मुलायम की अदाकारी !

– प्रकाश भटनागर

मुलायम सिंह यादव ने एक तीर से कई निशाने लगा दिए हैं। समाजवादी पार्टी के संरक्षक की संसद में 13 फरवरी की अदायगी देखकर प्रेम चोपड़ा की याद आ गई। जो ‘सौतन’ फिल्म में खुद के लिए कहते हैं, ‘मैं वह बला हूं, जो शीशे से पत्थर को तोड़ता है।’ मुलायम ने भी ऐसा ही किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फिर से इसी पद को पाने का आशीर्वाद दे दिया। यह सब कुछ यूं हुआ कि मोदी के खिलाफ किसी चट्टान की शक्ल में एकजुट होने की कोशिश कर रहे विपक्षी दलों की इस घेराबंदी में सुराख नजर आने लगे। यह समझना भूल होगी कि मुलायम उम्र के असर या वीतराग के चलते ऐसा कह और कर गए। वह ठेठ राजनीतिज्ञ हैं। इसलिए न तो जीवनपर्यंत उनके दिमाग पर झुर्रियां पड़ेंगी और न ही उनका ह्रदय सियासी वानप्रस्थ की ओर दौड़ेगा। मुलायम ने अपनी मूल इच्छा को दबाते हुए उक्त आशीर्वाद दिया है। ताकि वह यह बता सकें कि उन्हें यूपी में अपनी पार्टी का बसपा से गठबंधन रास नहीं आया है। इसके संकेत केवल साइकिल और हाथी के मेल तक सीमित नहीं हैं। मुलायम पूर्व में बेटे अखिलेश यादव द्वारा कांग्रेस से हाथ मिलाने का भी खुलकर विरोध कर चुके हैं।

उनके कई बयान पढ़ें, तो साफ दिखता है कि इस पूर्व मुख्यमंत्री की नजर में आज कांग्रेस की कोई हैसियत नहीं है। ऐसे में सोनिया गांधी के नजदीक बैठकर मोदी की तारीफ करते हुए उन्होंने एक बार फिर इस दल के लिए अपनी भावनाओं का अप्रत्यक्ष रूप से इजहार कर दिया। संसद के उनके कथन को एक पीड़ा से भी जोड़ा जा सकता है। वह यह कि सपा में हुए ‘यादवी संघर्ष’ के बाद मुलायम हाशिए पर हैं। किसी समय उनके हमकदम बनने को आतुर तमाम विपक्षी नेता भी अब मुलायम को घास नहीं डाल रहे हैं। ऐसा होने पर तकलीफ होना स्वाभाविक है। इसलिए यह भी माना जा सकता है कि मुलायम ने मोदी की तारीफ कर अपनी उपेक्षा करने वालों के तिलमिलाने का इंतजाम कर दिया है।  बहरहाल, मोदी फिर प्रधानमंत्री बने तो यह मुलायम के आशीर्वाद से संभव नहीं माना जाएगा और यदि इस पद से उनकी छुट्टी हुई, तब भी इसे मुलायम की नजर लगने का मामला नहीं माना जाएगा। क्योंकि लोकतंत्र के इस मंदिर में केवल और केवल जनता का आशीर्वाद काम आता है। मुलायम ने कहा कि मोदी सभी सांसदों को साथ लेकर चले, लेकिन बात तो तब है, जब देश की आवाम माने कि यह सरकार उनकी भी सहचरी-सी साथ चली है। आम चुनाव सिर पर हैं।

विपक्षी दलों का गठजोड़ तेजी से आकार लेता दिख रहा है। यूपी में मोदी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। यहां सपा और बसपा का तालमेल हो चुका है और कांग्रेस की तरफ से प्रियंका गांधी ने धुआंधार बैठकें कर जर्जर हालत में पहुंच चुकी अपनी पार्टी को नवजीवन देने के प्रयास तेज कर दिए हैं। उधर, महाराष्ट्र में शिवसेना तथा राष्ट्रवादी पार्टी की नजदीकी बढ़ती दिख रही है, तो ममता बनर्जी ने भी कई विपक्षी दलों को साधने की कोशिशें तेज कर दी हैं। ये दल अलग-अलग हैं, उनके नेताओं के दिल भी अलग-अलग हैं, लेकिन शत्रु केवल एक है, मोदी। इसलिए ऐसी कोशिशें यकीनन देश के मौजूदा प्रधानमंत्री की पेशानी पर बल ला रही होंगी। वह बल, जिन्हें किसी मुलायम सिंह के आशीर्वाद से छोटा नहीं किया जा सकता। राजनीति में न तो दुश्मनी स्थायी होती है और न ही दोस्ती। इसलिए मुलायम के मोदी के प्रति मुलायम हुए सुर किसी भी समय बदल सकते हैं। अशीर्वाद देते श्रीमुख से यकायक शाप निकलने की प्रक्रिया किसी को नहीं चौंकाएगी। मुलायम ने जो कहा, उसे टाइम पास मूंगफली की तरह चबाकर भूल जाइए। बस यह याद रखिए कि चुनाव आ रहा है और यह खासतौर से याद रखिए कि आप किस आधार पर अपने लिए नई सरकार का चयन करना चाहेंगे।

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