मशहूर चित्रकार प्रो सुखवीर सिंह सिंघल की सिंहावलोकन कला प्रदर्शनी 30 मार्च से 8 अप्रैल तक आयोजित

लखनऊ: राज्य ललित कला अकादमी उत्तर प्रदेश एवं संस्कृति विभाग उत्तर प्रदेश की ओर से लखनऊ के मशहूर चित्रकार प्रो सुखवीर सिंह सिंघल की सिंहावलोकन कला प्रदर्शनी 30 मार्च से 8 अप्रैल तक आयोजित होगी। जिसमें प्रो सुखवीर सिंघल की दुर्लभ वॉश पेंटिंग प्रदर्शित होंगी। प्रदर्शनी का आयोजन कैसरबाग लाल बारादरी भवन स्थित अकादमी की कला वीथिका में होगा। प्रदर्शनी का उद्घाटन 30 मार्च 2022 को मेयर संयुक्ता भाटिया करेंगी। प्रदर्शनी के दौरान 4 से 6 अप्रैल तक वॉश पेंटिंग कार्यशाला होगी। 8 अप्रैल को प्रो सुखवीर सिंघल के कृतित्व-व्यक्तित्व पर आधारित टॉक होगी। उक्त आयोजन की कवरेज करने की कृपा कर हमें कृतार्थ करें।

प्रेसवार्ता में राज्य ललित कला अकादमी के सचिव डॉ यशवंत सिंह राठौर ने बताया कि आधुनिक चित्रकला के सन्दर्भ में जब हम वॉशपेंटिंग की चर्चा करते हैं, शीर्ष पर लखनऊ के प्रो० सुखवीर सिंघल का नाम आता है। उन्होंने वॉशपेंटिंग में नवीन मौलिक तकनीक का प्रयोग कर वॉशपेंटिंग के क्षेत्र में नई क्रान्ति का सूत्रपात किया। वह सिर्फ वॉशपैंटिंग्स के ही ज्ञाता नहीं थे अपितु उन्होंने भिन्न भिन्न माध्यमों पर वॉटर कलर्स से, ऑयल कलर्स, टेपेस्ट्रीवर्क, मूर्तिकारी, लेदर पर फाइन आर्ट और पोटेªट भी बनाए। कला जगत् के इस गुरु ने अपना सम्पूर्ण जीवन कला को समर्पित कर दिया और सौ से भी ज्यादा पेंटिंग्स बनायी। इनकी चित्रकला में इनके अपने खुद के विचार और भावनाओं की झलक देखने को मिलती है।

मंगलवार को अकादमी में हुई प्रेसवार्ता में ललित कला अकादमी के अध्यक्ष सीताराम कश्यप ने बताया कि प्रो० सुखवीर सिंघल का आदर्श “सादा जीवन और उच्च विचार” रहा है। इनका जन्म 14 जुलाई,1913 को मुजफ्फरनगर जनपद (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। इन्होंने डी०ए०वी० हाई स्कूल से 1930 में हाई स्कूल परीक्षा उत्तीर्ण की। इनके पिता चाहते थे की ये इंजीनियर बनें परन्तु बचपन से ही ये चित्रकला और संगीत में रुचि रखते थे।

प्रो सुखवीर सिंघल की नातिन प्रियम चंद्रा ने बताया कि प्रो० सिंघल ने अपनी खुद की वॉश तकनीक विकसित की। अपनी लिखी पुस्तक ‘भारतीय चित्रकला पद्धति’ में उन्होंने अपनी वॉश टैकनीक को समझाया है। प्रो सुखवीर के दामाद राजेश जायसवाल ने बताया कि प्रो सुखवीर की चित्रकला की विशेषता यह है कि अपने तरंगित भावों को छः, आठ, बारह चित्रों द्वारा महाकाव्यात्मक शृंखलाओं के रूप में व्यक्त किया। उदाहरण के तौर पर जैसे एक बालक का जन्म, वह कैसे बड़ा होता है, उसका पूर्ण जीवन और फिर मृत्यु। दर्शकों को ऐसा प्रतीत होता है मानो वे चलते फिरते चित्र देख रहे हों।

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