माणिक से काफी पहले मुख्यमंत्री लीलाधर जोशी ने लिखी थी सादगी की असरदार स्क्रिप्ट

सत्ता जाते ही जिस तरह निर्मोही भाव से त्रिपुरा के (पूर्व) मुख्य्मंत्री माणिक सरकार अपना सामान समेट कर पार्टी दफ्तहर के दो कमरो में रहने चल दिए, उसी सादगी, सहजता और ईमानदारी की एक स्क्रिप्ट सात दशक पहले मध्यप्रदेश में एक और मुख्य मंत्री ने लिखी थी। ये थे तत्कालीन मध्यभारत राज्य के पहले मुख्येमंत्री लीलाधर जोशी। नेतृत्व पर विश्वास का सवाल उठते ही जोशीजी ने इस्तीफा थमाया। बिना एक पल की देर किए अपना बिस्तर पेटी उठाकर चलते बने और मुड़कर भी नहीं देखा। सत्ता उनका साध्यठ कभी नहीं रही। उन्होने पूरी जिंदगी सरलता और निरअहंकारिता में गुजारी। उन्होने अपनी महानता का कभी कोई दावा नहीं किया, लेकिन उन मूल्यों को जिया, जो आज की राजनीति और समाज व्यवस्था में दुर्लभ है। जोशीजी ने सहजता, मूल्यनिष्ठता और स्वावलंबन को बिना यह सोचे जिया कि वे कोई दौलत पीछे छोड़कर जा रहे हैं या नहीं, बिना यह देखे कि उनके फैसलों से सत्ता का वैभव छिन जाने का खतरा है और बिना यह बूझे कि उनकी सरलता का लोग क्या राजनीतिक-सामाजिक अर्थ निकाल रहे हैं।

सत्ता साकेत में भी संत भाव से जीने वाले लीलाधरजी का एक प्रेरक प्रसंग है। मध्यभारत राज्य का मुख्यमंत्री बनने के कुछ समय बाद कांग्रेस विधायक दल में ही उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया। इसकी सूचना मिलते ही जोशीजी ने तुरंत मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे के पेशकश कर दी। लेकिन देश के तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने उन्हें ऐसा करने से रोका। जोशीजी ने उस वक्त तो त्यागपत्र नहीं दिया, लेकिन कुछ समय बाद फिर उनके नेतृत्व को लेकर फिर अविश्वास की मुहिम चली। सरदार पटेल ने उन्हें कहा कि राजनीति में दांव पेंच चलते ही रहते हैं। आप पद न छोड़ें। लेकिन जोशीजी दूसरी ही मिट्टी के बने थे। उन्होने कहा कि जब आपस में ही विश्वास न हो तो पद पर रहने से क्या फायदा ? उन्होने तुरंत त्यागपत्र सौंप दिया और इंदौर के मालवा हाउस में तांगा मंगवाकर अपनी अटैची-बिस्तर रख रात की पैसेंजर से अपने गृहनगर शुजालपुर पहुंच गए। मुख्यपमंत्री की कुर्सी की हैसियत उनके लिए इतनी ही थी।

वैसे मध्यभारत जैसे नए बने राज्य का मुख्यममंत्री बनने को लेकर भी वे एकदम सहज थे। मंत्री पद की शपथ के लिए भी महीनो पहले सूट सिलवा कर रखने वाले आज के दौर में यह सोचना भी मुश्किल है कि इस ताकतवर पद की शपथ लेने वाले शख्स को तरतीब से बाल और दाढ़ी बनवाने के लिए भी अनुनय करनी पड़ी थी। तब इस राज्य की ग्वालियर और इंदौर संयुक्त राजधानी हुआ करती थी। लीलाधरजी को मुख्ययमंत्री पद की शपथ ग्वालियर में लेनी थी। उस जमाने में ग्वालियर के स्वतंत्रता सेनानी और लीलाधरजी के मित्र डूंगरसिंह और गौतम शर्मा ने उनसे कहा कि शपथ लेने के पहले आप ठीक से कटिंग तो करवा लें। पैर में ठीक-ठाक जूतियां पहन लें। फक्कड़पन से जीने वाले लीलाधरजी को यह आग्रह भला कैसे रास आता। उन्होने पलटकर पूछा कि क्या मेरी शादी होने वाली है, जो मुझे इस तरह सज-धज कर शपथ दिलवाने ले जाया जा रहा है? मैं एक राजनीतिक दायित्व स्वीकार करने जा रहा हूं और तुम लोग मुझे दूल्हा बनाना चाहते हो? मैं जैसा हूं, मुझे वैसा ही रहने दो।

