मोदी जी! आपकी सांसद आदर्श ग्राम योजना भी विफल हो गयी

अखिलेश अखिल

प्रधानमंत्री मोदी की बहुप्रचारित सांसद ग्राम योजना की सफलता पर सवाल उठने लगे हैं। पीएम मोदी ने बड़े ही अरमान के साथ इस योजना की घोषणा की थी। पीएम की समझ थी कि देश के सांसद ग्रामीण भारत की बात करते रहते हैं ऐसे में अगर एक सांसद पांच साल में भी तीन गाँव को आदर्श बना देंगे तो ग्रामीण भारत की तस्वीर बदल जायेगी। इस योजना के पीछे प्रधानमंत्री का इरादा बिल्कुल साफ़ था और वे वाकई ग्रामीण भारत को चमकाने चाह रहे थे। लेकिन अब जब सरकार के चार साल हो गए हैं और आदर्श गांव को लेकर जो बातें सामने आ रही है,चौंकाती है और सांसदों के बड़बोलेपन की भी कलई खोलती है। आंकड़े बता रहे हैं कि जिन सांसदों को पहले चरण में एक एक आदर्श गांव चयन करने को कहा गया था उसमे भी बहुत सारे सांसद किसी गाँव को अपना नहीं सके हैं। कुछ सांसदों ने 2 गाँव को तो गोद ले लिया लेकिन आदर्श गाँव कोई नहीं बन सका। कुछ सांसद तीन गाँव को गोद लेकर प्रधानमंत्री के सामने अपनी रुतवा बढ़ाने की कोशिश तो की लेकिन उनके गाँव आजतक आदर्श होने के बाट जोह रहे हैं।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 अक्टूबर 2014 को महत्वाकांक्षी सांसद आदर्श ग्राम योजना की शुरुआत की थी। इसके तहत प्रत्येक सांसद को 2019 तक तीन गांवों में बुनियादी और संस्थागत ढांचा विकसित करने की जिम्मेदारी दी गई थी। सांसदों को एक आदर्श गांव 2016 तक विकसित करना था। लेकिन देश के करीब 80 फीसदी सांसदों ने पीएम नरेंद्र मोदी की एक अपील को लगभग नजरअंदाज कर दिया है। पीएम ने सभी सांसदों से मई 2019 तक सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत 3 गांव विकसित करने की अपील की थी।

जो जानकारी सामने आ रही है उसके मुताबिक अब तक मात्र 19 फीसदी सांसदों ने ही इस योजना के तहत तीन गांवों को चुना है। 88 फीसदी सांसदों ने एक गांव को गोद लिया है, जबकि 59 फीसदी सांसद दो गांवों को इस योजना के तहत चुन चुके हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, अब तक 1314 गांवों को चिह्नित किया जा चुका है, जहां पर 42 फीसदी काम पूरा हो चुका है।

योजना के कार्यान्वयन में हो रही देरी को देखते हुए ग्रामीण विकास मंत्रालय ने राज्य के मुख्यमंत्रियों और सांसदों को चिट्ठी लिखकर कहा है कि वह जल्द विकास के लिए गांवों को चिह्नित करें और पीएम के टारगेट को हासिल करें। लेकिन कोई भी सांसद अब यह काम करना नहीं चाहते। उनकी रूचि है ही नहीं। संभव हो कि इसमें कमाई नहीं दिखती हो या फिर दूसरे गाँव वाले नेता जी बिदक जाएंगे यह भी वजह हो सकती है। सबसे मजे की बात बीजेपी सांसदों को लेकर है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ विपक्षी दलों के सांसद ही इस योजना का लागू करने में धीमे हैं। बीजेपी के सांसद भी पीएम के इस महत्वाकांक्षी काम में पिछड़ रहे हैं। 191 बीजेपी सांसदों ने अब तक इस योजना के तहत तीसरे गांव का चयन नहीं किया है। जबकि 84 सांसदों ने दूसरे गांव का चयन नहीं किया है। लेकिन कोई भी गाँव अभी तक आदर्श कहलाने लायक नहीं है।

इसी तरह राज्यसभा के मात्र 12 बीजेपी सांसदों ने ही इस योजना के तहत तीनों गांवों को विकास के लिए चुना है। जबकि 20 सांसदों ने अब तक दूसरे गांव का चयन नहीं किया है। हालांकि, सभी बीजेपी सांसदों ने कम से कम एक गांव का चयन जरूर कर लिया है। बता दें कि इस योजना के तहत कोई विशेष फंड सांसदों को नहीं दिया गया है। सांसदों से अपेक्षा की गई है कि वह अपने राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल कर केंद्र की योजनाओं को इन गांवों में ठीक तरीके से लागू करवाएं। कई लोग यह भी मान रहे हैं कि चुकी इस काम के लिए सांसदों को कोई रकम नहीं दी जा रही है इसीलिए किसी सांसद की इसमें रूचि नहीं है।

ग्रामीण विकास मंत्रालय से जुड़े एक अधिकारी का कहना है कि सांसदों को पत्र लिखकर इस काम को जल्द पूरा करने को कहा जा रहा है, लेकिन सांसद इसके लिए राजनीतिक कारणों का हवाला देते हैं। सांसदों का कहना है कि एक गांव को चुनने से दूसरे गांव के लोगों की नाराज होने की संभावना रहती है। लिहाजा, ऐसा बहुत सावधानी से करना पड़ता है। प्रधानमंत्री आदर्श ग्राम योजना को जो हालत है उससे तो यही लगता है कि इस देश के नेता कोई भी काम करने में रूचि नहीं लेते। ऐसे में सवालयः भी उठ रहा है कि जब सांसद एक गाँव को विकसित नहीं कर सकते तब पुरे देश को विकसित करने की बात किसी ठगी और जुमले से कम नहीं।

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