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लखनऊ: आज की आपाधापी वाली जिंदगी में सबसे ज्यादा बढ़ी हैं बीमारियां। हर दिन नई-नई बीमारियां सामने आ रही हैं। ऐसे में जो लोग इन बीमारियां का जड़ से इलाज चाहते हैं, वे होम्योपैथी का सहारा लेते हैं। यह एक ऐसी पद्धति है, जिसमें उपचार में तो समय लगता है, लेकिन यह बीमारी को जड़ से मिटाती है। अगर आप चाहें तो इस क्षेत्र में अपना फ्यूचर देख सकते हैं।

होम्योपैथी की तरफ लोगों के बढ़ते रुझान का सबसे बड़ा कारण यह है कि यह एक ऐसी पद्धति है, जिसमें उपचार में तो समय लगता है, लेकिन यह बीमारी को जड़ से मिटाती है। इसकी खासियत यह है कि यह आर्थराइटिस, डायबिटीज, थायराइड समेत अन्य कई गंभीर मानी जाने वाली बीमारियों का प्रभावी इलाज करती है और वह भी बिना किसी साइड इफेक्ट के। आमतौर पर यह धारणा है कि होम्योपैथी दवाइयों का असर बहुत देर से होता है, लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं है।

दरअसल, यह पद्धति केवल पुरानी और गंभीर बीमारियों को पूरी तरह ठीक करने में थोड़ा समय लेती है अन्यथा बुखार, सर्दी-खांसी या अन्य मौसमी या छोटी-मोटी बीमारियों में होम्योपैथिक दवाइयां उतनी ही तेजी से असर करती हैं, जितनी अन्य पद्धतियों की दवाइयां। दरअसल, होम्योपैथी में प्राकृतिक दवाओं के जरिए शरीर की रोग निवारण क्षमता को बढ़ाकर मरीज का इलाज किया जाता है। होम्योपैथी में ऐसी प्राकृतिक विधियों से इलाज करने की कोशिश की जाती है, जो रोगी के शारीरिक व मानसिक लक्षणों से मेल खाएं। होम्योपैथी में कई बीमारियों का इलाज किया जाता है। रोगी की दिनचर्या, शारीरिक लक्षण, भावनात्मक मामलों का विश्लेषण करके ही दवा दी जाती है।

दरअसल, वर्ष 1796 में डॉ. क्रिश्चिन सेमुअल हैनीमन ने इस वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति की शुरुआत की थी। उनके द्वारा विकसित लॉ ऑफ सिमिलर्स को होम्योपैथ का आधारभूत सिद्धांत माना जाता है। भारत में होम्योपैथी चिकित्सा की शुरुआत बंगाल से 19वीं शताब्दी के दूसरे-तीसरे दशक से हुई ती। 1952 में भारत सरकार ने होम्योपैथिक एडवाइजरी कमेटी का गठन किया, जिसकी सिफारिशों के आधार पर 1973 में एक्ट बनाकर इस चिकित्सा पद्धति को मान्यता दी गई। होम्योपैथी में रिसर्च के लिए 1978 में स्वतंत्र सेंट्रल काउंसिल की स्थापना की गई। भारत में होम्योपैथी शिक्षा की शुरुआत 1983 में ग्रेजुएट लेवल और डिप्लोमा कोर्स से हुई। देश में करीब 200 होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज हैं, जिनमें से 35 गवर्नमेंट कॉलेज हैं। शेष निजी संस्थाओं द्वारा संचालित हैं। इनमें दाखिला लेकर भविष्य बनाया जा सकता है।
कैसे लें एडमिशन : बीएचएमएस में एडमिशन ऑल इंडिया कॉमन एंट्रेंस टेस्ट (एआईसीईटी) के माध्यम से होती है। यह टेस्ट साल में एक बार ऑल इंडिया इंजीनियरिंग एंड मेडिकल कॉलेजेज एसोसिएशन (एआईएमईसीए) आयोजित करता है।

