भाजपा के नरेन्द्र सिंह तोमर की राह के कांटे चुन रहीं बहनजी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भरोसे पर पूरी तरह से खरे उतरने वाले केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की ग्वालियर से लोकसभा में पहुंचने की राह आसान नहीं थी, इस कारण तोमर वापस अपने पुराने निर्वाचन क्षेत्र मुरैना में लौटकर इस उम्मीद में आये कि लोकसभा की राह यहां से उनके लिए आसान रहेगी। जातिगत समीकरणों को देखते हुए भी ग्वालियर की तुलना में मुरैना लोकसभा क्षेत्र तोमर के लिए अधिक मुफीद माना जाता है। 2009 में जब लम्बे अंतराल के बाद मुरैना सामान्य वर्ग के लिए हो गया तब यहां से नरेंद्र सिंह तोमर ने चुनाव लड़ा और लोकसभा सदस्य चुने गये। बाद में वे 2014 में ग्वालियर लौट आये। 2018 के विधानसभा चुनाव में ग्वालियर और मुरैना भाजपा के लिए आसान सीटें नहीं बची क्योंकि दोनों पर कांग्रेस की मजबूत पकड़ बन गयी। तोमर ने फिर से मुरैना से चुनाव लड़ना पसंद किया और अब लोकसभा चुनाव में उनका कांग्रेस के रामनिवास रावत से मुकाबला है। यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां उत्तरप्रदेश व राजस्थान की सीमा से लगा होने के कारण बहुजन समाज पार्टी का भी इस क्षेत्र में प्रभाव है तथा चुनाव नतीजों को बसपा एक सीमा तक प्रभावित करती रही है। बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो बहन मायावती ने अपने पूर्व घोषित उम्मीदवार डॉ. रामलखन सिंह कुशवाह को बदल कर अब उत्तर प्रदेश के खतौली से विधायक रहे करतार सिंह भडाना को पार्टी का टिकट दे दिया है। इस प्रकार कुशवाह को चुनाव मैदान से हटाकर बसपा ने नरेंद्र सिंह तोमर की राह काफी आसान कर दी है क्योंकि अब ठाकुर मतदाताओं में बिखराव की संभावनायें धूमिल हो गयी हैं।

कांग्रेस ने रामनिवास रावत को लोकसभा के लिए अपना उम्मीदवार बनाया है जबकि 2018 के विधानसभा चुनाव में रावत भाजपा के सीताराम आदिवासी से चुनाव हार गए थे। इनके अलावा इस क्षेत्र के अंतर्गत पड़ने वाले सात विधानसभा क्षेत्रों पर कांग्रेस ने ही 2018 के विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज कराई थी। रावत विधानसभा में जुझारु विधायक रहे और कांग्रेस सरकार में राज्यमंत्री भी रह चुके हैं तथा उन्हें ज्योतिरादित्य सिंधिया का भरोसेमंद माना जाता है। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में पराजय के बाद भी उन पर दांव लगाना पसंद किया क्योंकि उसे रावत में ही एक जिताऊ चेहरा नजर आया। रावत की राह उस समय कुछ आसान नजर आ रही थी जबकि कुशवाह बसपा प्रत्याशी घोषित हुए थे। यह क्षेत्र चूंकि उत्तरप्रदेश से लगा हुआ है इसलिए यहां समाजवादियों का भी प्रभाव रहा है, कुशवाह स्वयं भी पूर्व समाजवादी पृष्ठभूमि के हैं और वे ठाकुर मतदाताओं में जितनी सेंध लगाते उतना ही तोमर की राह कांटों से भरी हो जाती। प्रत्याशी बदलकर बसपा सुप्रीमो मायावती ने तोमर की राह के कांटों को एक प्रकार से छांटने का ही काम किया है।

बसपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और मध्यप्रदेश प्रभारी रामजी गौतम ने कार्यकर्ताओं के बीच सफाई दी कि भाजपा ने नरेंद्र सिंह तोमर को चुनाव मैदान में उतारा है इसलिए कुशवाह ने स्वयं टिकट बदलने का मायावती से आग्रह किया था, उनका कहना था कि एक सीट पर दो ठाकुर लड़ने से पार्टी को नुकसान होगा। इस क्षेत्र में गूजर मतदाताओं की संख्या भी काफी है और अब बसपा के करतार सिंह भडाना जितने गूजर मतदाताओं को अपने पक्ष में कर लेंगे उतना ही कांग्रेस का पलड़ा कमजोर होता जाएगा। भडाना गूजर समुदाय से आते हैं वे उत्तरप्रदेश में गूजरों के एक बड़े नेता हैं। इस क्षेत्र में चुनावी मुकाबला तो त्रिकोणीय होगा लेकिन पहले जो त्रिकोण बन रहा था वह तोमर के मतों में सेंध लगाता, अब जो त्रिकोण बनेगा वह कांग्रेस के मतों में सेंध लगाएगा। मुरैना लोकसभा क्षेत्र में श्योपुर जिला भी लगता है और रावत इसी जिले के हैं। यह एक संयोग ही है कि 2009 के लोकसभा चुनाव में तोमर और रावत का ही मुकाबला हुआ था और तोमर ने उन्हें एक लाख से अधिक वोटों के अन्तर से पराजित किया था। 2009 के चुनाव में नरेंद्र सिंह तोमर को 53.61 प्रतिशत मत मिले थे जबकि रावत को 28.09 प्रतिशत ही मत मिल पाये थे, बसपा के बलवीर सिंह को 19.99 प्रतिशत मत मिले, हालांकि अब कुछ समय पूर्व बलवीर सिंह भी कांग्रेस में शामिल हो गए हैं, लेकिन देखने की बात यही होगी कि वे अपने साथ कितने मतदाताओं को कांग्रेस के पाले में ला पाते हैं। इस क्षेत्र में बसपा का भी बड़ा जनाधार रहा है और 2014 के लोकसभा चुनाव में उसके वृन्दावन सिंह सिकरवार को 28.40 प्रतिशत मत मिले थे जबकि कांग्रेस उम्मीदवार डॉ. गोविंदसिंह इस चुनाव में तीसरे पायदान पर रहे।

सुबह सबेरे से साभार

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