मोदी हैं, तो मुमकिन है…

लखनऊ: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कमाल की शख्सियत हैं। अपने भाषण में नाटकीयता करना उन्हें बखूबी आता है। चुनावी मौसम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभिनेता अक्षय कुमार को दिए एक इंटरव्यू में भी बड़े सियासी संदेश दिए। इस इंटरव्यू में मोदी ने ममता की तारीफ की, तो गुलाम नबी आजाद को अपना मित्र बताने से नहीं चूके। मोदी ने अपने राजनीतिक विरोधियों का जिक्र ऐसे वाकयों को बताने में किया, जिसके बड़े निहितार्थ निकाले जा रहे हैं। इसी तरह मोदी जब चुनावी सभाओं में भाषण देते हैं, तो इतनी सफाई से अपनी बात कह जाते हैं कि चुनाव आयोग भी कुछ नहीं कर पाता। यही तो है मोदी की कला।

चलाये दोस्ती के तीर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वाक्पटुता का जवाब नहीं है। भारत का शायद ही कोई प्रधानमंत्री ऐसा हुआ हो, जो मोदी की तरह वाक्पटु रहा हो। इसके अलावा मोदी को इस बात का भी भलीभांति ज्ञान है कि कौन सी बात किस समय बोलनी है। तभी तो अभी तक विपक्ष के नेताओं का जिक्र केवल उनकी नाकामियों और खामियों को गिनाने के लिए करने वाले मोदी के सुर एकाएक बदल गए। चुनावी मौसम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार को एक गैर राजनीतिक इंटरव्यू दिया, जिसको मीडिया में भी खूब हाइप मिली। लेकिन इस इंटरव्यू में भी मोदी ने बड़े सियासी संदेश दे दिए। मोदी ने इस इंटरव्यू में अपने राजनीतिक विरोधियों का जिक्र ऐसे वाकयों को बताने में किया, जिसके बड़े निहितार्थ निकाले जा रहे हैं।

इंटरव्यू में मोदी ने जहां गुलाम नबी आजाद को अपना दोस्त बताया, वहीं अपनी धुरविरोधी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बारे में कहा कि वह उन्हें हर साल कुर्ते और मिठाई भेजती हैं। आजाद के बारे में मोदी ने बड़ी बेबाकी से कहा कि उनसे दोस्ती उस जमाने से है, जब मोदी मुख्यमंत्री भी नहीं थे। मोदी बताते हैं कि एक बार वह किसी काम से संसद गए थे। वहां गुलाम नबी आजाद और मोदी बड़े दोस्ताना अंदाज में गप्पे मार रहे थे। मोदी बताते हैं कि हमें इस तरह बातें करते देख मीडिया वालों ने कहा कि तुम संघ वाले हो और आजाद से दोस्ती कैसे हो गई। इसका गुलाम नबी आजाद ने अच्छा जवाब दिया। उन्होंने कहा कि देखो भाई बाहर आप लोग जो सोचते हो वैसा नहीं है। शायद फैमिली के रूप में हम सभी दलों के लोग जितने जुड़े हुए हैं, वह आप लोग सोच नहीं सकते। कुछ इसी तरह मोदी ने अपनी धुरविरोधी ममता बनर्जी के बारे में बड़ी ही चतुराई से वह बात कह दी, जो शायद ममता के लिए ही गले की फांस बन गई। मोदी ने कहा कि दीदी आज भी साल में एक-दो कुर्ते भेजती हैं। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की तरह दीदी मिठाई भी जरूर भेजती हैं। हालांकि मोदी इस दौरान यह ताकीद करना भी नहीं भूलते कि हो सकता है कि इससे उन्हें चुनाव में नुकसान हो। यहां मोदी जिस नुकसान की बात कर रहे हैं, दरअसल वह नुकसान कम और नफा ज्यादा है।

