---- 300x250_1 ----
--- 300x250_2 -----

मोदी से आगे निकले योगी

बीते 38 साल से यूपी की जनता की जेब कटती रही और सूबे के सीएम और मंत्री मौज लेते रहे। मामला इनकम टैक्स का है। दरअसल, विश्वनाथ प्रताप सिंह ने सीएम रहते ऐसा कानून पास कराया, जिसके तहत यूपी के सीएम और मंत्रियों के वेतन से बनने वाला इनकम टैक्स वे खुद नहीं देते थे। सीएम और मंत्रियों का इनकम टैक्स यूपी के खजाने से भरा जाता था। खजाना मतलब जनता की गाढ़ी कमाई से सरकार को मिली रकम। खास बात यह कि मलाई खाने के इस पूरे मामले में किसी भी दल से चुने हुए मुख्यमंत्री या मंत्री ने आवाज नहीं उठाई। शायद इसलिए कि खुद का फायदा भला किसे नहीं भाता।

दरअसल, यूपी में 1981 में एक कानून क्या बन गया, सारे सीएम और मंत्री मलाई काटते रहे। चाहे वह वीपी सिंह हों, एनडी तिवारी हों, मुलायम सिंह यादव हों, कल्याण सिंह हों, राजनाथ सिंह हों, मायावती हों या अखिलेश यादव, ये सभी सीएम रहे और ढेरों मंत्री बनाए। सभी सीएम व मंत्री वेतन भी लेते रहे, लेकिन खुद इनकम टैक्स कभी नहीं भरा। अब तक यानी बीते 38 साल में हर मुख्यमंत्री और उनके मंत्रियों का इनकम टैक्स सूबे की जनता से मिले टैक्स से भरने वाले सरकारी खजाने से चुकाया जाता रहा। साल 1981 में जब इस बारे में कानून बना था, तब वीपी सिंह सीएम थे। इस कानून के पीछे उनकी दलील थी कि ज्यादातर मंत्री गरीब हैं, इसलिए उनका इनकम टैक्स सरकारी खजाने से भरा जाना चाहिए। तब से लेकर अब तक के सभी सीएम और उनके करीब 1000 मंत्रियों ने इस कानून का जमकर लाभ उठाया। अब सीएम योगी आदित्यनाथ ने यह परंपरा बंद कर दी है। लेकिन बीते दो साल में योगी और उनके मंत्रियों के इनकम टैक्स के तौर पर 86 लाख रुपए सरकारी खजाने से दिए जा चुके हैं।

मुख्यमंत्री और मंत्रियों को गरीब बताते हुए उनके इनकम टैक्स का भुगतान सरकारी खजाने से करने के लिए वीपी सिंह के कार्यकाल में की गई यह व्यवस्था बहुत ही हास्यास्पद थी। अगर मान लिया जाए कि 1981 में मुख्यमंत्री और मंत्री गरीब थे, तो सवाल उठता है कि तब गरीबी का पैमाना क्या था और अब क्या है? वीपी सिंह के कार्यकाल में किए गए इस प्रावधान के बाद अब बेहतर यह होगा कि अरबपति हो चुके इन माननीयों की संपत्ति का पूरा हिसाब मांगा जाए। आखिर वह कौन सा जादुई चिराग था, जिसने इन मान्यवरों को उनके कार्यकाल के दौरान ही अकूत संपत्ति का मालिक बना दिया। अब जब योगी ने इस कानून को खत्म कर दिया है, तो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पीएल पुनिया कहते हैं कि फैसला सही नहीं लगता। इस पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। दिलचस्प तो यह है कि पूर्व वित्त मंत्री एवं बसपा नेता लालजी वर्मा समेत कई नेताओं को इस कानून की जानकारी नहीं है। उनका कहना है कि वह कर अदायगी करते रहे हैं। सपा के एक नेता ने भी कहा कि उन्हें ऐसी किसी सुविधा की जानकारी नहीं है। यूपी के विधि मंत्री बृजेश पाठक ने अधिकारियों से इसकी पुष्टि करने की बात कही। हालांकि राज्य के ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा ने कहा कि जो भी किया जा रहा है, कानून के अनुरूप किया जा रहा है।

अब जब देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री ने इतना कड़ा फैसला ले लिया है, तो ऐसी उम्मीद की जाने लगी है कि मंदी की मार झेल रही सरकार को बचाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी सांसदों और पूर्व सांसदों को मिलने वाले भत्तों और सुविधाओं को कम करने का निर्णय लेना चाहिए। इस तरह की सुविधाओं का बोझ सरकारी खजाने पर पड़ रहा है। वैसे भी इस बात में कोई संदेह नहीं है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों को बहुत ज्यादा सुविधाएं मिल रही हैं। इन सुविधाओं में इन प्रतिनिधियों के संसद या विधानमंडल का सदस्य नहीं रहने पर पेंशन के रूप में अच्छी-खासी रकम देने की व्यवस्था शुरू से ही आलोचना का केंद्र रही है। यही वजह है कि पूर्व सांसदों और उनके परिजनों को मिल रही पेंशन सुविधा का मामला पहले भी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था, लेकिन इसे चुनौती देने वाले एनजीओ लोक प्रहरी को सफलता नहीं मिली थी।

शीर्ष अदालत के न्यायमूर्ति जे. चेलामेश्वर और न्यायमूर्ति संजय किशन कौल ने अप्रैल, 2018 में इस याचिका को खारिज कर दिया था। केंद्र सरकार ने पूर्व सांसदों को मिलने वाली पेंशन और अन्य सुविधाओं को न्यायोचित ठहराया था। पूर्व सांसदों को आजीवन पेंशन, यात्रा सुविधाएं, टेलीफोन सुविधा, मुफ्त बिजली और पानी, देश में कहीं भी अपने जीवनसाथी के साथ जाने के लिए ट्रेन से असीमित यात्रा की सुविधा शामिल है। सबसे दुखद तो यह है कि देश में सामाजिक सुरक्षा योजना है नहीं और निजी क्षेत्र में कार्यरत कर्मचारियों की पेंशन की राशि मात्र 900 से लेकर 2500 रुपए तक ही है। योगी आदित्यनाथ के इस साहसिक कदम के बाद यह उम्मीद जगी है कि इससे प्रेरित होकर प्रधानमंत्री ही नहीं, बल्कि दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्री भी ऐसे कदम उठाएंगे जिससे निर्वाचित प्रतिनिधियों को मिलने वाले भत्तों और अन्य सुविधाओं पर पुनर्विचार करके उन्हें तर्कसंगत बनाया जा सके।

आलोक निगम की कलम से

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया The Lucknow Tribune के  Facebook  पेज को Like व Twitter पर Follow करना न भूलें...
Loading...
-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
E-Paper