डॉक्टरों की कमी : लोगों के बीच होम्योपैथिक चिकित्सा की जितनी मांग बढ़ रही है, उस अनुपात में देश में पर्याप्त चिकित्सक नहीं हैं। आज भी किसी शहर में बड़ी मुश्किल से आठ-दस या इससे भी कम अच्छे होम्योपैथिक डॉक्टर मिलेंगे। इस कमी को देखते हुए इस क्षेत्र में संभावनाएं अपार हैं। जहां तक अवसरों की बात है, तो देश व विदेशों में, दोनों ही जगह होम्योपैथी प्रैक्टीशनर के लिए अवसर हैं। सरकारी व निजी अस्पतालों में मेडिकल ऑफिसर की नौकरी के अलावा अपनी प्रैक्टिस भी की जा सकती है। होम्योपैथी मेडिसिन की केमिस्ट शॉप भी खोली जा सकती है। फार्मेसियों में भी जॉब के मौके हैं। कुछ सालों के बाद बीएचएमएस डिग्री प्राप्त प्रोफेशनल अपनी फार्मेसी खोल सकता है। नेशनल रूरल हेल्थ मिशन के तहत भी काफी तादाद में नौकरियां पैदा होने की संभावना है। गवर्नमेंट या प्राइवेट अस्पताल में होम्योपैथी डॉक्टर के रूप में नौकरी करने पर आरंभिक वेतन के तौर पर 15 से 30 हजार रुपए प्रतिमाह मिलते हैं। धीरे-धीरे आपके अनुभव के अनुसार वेतन बढ़ता जाता है।

होम्योपैथी है बेहतर
– बाकी चिकित्सा पद्धतियों के मुकाबले इसमें दवाइयां सस्ती होती हैं।
– रोग की जांच के लिए महंगे टेस्ट इस चिकित्सा में नहीं होते हैं, बल्कि लक्षणों के आधार पर ही रोग की पहचान कर ली जाती है।
– होम्योपैथी में रोग का नहीं, रोगी का इलाज किया जाता है। इसके लिए रोगी के प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत किया जाता है, ताकि वह स्वयं रोग से लड़ सके।
– होम्योपैथी में कुछ ऐसी असाध्य बीमारियों का इलाज संभव है, जो दूसरी चिकित्सा पद्धतियों में नहीं है।
– दूसरी चिकित्सा पद्धितियों में कुछ रोग केवल सर्जरी या ऑपरेशन से ही ठीक होते हैं, जबकि होम्योपैथी में इन रोगों का इलाज बिना सर्जरी के भी किया जाता है।

कोर्स और योग्यता
होम्योपैथी के कोर्स स्नातक, स्नातकोत्तर व पीएचडी स्तर तक उपलब्ध हैं। बैचलर डिग्री को बैचलर ऑफ होम्योपैथिक मेडिसिन एवं सर्जरी (बीएचएमएसी) कहा जाता है। इसकी प्रवेश परीक्षा के लिए बायोलॉजी विषय के साथ 12वीं उत्तीर्ण होना जरूरी है। यह कोर्स साढ़े पांच साल का है, जिसमें एक साल की इंटर्नशिप भी शामिल है। पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री को एमडी (होमी) कहा जाता है। यह कोर्स तीन साल का होता है। होम्योपैथी में एमडी के लिए योग्यता बीएचएमएस है। होम्योपैथी में पीएचडी करने के लिए एमडी (होमी) जरूरी है, जो भारत में मान्यता प्राप्त होम्योपैथी कॉलेज से हो तथा सीसीएच एक्ट की दूसरी सूची में शामिल है। पिडियाट्रिक्स व फार्मेसी इसकी दो शाखाएं हैं। इन संस्थानों से आप कोर्स कर सकते हैं-
– नेशनल होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज एंड हास्पिटल, लखनऊ
– कानपुर होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज एंड हास्पिटल, कानपुर
– होम्योपैथिक कॉलेज, सोलन (हिमाचल प्रदेश)
– गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ यूनिवॢसटी, कश्मीरी गेट, दिल्ली
– डॉ. बीआर सूर होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज, नानकपुरा, मोतीबाग, नई दिल्ली
– नेहरू होम्यो मेडिकल कॉलेज एंड हास्पिटल, डिफेंस कॉलोनी, नई दिल्ली
– जीडी मेमोरियल होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज एंड हास्पिटल, पटना

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