दरअसल, ममता बनर्जी के अब तक के चुनावी प्रचार में ‘हिट लिस्ट’ में मोदी ही रहे हैं। बंगाल से बैठकर दिल्ली में निशाना साधते हुए दीदी कई बार पीएम मोदी को आड़े हाथ ले चुकी हैं। जाहिर है कि ममता का प्रचार मोदी विरोध के ही इर्द-गिर्द रहा है। ममता बनर्जी पूरे बंगाल में मोदी का विरोध करके ही अपने पक्ष में हवा बनाने का प्रयास कर रही हैं। ऐसे में मोदी का यह कहना कि दीदी उन्हें हर साल कुर्ते और मिठाई भिजवाती हैं, ममता बनर्जी के मोदी विरोध का दावा कमजोर करता है। पश्चिम बंगाल में अभी 32 सीटों पर चुनाव होने हैं। पीएम मोदी बखूबी जानते हैं कि उनके इस बयान से बंगाल में बड़ा संदेश जाएगा।

इसके साथ ही मोदी के बयान का एक पहलू और है। मौजूदा वक्त में भाजपा की हालत 2014 जैसी नहीं है। तमाम सर्वे में भी ऐसा ही अनुमान लगाया जा रहा है। जीएसटी, नोटबंदी, और राफेल जैसे मुद्दों पर पूरा विपक्ष उन्हें घेरने की कोशिश कर रहा है। यूपी में बसपा-सपा की दोस्ती भी मोदी लहर में पलीता लगाती दिख रही है। यानी इस बार यूपी में 73 और देश में 300 से ज्यादा का भाजपा का दावा कमजोर दिख रहा है। ऐसे में अगर 23 मई के बाद सरकार बनाने में कुछ नंबर कम पड़े, तो भाजपा के पास जोड़-तोड़ की कुछ तो गुंजाइश रहे। दीदी के लिए मोदी के नरम बोल को इस गुंजाइश से भी जोड़कर देखा जा रहा है। यहां यह गौर करने वाली बात यह है कि पश्चिम बंगाल में अभी 32 सीटों पर चुनाव होने हैं। यानी बंगाल की असली पिक्चर अभी बाकी है। और इसकी शुरुआत में ही मोदी ने ममता बनर्जी पर एक गैर राजनीतिक इंटरव्यू में कुर्ते और मिठाई की बात बोलकर बेहद चालाकी भरा दांव चला है। इसके साथ ही मोदी ने गुलाम नबी आजाद को भी ‘दोस्त’ बताकर साधने की कोशिश की है, क्योंकि आजाद राज्यसभा में कांग्रेस के नेता हैं और इस उच्च सदन में अभी भी भाजपा के पास बहुमत नहीं है। खैर, पीएम मोदी ने तो अपना दांव चल दिया है।

पकड़ पाना नामुमकिन

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा हड़काए जाने के बाद पक्ष-विपक्ष के चार नेताओं को उनकी सांप्रदायिक या अभ्रद भाषा के लिए दो दिन से लेकर तीन दिनों तक की चुप्पी की सजा दे दी। लेकिन बाकियों पर ऐक्शन कब लेगा चुनाव आयोग, खासकर हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर, जो अपने चुनाव भाषणों में वही और वैसी ही बातें कहते आए हैं। लेकिन चुनाव आयोग ने एक बार भी उनके खिलाफ कोई ऐक्शन नहीं लिया। ताजा उदाहरण बालाकोट वाला बयान है, लेकिन उसके बाद भी एक सांप्रदायिक भाषण दिया है मोदी ने जिस पर आयोग ने रिपोर्ट तक नहीं मांगी।

बालाकोट के लातूर की एक रैली में मोदी ने कहा था कि ‘पहली बार वोट डाल रहे (युवा) क्या अपना वोट बालाकोट पर हवाई हमला करने वाले वीरों को समॢपत कर सकते हैं? क्या वे अपना पहला वोट पुलवामा के शहीदों के नाम पर समॢपत कर सकते हैं?’ चुनाव आयोग ने निर्देश दिया था कि राजनीतिक दल सशस्त्र बलों का उल्लेख अपने भाषण और प्रचार में न करें। मोदी ने उसके निर्देश को ठेंगा दिखाते हुए अपने भाषण में पुलवामा और बालाकोट का जिक्र किया, लेकिन आयोग उन पर कोई कार्रवाई नहीं कर पा रहा। क्यों नहीं कर पा रहा? क्योंकि मोदी ने बालाकोट का जिक्र किया, लेकिन यह तो नहीं कहा किसी से कि वे अपना वोट भाजपा के पक्ष में दें।

