मोदी के पसंदीदा अफसर ने आपतालकाल में संघ कार्यकर्ताओं पर बरपाया था कहर

लखनऊ: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्रा ने आपातकाल के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व जनसंघ के कार्यकर्ताओं पर कहर बरपाया था। आपातकाल के समय नृपेन्द्र मिश्र उन्नाव में जिलाधिकारी थे। इंदिरा गांधी का विरोध करने वालों पर उस समय उन्होंने बहुत कहर बरपाया था।

सोमवार को वरिष्ठ पत्रकार नरेन्द्र भदौरिया ने हिन्दुस्थान समाचार को बताया कि उस समय नृपेन्द्र मिश्र उन्नाव जिले के जिलाधिकारी थे। उन्होंने उस समय संघ के कार्यकर्ताओं पर जमकर कहर बरपाया था। आपातकाल लगने के अगले ही दिन पूरे उन्नाव में गिरफ्तारियों का सिलसिला शुरू हो गया। उस दौरान जो कार्यकर्ता पकड़ में आ गया उसको भयंकर यातनाएं दी गयीं। वीरेन्द्र सिंह उन्नाव के जिला प्रचारक थे। हम लोग उनकी योजना से भूमिगत होकर काम कर रहे थे।

उन्होंने एक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि एक हमारे परिचित जो जिला प्रचारक वीरेन्द्र सिंह के भी परिचित थे। वह पुलिस को हमारी व वीरेन्द्र सिंह की मुखबिरी करते थे। पुलिस हम लोगों के पीछे पड़ी थी। एक दिन अचानक हम और तत्कालीन जिला प्रचारक वीरेन्द्र सिंह उनके घर जा धमके। वीरेन्द्र सिंह को सामने देखकर उनका पैजामा गीला हो गया। वीरेन्द्र सिंह उनको बिना कुछ कहे तुरन्त वापस लौट आये। वहां से निकलने के बाद पुलिस तुरन्त हरकत में आ गयी। हम लोग स्टेशन पहुंचकर मालगाड़ी पर सवार होकर कानपुर चले गये।

नृपेन्द्र मिश्र मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्री बनने पर उनके प्रमुख सचिव रहे। उनकी कुशलता के कारण कल्याण सिंह ने भी उन्हें प्रमुख सचिव के पद पर रखा। यही नृपेन्द्र मिश्र वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पसंदीदा अधिकारी हैं। उनकी यह खासियत है कि वह कुर्सी पर बैठे नेता की नजरें पहचान लेते हैं और उसकी इच्छा के अनुरूप काम करते हैं।

इंदिरा गांधी ने जिस रात आपातकाल की घोषणा की, उस रात से पहले दिल्ली के रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में एक विशाल रैली हुई। वह तारीख थी 25 जून 1975। इस रैली में लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को ललकारा था और उनकी सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया। इस रैली में विपक्ष के लगभग सभी बड़े नेता थे। यहीं पर राष्ट्रकवि दिनकर की मशहूर लाइनें सिंहासन खाली करो कि जनता आती है की गूंज नारा बन गई थी।

इंदिरा, 12 जून 1975 को आए इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले से पहले से ही बेचैन थीं जिसमें रायबरेली से उनका चुनाव निरस्त कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट से भी उन्हें आधी राहत मिली थी। आखिरकार उन्होंने पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे की सलाह पर धारा-352 के तहत देश में आंतरिक आपातकाल लगाने का फैसला किया।

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