके पालन को बढ़ावा देने के लिए कड़कनाथ योजना शुरू की है। कृषि विभाग के अधिकारी बताते हैं कि कड़कनाथ या कालामांसी मुर्गे-मुर्गियां पालने के लिए सरकार ने विशेष योजना तैयार की है जिसके तहत हितग्राहियों को 50 से 90 प्रतिशत तक अनुदान भी दिया जा रहा है। इसमें शेड के साथ प्रारंभिक स्तर पर आहार, दवा, बर्तन आदि शामिल हैं। इसके अलावा यह व्यवसाय शुरू करने के इच्छुक लोगों को नि:शुल्क प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। बस्तर के किरंदुल-बचेली क्षेत्र के किसानों का समूह बनाकर उन्हें कड़कनाथ के पालन के साथ-साथ इसके विपणन की योजना पर कार्य चल रहा है। इसके लिए माइनिंग क्षेत्र के इच्छुक लोगों का चयन किया जा रहा है।

नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले के गीदम ब्लॉक के ग्राम हीरानार में महिला स्व सहायता समूहों के जरिए कड़कनाथ के 10 पोल्ट्री फार्म यूनिट को तैयार की गई है। इनमें करीब 100 महिलाओं का समूह प्रशासन से अनुदान लेकर कड़कनाथ कुक्कुट पालन कर रहा है। इसके अलावा हीरानार क्षेत्र में 21 महिला स्व-सहायता समूह इस व्यवसाय से जुड़कर आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में अग्रसर हैं। कड़कनाथ मुर्गा से होने वाले फायदे को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि भविष्य में यह व्यवसाय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया The Lucknow Tribune के  Facebook  पेज को Like व Twitter पर Follow करना न भूलें... ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
E-Paper