भीमेश्वर से कैसे बने भंवरेश्वर, जानिए सच्चाई

लखनऊ: लखनऊ, उन्नाव और रायबरेली तीन जिलों की सीमा पर सई नदी के तट पर स्थित प्रसिद्ध ऐतिहासिक भंवरेश्वर (शिव) मंदिर में सावन माह के पहले सोमवार को लाखों भक्तों ने जलाभिषेक कर भोले शंकर के दर्शन किए। यहां पूरे सावन में मेला लगता है। मंदिर के अंदर विराजमान शिवलिंग ऐतिहासिक है। यहाँ के पुजारी का कहना है कि इस शिवलिंग को पहले भीमेश्वर के नाम से जाना जाता था। जिसकी स्थापना महाभारत काल में स्वयं भीम ने की थी। लेकिन बाद में इसका नाम बदलकर भीमेश्वर से भंवरेश्वर हो गया। क्या आप जानते हैं इस शिवलिंग का नाम क्यों बदल गया? यदि नहीं तो आज हम आपको सच्चाई बताते हैं।

मान्यता है कि मुगलकाल में औरंगजेब की सेना ने इस मंदिर पर आक्रमण कर दिया। शिवलिंग को खुदवाने का बहुत प्रयास किया। परंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। खुदाई के दौरान बड़ी संख्या में भंवरे प्रकट हुये। जो खुदाई करने वाले पर हमलावर हो गए। जिसके भय से खुदाई करने वाले मौके से भाग निकले। घटना के बाद राज परिवार ने एक बार फिर मंदिर को भव्य रूप प्रदान किया। इसके बाद से ही यह क्षेत्र भंवरेश्वर के नाम से विख्यात हुआ। आज भी इतनी ऊंचाई व भव्यता का मंदिर आसपास नहीं हैं।

हिलौली विकासखंड में स्थित भंवरेश्वर मंदिर लखनऊ रायबरेली और उन्नाव से सड़क मार्ग से जुड़ा है। उन्नाव मुख्यालय से भंवरेश्वर शिवालय की दूरी लगभग 65 किलोमीटर है। लखनऊ-कानपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित भल्ला फार्म से कांथा, असोहा, कालूखेड़ा होते हुए असरेंदा स्थित भंवरेश्वर पहुंचा जा सकता है। इसी प्रकार रायबरेली से भंवरेश्वर मंदिर की दूरी लगभग 47 किलोमीटर है। जहां से गंगागंज, हरचंदपुर, बछरावा होते हुए भोले बाबा के मंदिर भंवरेश्वर शिवालय तक पहुंचा जा सकता है। जबकि लखनऊ जंक्शन रेलवे स्टेशन से भंवरेश्वर मंदिर की दूरी 42 किलोमीटर है। मार्ग पर पड़ने वाले महत्वपूर्ण स्थानों पर मोहनलालगंज, उदयपुर, निगोहा आदि शामिल है।

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