मंत्रिमंडल विस्तार: गले में अटक गई डील

भोपाल: कमलनाथ सरकार गिरा कर भाजपा सरकार बनाने से पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ हुई डील भाजपा के गले में अटक गई है। यह डील मंत्रिंडल विस्तार में अड़चन की वजह बनी हुई है। खबर है, डील में ही तय हो गया था कि बागियों में एक दर्जन से ज्यादा को मंत्रिमंडल में शामिल किया जाएगा। इतना ही नहीं जितने बागी हैं, सभी को सरकार में एडजस्ट किया जाएगा। अर्थात उप चुनाव में बागी हारें या जीतें लेकिन उनकी भाजपा सरकार में हिस्सेदारी तय होगी। वादा कर सरकार बनाई गई है, इसलिए वादा पूरा करना होगा।

लिहाजा, सिंधिया खेमे से किसी भी कटौती की कोई उम्मीद नहीं है। भाजपा में मंत्री पद के दावेदारों की तादाद ज्यादा है इसलिए वहां घमासान के हालात हैं। राज्यसभा चुनाव ने अलग शिवराज सरकार की चिंता बढ़ा दी है। साफ है भाजपा ने सरकार तो बना ली लेकिन उसे कई मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ रहा है। लिहाजा, मंत्रिमंडल विस्तार लगातार टल रहा है। यह कब होगा, कोई बताने की स्थिति में नहीं है।

मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर चली उठापटक के बीच जो खबरें छन कर आ रही हैं, इनके अनुसार मंत्री बनने वाले बागियों की संख्या 14 तक पहुंच सकती है। इनमें सिंधिया खेमे के 11 पूर्व विधायक मंत्री बनेंगे। इनमें से दो तुलसी सिलावट एवं गोविंद सिंह राजपूत मंत्री बन चुके हैं। वादे के अनुसार इस खेमे से 9 और पूर्व विधायकों को मंत्री बनाने की चर्चा है। मंत्री बनने की दौड़ में शामिल तीन बागी एंदल सिंह कंसाना, बिसाहूलाल सिंह एवं हरदीप सिंह डंग को सिंधिया खेमे में नहीं गिना जा रहा है। इस तरह 22 में से 14 के मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने की संभावना है। शेष को निगम-मंडलों आदि में एडजस्ट किया जाएगा।

शिवराज सिंह चौहान की राह इस बार उतनी आसान नहीं है जितनी बतौर मुख्यमंत्री पिछले 3 कार्यकालों के 13 साल में रही है। पिछले कार्यकाल में बगैर रोक-टोक सरकार चलाने वाले शिवराज के सामने शायद यह पहला अवसर है जब वे टीम गठित करते वक्त अपने मन की नहीं कर पा रहे हैं। प्रदेश के सियासी फैसले अब सूबे में ही नहीं, राष्ट्रीय नेतृत्व के स्तर पर भी किए जा रहे हैं। मंत्रिमंडल के गठन का फैसला शिवराज सिंह चौहान एवं भाजपा के प्रदेश नेतृत्व को लेना होता तो कभी का ले लिया गया होता।

भाजपा के सामने समस्या यह है कि पार्टी में पूर्व मंत्रियों एवं विधायकों को मिलाकर मंत्री पद के दावेदारों की संख्या पचास से ज्यादा है जबकि बनाए जा सकते हैं लगभग एक दर्जन मंत्री। विवाद इसे लेकर भी है कि पूर्व मंत्रियों को ही फिर अवसर दिया जाए या कई चुनाव जीत चुके नए चेहरों को मंत्री बनने का मौका दिया जाए। इसे लेकर पार्टी नेता दो फाड़ हैं। शिवराज का कोई खास मंत्री पद छोड़ने को तैयार नहीं है जबकि इसके लिए उन पर दबाव है। भाजपा ने कांग्रेस में बगावत कर सरकार बनाई है, वह नहीं चाहती कि फिर ऐसे हालात बनें। पार्टी क्या रास्ता निकालती है, इसका इंतजार किया जा रहा है। संभवत: इस उलझन की वजह से भी भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व जल्दबाजी नहीं कर रहा है।

दिनेश निगम ‘त्यागी’

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