मोदी के शपथ ग्रहण में पाक छोड़ बिम्स्टेक देशों को न्योता

नई दिल्ली: 17वी लोकसभा के लिए संसदीय चुनाव में भाजपा ने महाविजय हासिल कर रिकार्ड बनाया है। अब पीएम के पद के लिए शपथ समारोह का आयोजन होना है। नरेंद्र मोदी के 30 मई को प्रधानमंत्री पद के शपथ ग्रहण समारोह में बिम्सटेक सदस्यों को आमंत्रित किया गया है, जबकि पाकिस्तान को इसके लिए निमंत्रण नहीं भेजा गया है। कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसके जरिये भारत ने पाकिस्तान को कड़ा संदेश देने की कोशिश की है। संदेश यह है कि जब तक पाकिस्तान अपनी जमीन से आतंकवाद को बढ़ावा देना बंद नहीं करता है, तब तक उसके साथ रिश्तों में कोई गतिशीलता देखने को नहीं मिलेगी।

विदेश मंत्रालय ने बिम्सटेक देश के नेताओं को आमंत्रण की सूचना साझा करते हुए बताया कि सरकार ने यह कदम ‘पड़ोसी प्रथम’ नीति के तहत उठाया है। अब सवाल है कि हमारा पड़ोसी तो पाकिस्तान भी है, लेकिन जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएमयू) के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के प्रोफेसर स्वर्ण सिंह सरकार के इस कदम को आतंकवाद के खिलाफ भारत के आक्रामक रुख के तौर पर देखते हैं।

वह बताते हैं कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात की और दोनों देशों के लोगों की बेहतरी के लिए मिलकर काम करने की अपनी इच्छा व्यक्त की। लेकिन इसके बावजूद पीएम मोदी ने इमरान खान को आमंत्रित नहीं किया और अब बिमस्टेक देशों को आमंत्रित किया गया है। इसका मतलब है कि आतंकवाद पर पाकिस्तान को कड़ा संदेश देने की कोशिश की गई है।

प्रोफेसर स्वर्ण सिंह ने बताया, ‘इसे हमें थोड़ा पीछे जाकर देखना होगा। 2 जनवरी 2016 को पठानकोट और फिर 18 सितंबर 2016 को उरी में हमला हुआ। इसमें पाकिस्तान का हाथ था। इसके बाद से भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को घेरने की कवायद शुरू की। इस्लामाबाद में 9-10 नवंबर 2016 को आयोजित सार्क सम्मेलन में कई मुल्कों ने हिस्सा न लेने का ऐलान किया था, जिनमें भारत प्रमुख था।’

स्वर्ण सिंह बताते हैं कि 2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे थे तो उन्होंने सार्क देशों के प्रमुखों को आमंत्रित किया, जिनमें तब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के तौर पर नवाज शरीफ भी शामिल हुए थे। नवाज शरीफ के पारिवारिक आयोजन में पीएम मोदी अचानक पाकिस्तान पहुंच गए। ये सारी कवायद इसलिए की जा रही थी कि दोनों देशों के बीच रिश्तों में मधुरता बनी रहे, लेकिन यह सब कुछ आगे नहीं बढ़ पाया और भारत को पठानकोट, उरी के रूप में जख्म झेलने पड़े।

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