मोदी सरकार के खिलाफ सोमवार को अविश्‍वास प्रस्‍ताव लाएगा विपक्ष

दिल्ली ब्यूरो: तमाम विपक्षी दलों को पता है कि मोदी सरकार पूर्ण बहुमत में है और उसकी सरकार को कुछ नहीं हो सकता और ना ही कोई डिगा सकता है बावजूद इसके विपक्ष सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लेकर आ रहे हैं। यह सब सरकार पर दबाब बनाने जैसा है और विरोध करने का एक संविधानिक जरिया भी। बता दें कि आंध्रा को विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए राज्य की तेलुगू देशम पार्टी के नेता और मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और वाईएसआर कांग्रेस पार्टी मोदी सरकार पर दबाब बना रहे थे लेकिन सरकार ने उनकी मांग को ख़ारिज कर दिया।

इसके बाद टीडीपी ने एनडीए से अपना नाता भी तोड़ लिया। उधर टीडीपी की विरोधी पार्टी वाईएसआर कांग्रेस और उसके नेता जगनमोहन रेड्डी भी अपनी राजनीति को गति देने के लिए भी विशेष राज्य की मांग पर अड़े हुए हुए हैं। आंध्रा में दोनों पार्टी एक दूसरे के विरोधी हैं लेकिन आसन्न चुनाव को देखते हुए दोनों विशेष राज्य की मांग पर एक हो गए हैं। अब ये दोनों आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा ना दिए जाने के विरोध में केन्द्र की मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला रहे हैं।

मोदी सरकार के खिलाफ लाए जा रहे पहले अविश्वास प्रस्ताव को कई अन्य दलों का भी समर्थन मिलता दिख रहा है। कांग्रेस, एआईएडीएमके, टीएमसी, एनसीपी और सीपीएम जैसे बड़े दलों ने भी अविश्वास प्रस्ताव को समर्थन देने का ऐलान कर दिया है। हालांकि अविश्वास प्रस्ताव के खिलाफ सरकार मजबूत दिखाई दे रही है, क्योंकि पार्टी अपने दम पर ही जरुरी बहुमत जुटा लेने की स्थिति में है। बता दें कि इससे पहले साल 2003 में तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के खिलाफ भी कांग्रेस अविश्वास प्रस्ताव लेकर आयी थी।

साल 2003 में तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार देश की पहली ऐसी गैर-कांग्रेसी सरकार बनने जा रही थी, जिसने अपना कार्यकाल पूरा किया हो। इसी बीच अगस्त 2003 को तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के नेतृत्व में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। इस अविश्वास प्रस्ताव का आधार बना भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे जॉर्ज फर्नांडिस की केन्द्रीय मंत्रीमंडल में वापसी। बहरहाल अटल बिहारी वाजपेयी सरकार अविश्वास प्रस्ताव के दौरान बहुमत साबित करने में सफल रही और उसके पक्ष में 312 वोट पड़े। जबकि विपक्ष में 186 वोट। एआईएडीएमके चीफ जे.जयललिता और नेशनल कांफ्रेंस के फारुख अब्दुल्ला ने जहां वोटिंग से परहेज किया, वहीं बसपा सुप्रीमो मायावती ने सरकार के पक्ष में वोट किया। उल्लेखनीय है कि अविश्वास प्रस्ताव के बाद 4 राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए और उनमें से तीन में भाजपा ने जीत हासिल की।

नियमों के अनुसार, सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए 50 सांसदों की मंजूरी जरुरी होती है। जब 50 सांसद सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का समर्थन करते हैं, तभी लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया शुरु होगी। टीडीपी के जहां 16 सांसद हैं, वहीं वाईएसआर कांग्रेस के 9। अब चूंकि कई विपक्षी दलों ने अविश्वास प्रस्ताव को समर्थन दे दिया है तो सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए जरुरी आंकड़ा मौजूद है। वहीं 545 सदस्यीय लोकसभा में फिलहाल 536 सांसद है, जिनमें से सरकार को बहुमत साबित करने के लिए 272 सांसदों की जरुरत होगी। अब चूंकि भाजपा के ही संसद में 273 सदस्य हैं, ऐसे में भाजपा अपने अकेले के दम पर ही बहुमत साबित कर लेगी।

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