मायावती के पिता प्रभु दयाल का 95 साल की उम्र में निधन, दिल्ली में होगा अंतिम संस्कार

नई दिल्‍ली: बसपा सुप्रीमो मायावती के पिता प्रभु दयाल का निधन हो गया है. वह 95 साल के थे. जबकि उनके निधन पर बसपा के राष्‍ट्रीय महासचिव और राज्‍यसभा सांसद सतीश चंद्र मिश्रा समेत तमाम नेताओं और कार्यकर्ताओं ने शोक जताया है. आपको बता दें कि मायावती के पिता प्रभु दयाल दिल्ली के रकाबगंज में रहते थे. जबकि उनका अंतिम संस्कार कल दिल्ली में होगा.

आपको बता दें कि मायावती मूलरूप से गौतमबुद्ध नगर जिले के बादलपुर गांव की निवासी हैं. जबकि उनके पिता प्रभु दयाल सरकारी नौकरी में थे, इस वजह से बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के लिए दिल्ली में शिफ्ट हो गए थे. जबकि दिल्‍ली में ही मायावती और उनके भाई-बहनों ने पढ़ाई-लिखाई की थी. हालांकि प्रभु दयाल अपनी बेटी मायावती को आईएएस अफसर बनाना चाहते थे, लेकिन बसपा संस्थापक कांशीराम के संपर्क में आने के बाद उन्‍होंने (मायावती) राजनीति की राह पकड़ ली और फिर उत्‍तर प्रदेश की मुख्‍यमंत्री की कुर्सी पर काबिज भी हो गईं.

हाल ही में बसपा सुप्रीमो मायावती ने पार्टी में बढ़ा उलटफेर करते हुये मऊ के भीम राजभर (Bheem Rajbhar) को उत्तर प्रदेश बहुजन समाज पार्टी प्रदेश अध्यक्ष बनाया है. बसपा सुप्रीमो के इस कदम को यूपी में 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारी के तौर पर देखा जा रहा है. मायावती ने आजमगढ़ मंडल के जोनल को-आर्डिनेटर और मऊ के रहने वाले भीम राजभर को बहुजन समाज पार्टी, उत्तर प्रदेश का नया अध्यक्ष बनाया है. इसके पहले तक मुनकाद अली इस पद पर थे. मायावती के इस कदम को बसपा की राजभर वोट बैंक को अपने पक्ष में करने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है क्योंकि पूर्वी उत्तर प्रदेश में राजभर वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभाते हैं.

पूर्व में राजभर समाज से ही अंबेडकर नगर के राम‌अचल राजभर पार्टी के वर्षों प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं. नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे वरिष्ठ नेता के बसपा छोड़ने के बाद मुस्लिम समाज को अपने साथ जोड़ने के लिए ही मायावती ने मुनकाद अली को अध्यक्ष की कुर्सी सौंपी थी. हाल ही के राज्यसभा चुनाव के दौरान सपा को हराने के लिए भाजपा के साथ जाने में गुरेज न करने जैसे बयान से मुस्लिम समाज के फिलहाल पार्टी से दूर ही जाने की आशंका के मद्देनजर बसपा सुप्रीमो ने अब पिछड़े समाज को अपने से जोड़ने पर ज्यादा फोकस करने के लिए अब यह दांव चला है. बता दें कि राज्य ‌में पिछड़ों की ठीक ठाक आबादी होने के कारण सभी दलों की नजर इन पर हैं. भाजपा सहित अन्य प्रमुख दल के प्रदेश अध्यक्ष इसी समाज से हैं.

उत्तर प्रदेश में हुये उप चुनाव में बीएसपी का खाता भी नहीं खुला है. ऐसे में आगे भी बसपा के सामने उत्तर प्रदेश में अपना जनाधार बचाए रखने की चुनौती है. क्योंकि यूपी में बसपा के वोट बैंक में भाजपा ने बड़ी सेंध लगाई है. प्रदेश में दलित अभी भी मायावती के साथ हैं, लेकिन अन्य जातियों से बड़ा वोट बैंक भाजपा के खाते में चला गया है. इसका असर 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों के साथ ही 2017 के विधानसभा और 2020 के उपचुनाव में देखने को मिला है.

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