ममता-राव की मुलाकात से विपक्ष में बढ़ा राजनीतिक तापमान

अखिलेश अखिल

कांग्रेस महाधिवेशन से पहले सोनिया गांधी ने डिनर पार्टी देकर सबको चौंकाया था अब कांग्रेस अधिवेशन के बाद ममता और के चंद्रशेखर राव की हुई मुलाक़ात सबको चौंका रही है। एक साल पहले ही चुनावी नगाड़े बजने शुरू हो गए हैं और पक्ष विपक्ष गोटी बैठाने में जुट गए हैं। अभी सबकी नजरें कोलकता संवाद पर टिकी है। दीदी और राव के बीच क्या बाते हुयी और आगे क्या होगा इसे जानने की उत्सुकता भला किसे ना हो। बीजेपी वाले भी अपने खुफिया को लगा रखे हैं और कांग्रेस वाले भी नजर गड़ाए हुए हैं।

खेल देखिये। 2019 के आम चुनावों के मद्देनजर कांग्रेस पार्टी चाहती है कि तमाम विपक्षी दल कांग्रेस का सहयोग करे। वहीं तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के प्रमुख के चंद्रशेखर राव ने तीसरा मोर्चा के लिए बिगुल फूंका है। माना जा रहा है कि राहुल गांधी के के रवैये से यूपीए के सहयोगी दल नाराज चल रहे हैं. ऐसे में तेलगांना सीएम के. चंद्रशेखर राव अलग ही तैयारियों में जुटे हैं। वो गैर-बीजेपी और गैर-कांग्रेसी तीसरा मोर्चा बनाने की जुगत में है। इस संबंध में आज तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से उनकी मुलाक़ात हुयी है। कहानी जो भी असली बात यही है कि बीजेपी को हारने के लिए लामबंद होने की बात है। राव की समझ बस यही है कि उसे कांग्रेस से भी दूर रहना चाहिए। अब ममता की राजनीति देखने वाली होगी। ममता ने राव को क्या बताया और आगे क्या होना है यह काफी महत्वपूर्ण है। याद रहे 28 मार्च को शरद पवार भी विपक्षी नेताओं को पार्टी देने वाले हैं। यह भी चुनावी पार्टी ही है।

जिस तरह से राव और ममता की बैठक हुयी है उससे लग रहा है कि तीसरे मोर्चे का गठन बीजेपी से ज्यादा कांग्रेस के लिए मुसीबत बन सकती है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी सबसे मजबूत दौर से गुजर रही है। ऐसे वक्त में विपक्षी खेमे में बिखराव का लाभ भाजपा को मिलने की संभावना है। हालांकि, यूपी से समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी अभी इस खेमेबाजी से दूर नजर आ रहे हैं। हाल में बीएसपी के साथ उपचुनाव साथ लड़ने वाले सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव भी बीजेपी विरोधी दलों के गठजोड़ पर कांग्रेस को लीड करने की बात कह चुके हैं। वहीं, बिहार से लालू यादव की आरजेडी भी कांग्रेस के साथ खड़ी नजर आ रही है।

भाजपा जहां एक ओर दक्षिण भारत के राज्यों में अपना जनाधार बढ़ाना चाहती है। वहीं दक्षिण भारत की तमाम पार्टियां नहीं चाहती है कि यहां राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का प्रभाव बढ़े। बता दें कि भाजपा का कर्नाटक छोड़ दक्षिण के किसी भी राज्य में पकड़ नहीं है। वहीं कर्नाटक में लिंगायत समुदाय भाजपा के लिए चुनौती साबित हो रही है। कर्नाटक कैबिनेट ने लिंगायत को अल्पसंख्यक का दर्जा दे दिया है। कर्नाटक कांग्रेस के इस फैसले से भाजपा के सामने नया संकट खड़ा हो गया है।

तो कहानी यह है कि जब तक पवार की पार्टी नहीं हो जाती तब तक कोई भी धरा कोई कदम नहीं उठा सकता। यूपीए बने या फिर मोर्चा ,जरुरी है कि उसमे सपा -बसपा का होना भी जरुरी है। संभव है कि देश की कई पार्टियां कांग्रेस के साथ रहना पसंद करे तो कुछ पार्टियां मोर्चा बनाकर चुनाव लड़े। फिर चुनाव के बाद जो परिणाम दिखे उसके मुताबिक़ नफ़ा नुक्सान सोच कर आगे की राजनीति बढे। ममता -राव की मुलाक़ात निश्चित तौर पर एक नया प्रयास है और इस प्रयास को कमतर नहीं माना जा सकता।

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