भाजपा बिगाड़ सकती है विपक्ष की रणनीति

धनंजय सिंह

लखनऊ। यूपी में राज्यसभा की 10 सीटों के लिए आगामी 23 मार्च को मतदान होगा। राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 37 विधायकों की आवश्यकता पड़ेगी। भाजपा अपने 324 विधायकों की संख्या बल के आधार पर 8 सीटें जीत जाएगी। उसके बाद भाजपा के पास 27 वोट बचेंगे। सपा 47 विधायकों की संख्या के आधार पर एक सीट जीतने में कामयाब होगी। सपा के 10 मत अतिरिक्त बचेंगे। बसपा अपने 19 कांग्रेस के 7 और सपा के बचे 10 मतों के बल पर 10 वीं सीट जीतने की रणनीति बनायी है। भाजपा अपने बचे 27 मतों के भरोसे पिछले राष्ट्रपति के चुनाव की तरह क्रास वोटिंग कराकर विपक्ष के 9वें प्रत्याशी की जीत की रणनीति को बिगाड़ सकती है।

विपक्ष का दूसरी सीट जीतना है टेढ़ी खीर

उल्लेखनीय है कि राज्यसभा के चुनाव में पिछले कई बार से जिस प्रकार क्रास वोटिंग हो रही है यदि उसी प्रकार क्रास वोटिंग हो गयी तो दसवीं सीट का परिणाम दूसरी वरीयता के मतों पर निर्भर हो जाएगा। एक सीट के लिए ३७ विधायकों का समर्थन की जरूरत पड़ेगी। बसपा के पास उसके 19 विधायकों के अलावा 10 समाजवादी तथा 7 कांग्रेस के हैं। ऐसे में दसवीं सीट के चुनाव के लिए द्बितीय वरीयता के मतों से परिणाम निकलने की संभावना बढ़ गयी है। बसपा सरकार में मायावती का निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भइया के खिलाफ जो कार्रवाई की गयी थी, उसको देख कर राजा भईया समर्थक विधायक बसपा के विरोध में मतदान कर सकते हैं।

सैफई में होली के दिन अखिलेश यादव और शिवपाल के बीच जो हुआ उसके आधार पर शिवपाल और उनके लोग कैसे बसपा प्रत्याशी को जिताएंगे। जानकर बताते हैं कि अखिलेश ने मायावती से संधि की जो हड़बड़ी दिखाई उससे सपा कितनी मजबूत होगी इसका अंदाजा अभी नहीं लग पा रहा है लेकिन सपा में बुरे दौर से गुजर रहे शिवपाल और कमजोर हो सकते हैं। हर स्थित में मायावती-अखिलेश का गठबंधन शिवपाल को आत्मसात करना लोहे के चने चबाने जैसा है। तो फिर बसपा 37 विधायकों का समर्थन कैसे जुटाएगी।

विपक्ष की रणनीति राजा भइया और शिवपाल कर सकते हैं फेल

सूत्रों की मानें तो पिछली बार भाजपा के समर्थन से लड़ी उद्योगपति प्रीति महापात्र की तरह किसी मजबूत व्यक्ति को अपना दल की ओर से भाजपा रणनीतिकार प्रत्याशी बनाकर उतारने की तैयारी में हैं। समाजवादी पार्टी ने दसवीं सीट बहुजन समाज पार्टी को दी है। जब से सपा-बसपा गठबन्धन की चर्चा शुरू हुई तो मायावती को लड़ाने की तैयारी थी। जीत की स्थिति स्पष्ट नहीं होते देख मायावती खेमे से मायावती के भाई आनन्द का नाम चलाया गया। वोट की बिगड़ती गणित को देख मायावती ने अपना टूटता वोट बैंक बचाने के लिए दलित कैडर भीमराव अंबेडकर को प्रत्याशी घोषित कर अपना कूटनीतिक फैसला लिया।

यदि भीमराव हार गए तो माया का दरकता दलित वोट बैंक मायावती के साथ सहानुभूति के साथ 2०19 तक खड़ा हो जाएगा। उत्तर प्रदेश की अन्य छोटी-छोटी जातियों में जातिवाद के आधार पर नेता तैयार हो गए हैं इस लिए सपा-बसपा गठजोड़ में धरातल पर वोटों का वह फ्लो नही बन पा रहा है। इसका असली परीक्षण प्रदेश के दो लोकसभा क्षेत्रों में हो रहे उपचुनाव के परिणाम की समीक्षा के बाद नये समीकरण की हकीकत सामने आएगी। उसी समीकरण के इर्द-गिर्द यूपी में लोकसभा 2०19 का लोकसभा चुनाव घूमता दिख सकता है।

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