ममता पर मायावती भारी

अखिलेश अखिल

महागठबंधन बनने से पहले ही उसके धड़े टकराते दिख रहे हैं। कांग्रेस की तरफ से जैसे ही पीएम उम्मीदवार को लेकर कोई और नाम पर भी सहमति की बात सामने सामने आयी संभावित गठबंधन से जुडी दो दिग्गज महिलाओं पर चर्चा होने लगी। ममता बनर्जी की राजनीतिक धार पर भी चर्चा हुयी तो मायावती की बृहत् दलित वोट को लेकर भी बातें सामने आयी है। इसी बीच एक नयी राजनीति भी देखने को मिली। गठबंधन के भीतर दो धड़े की राजनीति। इसमें एक धड़ा मायावती की तरफ झुकता दिख रहा है तो दूसरा धड़ा पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर जाता दिखाई दे रहा है।

26 जुलाई को एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने नई दिल्ली में यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती से मुलाकात की और और गठबंधन को लेकर बातें की। वहीं दूसरी तरफ 27 जुलाई को जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कोलकाता में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात की। उमर अब्दुल्ला से मुलाकात के बाद ममता ने कहा कि अगले लोकसभा चुनाव के लिए बन रहे संभावित गठबंधन से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम नहीं होना चाहिए। अगर ऐसा होता है तो क्षेत्रीय पार्टियों की एकता विभाजित हो जाएगी. ममता ने ये ऐसे ही नहीं कहा. दरअसल वह यूपी की महत्ता को अच्छे से जानती हैं।

ममता को यह भी अहसास है कि लोकसभा की 80 सीटों वाले यूपी से आने वाली मायावती की नजदीकियां कांग्रेस से बढ़ती जा रही हैं। एक तरफ सपा सुप्रीमो अखिलेश ने भी कहा है कि वह भाजपा को रोकने के लिए यूपी में बीएसपी को ज्यादा सीटें देने को तैयार हैं। इसके अलावा बीएसपी का कांग्रेस के अलावा कई राज्यों में अन्य पार्टियों से भी गठबंधन है। ऐसे में अगर देशभर में बीएसपी 80-100 सीटें लेकर भी आती है तो मायावती के प्रधानमंत्री बनने की संभावना बढ़ जाएगी। वैसे भी ममता की तुलना में मायावती का राजनीतिक विस्तार ज्यादा है।

मायावती जहां यूपी ,मध्यप्रदेश ,छत्तीसगढ़ ,पंजाब ,हरियाणा और राजस्थान तक दलित वोटो पर दखल रखती है वही ममता के पास बंगाल और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों तक पकड़ है। मायावती दक्षिण के राज्यों में भी दलित वोट पर असर डालती है जैसा की अभी हाल में ही कर्नाटक में देखने को मिला। माना जा रहा है कि ममता का कांग्रेस और अन्य दलों के साथ बेहत तालमेल बैठ जाए तो बसपा बेहतर परफॉर्म कर सकती है। अधिक सीटें ला सकती है जो बीजेपी को मात देने के लिए काफी होगा। उधर ममता ज्यादा से ज्यादा बंगाल की अधिकतर 42 सीटों तक ही सिमित रह सकती है वह भी तब जब वह अपनी धुर विरोधी वाम मोर्चे से गठबंधन करे।

पिछले दिनों कांग्रेस पार्टी के सूत्रों ने भी कहा था कि बीजेपी को दोबारा सत्ता में आने से रोकने के लिए वे किसी भी नेता को प्रधानमंत्री बनाने में परहेज नहीं करेंगे। कांग्रेस ममता बनर्जी या मायावती को प्रधानमंत्री बनाने का दांव चल सकती है। यह तो सभी जानते हैं कि विपक्षी दलों की एकजुटता में देरी होने की एक बड़ी वजह प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी है। टीएमसी, समाजवादी पार्टी , नेशनल कांफ्रेंस और बहुजन समाज पार्टी समेत कई क्षेत्रीय दल पीएम उम्मीदवारी पर अभी चुप हैं। लेकिन इतना तो सच है कि इन सभी दलों में मायावती की राजनीति सबसे बेहतर हो सकती है। ममता से वह आगे निकल सकती है।

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