भारतीय रामासामी मुदलियार थे ECOSOC के पहले प्रेसिडेंट

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र (UN) की 75वीं सालगिरह पर एक कार्यक्रम को वर्चुअली संबोधित किया. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य बनने के बाद पीएम नरेंद्र मोदी का यह पहला संबोधन था. इस दौरान पीएम मोदी ने संयुक्त राष्ट्र के इतिहास पर भी संक्षिप्त प्रकाश डाला.

अपने संबोधन में पीएम मोदी ने कहा, ‘इस साल हम संयुक्त राष्ट्र की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं. इंसान की प्रगति में संयुक्त राष्ट्र का बड़ा योगदान है. दूसरे विश्व युद्द के बाद संयुक्त राष्ट्र के 50 फाउंडिंग मेंबर्स में भारत भी शामिल था. उस वक्त से लेकर अब तक काफी चीजें बदल गई हैं. अब संयुक्त राष्ट्र में 193 सदस्य हैं. प्रधानमंत्री ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र के संस्थापक सदस्यों में भारत भी शामिल था.

इस लिहाज से यह जानना अहम है कि उस समय संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक परिषद (ECOSOC) का पहला प्रेसिडेंट कौन था. भारत के लिए यह अहम बात है कि वह शख्स भारतीय था, जिनका नाम दीवान बहादुर सर अर्कोट रामासामी मुदलियार था. वो संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक परिषद पहले प्रेसिडेंट थे.

दीवान बहादुर सर अर्कोट रामासामी मुदलियार वकील, राजनयिक और राजनेता थे. वह जस्टिस पार्टी के वरिष्ठ नेता भी थे. स्वतंत्रता पूर्व और फिर आजादी के बाद उन्होंने भारत में विभिन्न प्रशासनिक और नौकरशाही के पदों पर काम किया.

रामासामी मुदलियार का जन्म 14 अक्टूबर 1887 को आंध्र प्रदेश के कुर्नूल में हुआ था. उनकी शुरुआती पढ़ाई लिखाई भी कुर्नूल में ही हुई थी. उन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से ग्रेजुएशन किया और मद्रास लॉ कॉलेज से कानून की पढ़ाई की. अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने वकील के रूप में अपने करियर की शुरुआत की. बाद में वह जस्टिस पार्टी में शामिल हो गए, जहां से उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई.

रामासामी मुदलियार 1920 में मद्रास विधान परिषद के लिए नामित किया गया था, जहां उन्होंने 1920 से 1926 तक सेवा प्रदान की. इसके बाद उन्होंने 1931 से 1934 तक मद्रास विधान सभा के सदस्य के रूप में कार्य किया. हालांकि 1934 में वह एस. सत्यमूर्ति से चुनाव हार गए.

रामासामी मुदलियार ने 1939 से 1941 तक इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य के रूप में कार्य किया. 1942 से 1945 तक विंस्टन चर्चिल के मंत्रिमंडल और प्रशांत युद्ध परिषद में भारतीय प्रतिनिधि के रूप में रहे. वह सैन फ्रांसिस्को सम्मेलन में भारत के प्रतिनिधि थे और संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक परिषद (ECOSOC) के पहले अध्यक्ष के रूप में कार्य किया. उन्होंने मैसूर राज के अंतिम दीवान के रूप में भी काम किया और वह 1946 से 1949 तक यहां रहे.

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