दरअसल, मोदी की यही खूबी है कि वह अपनी बात कह जाते हैं और कोई उनको पकड़ भी नहीं पाता। कैराना में भी उन्होंने यही किया। 5 अप्रैल को वहां एक चुनावी सभा में मोदी ने कहा, ‘याद करिए जब दिल्ली में महामिलावटी सरकार थी और यहां समाजवादी पार्टी की सरकार थी। जाति और धर्म के आधार पर अत्याचार किए गए। कैसे जुल्म हुए, बेटियों के साथ क्या-क्या अन्याय हुआ, कितना अत्याचार हुआ, वह सब याद है ना, याद रखेंगे ना?’ मोदी अगस्त-सितम्बर 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगों का हवाला दे रहे थे, जिसमें 42 मुसलमानों और 20 हिंदुओं समेत 62 लोग मारे गए थे।

2002 में गुजरात में दंगे हुए, लेकिन मोदी नहीं चाहते कि कोई उन दंगों को याद करे। इंटरव्यू के दौरान कोई पत्रकार उनसे इसके बारे में सवाल पूछता है तो वह उठकर चले जाते हैं या उसे प्लेन से उतार देते हैं। लेकिन 2019 में वह 2013 के मुजफ्फरनगर को कैराना के ‘लोगों’ को याद दिलाना चाहते हैं कि ‘उनकी’ बेटियों के साथ क्या हुआ। जब वह ऐसा कहते हैं, तो उनका इशारा साफ-साफ उन हिंदू स्त्रियों की तरफ ही होता है जिनके साथ मुसलमान दंगाइयों ने अत्याचार किया, क्योंकि उनकी रैली में जो भीड़ है, वह हिंदुओं की है। भाजपा का जो कोर वोटर है, वह हिंदू है। लेकिन उनका भाषण सुनें या पढ़ें, तो आप सीधे तौर पर उन पर कोई आरोप नहीं लगा सकते कि वह धर्म के आधार पर वोट मांग रहे हैं।

मोदी जब सीएम थे तब भी इसी तरह इशारों-इशारों में अपनी बात कहते थे। मुझे उनका एक चुनावी भाषण आज भी याद है जिसमें उन्होंने कहा था, ‘कांग्रेस यदि सत्ता में आई तो मुख्यमंत्री कौन बनेगा? अहमद मियां पटेल। क्या आप लोग अहमद मियां पटेल को मुख्यमंत्री बनाना चाहते हो?’ साफ है, जवाब ना में होगा। मोदी ने न हिंदू कहा, न मुसलमान कहा, बस अहमद पटेल के नाम के बीच ‘मियां’ लगा दिया, लेकिन मतलब साफ हो गया। 2002 में जब तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह ने दंगों के कारण चुनावी तारीखों को पीछे किया, तो मोदी जी खफा हो गए। लिंगदोह ने वही काम किया जो किसी भी चुनाव आयुक्त को करना चाहिए था, ताकि चुनाव भय और घृणा के माहौल में न हो। लेकिन मोदी और भाजपा ने इसे एक अलग रंग दे दिया कि चूंकि लिंगदोह ईसाई हैं और सोनिया भी ईसाई हैं, इसलिए वह ऐसा कर रहे हैं।

अब मोदी भरी सभा में यह तो नहीं कह सकते कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने ‘ईसाई होने के कारण’ चुनाव जल्दी कराने में रोड़े अटकाए, तो उन्होंने एक निराला रास्ता निकाला। वह भाषणों में लिंगदोह का पूरा नाम लेते थे- जेम्स माइकल लिंगदोह ताकि जिनको न पता हो कि लिंगदोह ईसाई हैं, उनको भी पता चल जाए और यह संदेश हिंदू वोटरों तक पहुंच जाए। यही मोदी की खूबी है कि वह अपना काम कर भी जाते हैं और कोई उनको पकड़ भी नहीं पाता, बिल्कुल उस अपराधी की तरह जो चेहरा छुपाकर और ग्लव्ज पहनकर जुर्म करता है ताकि सीसीटीवी में तस्वीर आ भी जाए या हथियार बरामद भी हो जाए तो न चेहरा दिखे, न उसकी उंगलियों के निशान कहीं नजर आएं।

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