माननीयों के वेतन बढे लेकिन मेट्रो किराया भी कम कीजिए जनाब !

अखिलेश अखिल

अभी के हालिया बजट में हमारे माननीयों के लिए भी ख़ास बजट पेश किया गया। यह बजट देश के राष्ट्रपति ,उपराष्ट्रपति और राज्यपालों के वेतन बढ़ोतरी से जुड़ा था। सबके वेतन बढ़ा दिए गए। राष्ट्रपति का वेतन बढ़ाकर पांच लाख रुपये, उपराष्ट्रपति का चार लाख रुपये और राज्यों के राज्यपालों का वेतन बढ़ाकर 3.5 लाख रुपये करने की बात कही गयी। इतना ही नहीं वित्त मंत्री ने कहा कि सांसदों के वेतन, भत्ते हर पांच साल में बढ़ाए जाएंगे। इसे तय करने के लिए नियमों में बदलाव होगा। यह सही भी है। रुतवा के मुताविक वेतन ना मिले तो पद की प्रतिष्ठा कैसी ? हमारे देश में पैसे से प्रतिष्ठा का आकलन होता है। कमाई से समाज में पूछ होती है। यह बात और है कि हमारे देश का ये सम्मानित पद पैसे से कहीं ऊपर ही रहे हैं।इन पदों की जो गरिमा है उसके सामने पैसे का क्या मोल। देश के लोगों को भी लगता है कि माननीयों के मान सम्मान में कोई कमी नहीं रहे। उनकी प्रतिष्ठा बनी रहे। अभी तक तो देश ही त्याग करता रहा है। आम जनता के बस में इससे ज्यादा कुछ है भी तो नहीं। यही भारत का मिजाज है और संस्कार भी। अपना सब कुछ त्याग कर थोड़े में संतोष करने की परंपरा।

लेकिन किसी राष्ट्र और लोकतंत्र की भूमिका अपने लोगों के लिए भी बहुत कुछ है। देश के गार्जियन की भूमिका अपने नागरिकों के लिए भी बहुत कुछ कहती है। जिस देश का आम आदमी तमाम कठिनाइयों से जूझ रहा हो उस देश के माननीयों का भी कर्त्तव्य बनता है कि जनता की समस्यायों और तकलीफों के प्रति वे सचेत और गंभीर रहें। ऐसा नहीं होनेसे पता नहीं जनता का मिजाज कब बदल जाए और अपने अधिकारों को लेकर सड़क पर उतर जाए। ये बातें इसलिए कही जा रही है कि बजट से पहले जब दिल्ली के छात्रों ने मेट्रो किराया में हुयी भारी बढ़ोतरी के खिलाफ आवाज उठाई तो उस आवाज के समर्थन में कोई खड़ा होता नहीं दिखा। सब चुप्पी मारे ताक रहे थे और अपने हिसाब किताब में लगे थे। बजट के बाद भी छात्रों के प्रदर्शन हुए।

दिल्ली में पढ़ने वाले छात्रों का वह प्रदर्शन किसी एक कॉलेज या यूनिवर्सिटी का नहीं था ये एक संयुक्त विरोध प्रदर्शन था जिसका विरोध दिल्ली के हर कॉलेज से आये छात्र कर रहे थे। इस मौके पर विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रही दिल्ली विश्वविद्यालय की आइसा की अध्यक्ष कवलप्रीत कौर। उस दौरान मेट्रो किराया को लेकर वह कई मंत्रियों से मिली थी। आश्वासन मिला की बजट के बाद देखा जाएगा। अब जब बजट आ गया तो सवाल खड़े होने लगे हैं। कवलप्रीत कौर कहती है कि बजट में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपालों का वेतन बढ़ाया जा सकता है लेकिन छात्रों के लिए कुछ नहीं किया जा सकता है।

कवलप्रीत कौर ने कहा कि,”तब हमें कहा गया है कि अधिकारी मौजूदा बजट सत्र में व्यस्त हैं। बजट आ जाने की बाद अभी तक हमारी मांग पर सरकार चुप है। हम इंतजार करेंगे लेकिन अगर अगले 10 दिन में कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली तो हम अपनी मांगों को उठाने के लिए बड़ी संख्या में दोबारा पीएमओ में प्रवेश करने के लिए जुटेंगे।”कवलप्रीत ने आगे कहा कि अगर इस मामले पर कुछ नहीं होता है तो सीधे प्रधानमंत्री मोदी से मिलकर किराए में कटौती करने की मांग करेगीं। उन्होंने कहा कि किसी ओर से मदद नहीं मिलने के कारण अब हम प्रधानमंत्री का दरवाजा खटखटाएंगे।

आगे दिल्ली में पढ़ रहे छात्रों की राजनीति क्या रंग लाती है इस पर सबकी नजरे टिकी है। दिल्ली में छात्रों का आना -जाना मेट्रो पर ही निर्भर है। इधर पिछले कुछ महीनो के अंतराल में मेट्रो किराया में भारी बढ़ोतरी हुयी है जिससे आम जनता तो परेशान है ही छात्रों को काफी आर्थिक परेशानी आ रही है।

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