माया को राजनीति में दूसरा दलित मंजूर नहीं, बुलंदशहर से आजमा सकती हैं दांव

धनंजय सिंह

लखनऊ। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में नये उभरते दलित नेताओं ने बसपा सुप्रीमो मायावती की नींद उड़ा दी है। बसपा सुप्रीमो मायावती अब पूर्वांचल की राजनीति से किनारा करते हुए पश्चिमी यूपी में ही फोकस करना चाह रही हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती लगभग 15 साल बाद लोकसभा चुनाव में हाथ आजमाने के लिए जमीन तलाशना शुरू कर दी है। माना जा रहा है कि 2019 की लोकसभा चुनाव में बसपा सुप्रीमों बुलन्दशहर से चुनाव लड़ सकती हैं। मायावती बुलन्दशहर से पश्चिमी यूपी की लगभग दलित बाहुल्य 21 लोकसभा सीटों पर बसपा को निर्णायक भूमिका में लाना चाहती हैं।

पश्चिमी यूपी की दलित राजनीति में चन्द्रशेखर उर्फ रावण और गुजरात के निर्दलीय विधायक जिग्रेश मेवाणी का दखल काफी बढ़ गया है। उनके दखल को रोकने के लिए मायावती पश्चिमी यूपी के लगभग 25 जिलों के कोआर्डिनेटरों के साथ कई बार मंथन कर चुकी हैं। साल 2017 में सहारनपुर के शब्बीर गांव कांड की घटना के बाद चन्द्रशेखर उर्फ रावण का नाम सामने आने के बाद बसपा ने मंथन शुरू कर दिया था। शब्बीरपुर गांव कांड के बाद सहारनपुर के आसपास के जिलों के दलित चन्द्रशेखर के पक्ष में खड़े हो गये। ऐसे में मायावती को शब्बीर पुर गांव पहुंचकर रैली करनी पड़ गयी। गुजरात के निर्दलीय विधायक जिग्रेश मेवाणी मेरठ और बरेली क्षेत्र में अपना पैर पसारना शुरू कर दिया है। जिग्रेश मेवाणी को सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बुलन्दशहर, गाजियाबाद, मेरठ और बरेली के आसपास के जिलों में कांग्रेस नेताओं का सहयोग मिल रहा है। कांग्रेस जिग्रेश मेवाणी के बल पर पश्चिमी यूपी में दलितों को अपने पक्ष में लाना चाहती है।

पश्चिमी यूपी के 21 जिले दलित बाहुल्य है। पिछले नगर निकाय के चुनाव में पश्चिमी यूपी की छह नगर निगमों में बसपा निर्णायक भूमिका में थी। जिसमें मेरठ और अलीगढ़ नगर निगम में जीत भी दर्ज की थी। नगर निकाय चुनाव में बसपा के साथ मुस्लिम मतदाता भी आ गये थे। नगर निकाय चुनाव में मुस्लिम और दलित गठजोड़ के बाद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की नींद उड़ गयी थी। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने नगर निकाय चुनाव के बाद सभी मुस्लिम नेताओं के साथ बैठक की थी। 2 अप्रैल को एससी एसटी कानून में बदलाव के विरोध में सबसे अधिक प्रदर्शन पश्चिमी यूपी में हुआ था। 2 अप्रैल के प्रदर्शन में तोड़-फोड़ कराने में बसपा नेताओं का नाम आया है।

बुलंदशहर से सटे हुए आगरा व हाथरस की लोकसभा सीटें आरक्षित हैं। इतना ही नहीं गौतमबुद्धनगर स्थित गांव बादलपुर मायावती का पैतृक गांव है। इसके साथ ही यहां से अगर वह चुनाव लड़ती हैं तो इसका असर बुलंदशहर के आसपास के जिलों जैसे अलीगढ़ , मेरठ, हापुड़, गाजियाबाद और गौतमबुद्ध नगर पर भी पड़ेगा। पश्चिमी यूपी में इस समय नगीना, आगरा, बुलंदशहर, हाथरस आदि आरक्षित सीटें हैं। बसपा सुप्रीमों मायावती ने पिछला लोकसभा चुनाव 2004 में अकबरपुर सीट से लड़ा था। उसके बाद उन्होंने लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा। वह राज्यसभा और विधानपरिषद के रास्ते सदन तक पहुंचीं।

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