स्वावलंबन लीलाधरजी के जीवन का सूत्र वाक्य था। मुख्यमंत्री रहते हुए भी वे अपने काम खुद ही करते थे। उनकी धर्मपत्नी का निधन काफी पहले हो जाने के कारण लीलाधरजी को खाना बनाने का अभ्यास और आदत थी, जो आखिर तक बनी रही। आजादी के आंदोलन के दौरान जब वो जेल में थे, वहां भी जोशीजी और साथी मित्र हाथ से बाटियां सेंक लेते थे। सब्जी न हो तो नमक मिर्च से ही काम चलाया जाता था। लीलाधरजी दो बार मप्र से सांसद रहे। लेकिन दिल्ली में रहकर भी खाना हाथ से ही बनाते थे। उस वक्त कई लोगों ने उनसे कहा कि ‍भई दिल्ली में प्लाॅट-वाट ले लो। लेकिन जोशीजी ‍िदल्ली में भी परदेसी की तरह ही रहते थे। उनका मन अपने गांव में ही रमता था। रहन-सहन भी उनका फकीराना ही था। जोशीजी के पास पास दो कुर्ते और दो बंडियां थीं, जिन्हें आजकल जैकेट कहा जाता है। चूंकि वे अपना सारा काम खुद ही करते थे, ऐसे में समय पर कुर्ते वगैरह में बटन या पैबंद ठीक से लगे हों, यह कतई जरूरी नहीं था। एक बार किसी ने उनसे पूछा कि आप बंडी क्यों पहनते हैं तो जोशीजी का जवाब होता- इससे कुर्ते का फटापन ढंक जाता है।

जोशीजी की ध्येयनिष्ठता और ईमानदारी का सम्मान समाज के हर वर्ग में था। विपक्ष में होते हुए भी राजमाता विजयाराजे सिंधिया भी उनका बेहद आदर करती थीं। कारण लीलाधर जी जब मध्यभारत प्रांत के सीएम थे, उस वक्त महाराजा जीवाजी राव सिंधिया राज्य के राजप्रमुख हुआ करते थे। 1989 में एक बार राजमाता भाजपा के एक कार्यक्रम के सिलसिले में शुजालपुर आईं तो उन्होने लीलाधरजी के स्वास्थ्य बारे में पूछा। स्थानीय भाजपा नेता नहीं चाहते थे कि राजमाता किसी कांग्रेसी नेता से ‍िमलने जाएं, क्योंकि इससे गलत राजनीितक संदेश जा सकता था। लेकिन राजमाता ने साफ कह दिया कि वे लीलाधरजी से हर हाल में मिलेंगी और उनका पता भी पूछा। लीलाधरजी उन दिनों शहर से दूर एक खेत में खपरैले मकान में रहते थे, जो बारिश में कई जगह से टपकता था। घर में सामान भी गिनती का ही था। एक तखत था और एक बिस्तर। इसके अलावा तीन चार तगारियां रखी थीं। ताकि ऊपर से टपकती छत का पानी उनमें समेटा जा सके। राजमाता लीलाधर जी के घर पहुंचीं। नमस्कार किया और पूछा कि जोशीजी यह सब क्या है? जोशीजी ने अविचल भाव से उत्तर‍ ‍िदया- यह टपकती छत मेरे राजनीतिक जीवन का इनाम है। ये तगारियां मेरी ईमानदारी के तमगे हैं और मैं इसे खुशी से स्वीकार करता हूं।

जोशीजी खांटी कांग्रेसी थे और उनका विश्वास गांधीवाद में था। वे आजीवन खादी न सिर्फ पहनते रहे बल्कि अंतिम यात्रा के लिए भी उन्होने खादी का इंतजाम पहले ही कर रखा था। एक तिरंगा झंडा और खादी का थान इसके लिए उन्होंने रिजर्व रखा था। संयोग से उनके एक मित्र और स्वतंत्रता सेनानी का निधन हो गया। उनके कफन के लिए भी खादी की दरकार थी। जोशी ने अपने पास सहेज कर रखा तिरंगा और खादी का थान मित्र की अंतिम यात्रा के लिए दे ‍िदया। इसके बाद तत्काल बाजार गए और नया तिरंगा और खादी का थान अपने लिए ले आए। किंवदंती से लगने वाले इन किस्सों पर आज की पीढ़ी को सहसा विश्वास भी नहीं होगा। लेकिन यह सच है। क्योंकि यह वो समय और वो प्रतिबद्धता थी, जब व्यक्ति पद से बड़ा होता था, जब सत्ता शुचिता के पायों पर खड़ी होती थी और जब स्वाभिमान के आगे कुर्सी का अहंकार पानी भरता था। लीलाधर जोशी और माणिक सरकार जैसे लोग इसी विरल सम्प्रदाय के अडिग अनुयायी हैं।

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