यह कैसा न्याय है साहेब! 15 लाख मिले नहीं उलटे हम 6 हजार के कर्जदार हो गए

अखिलेश अखिल

मोदी सरकार से लगी आस अब टूट रही है। चार साल गुजर गए कुछ मिला नहीं। उलटे बेकारी की मार अलग से लगी। सरकार कहती है कि सब कुछ बदल गया है लेकिन जब मजूरी भी छीन जाय तब सरकार के बोल बकलोल जैसे ही तो लगते हैं। सबसे बड़ी आस लगी थी 15 लाख रूपए की। यही वह आस थी कि लोगों ने अपना धर्म ,जाति ,समाज ,जान पहचान ,गिरोहबंदी को भी धत्ता बताकर मोदी जी के पक्ष में वोट दिया था लेकिन सब बेकार गया। अब सब कहते हैं कि वह सब जुमला था।

क्या देश का कोई बड़ा नेता जनता से जुमला कहता है। यह तो धोखा है जी। देश की जनता पहले भी ठगी जाती थी लेकिन ऐसी ठगी और झूट कभी नहीं। लेकिन अब सहा नहीं जाता। जबसे यह जानकारी मिली है कि देश के अमीरोँ ने बैंक लूटकर हमें ही कर्जदार बना डाला तो अब सहने की सीमा जाती रही। हम इसका बदला लेंगे। कुछ इसीतरह की बातें आजकल लोग करते फिर रहे हैं। देश के जिस इलाके में आप चले जाएँ गरीबो की आवाज कुछ इसी तरह की निकल रही है।

पता चल रहा है कि देश में लगातार हो रहे बैंक घोटालों के कारण बैंकों का एनपीए बढ़ता जा रहा है। अब ये इतना बढ़ गया है कि अगर देश का हर व्यक्ति इसे चुकाना चाहे तो उसे हज़ारों रुपये देने होंगे। बैंकों का ये बढ़ता एनपीए उस पूंजीवादी व्यवस्था की कहानी बयान करता है जिसमें उद्योगपतियों को संसाधन मुहैय्या कराए जा रहे हैं और उसके लिए वसूली आम जनता से की जा रही है। भारतीय बैंकों पर सितंबर 2017 तक नॉन परफॉर्मिंग एसेट (एनपीए) या डूबत कर्ज़ 8.29 लाख करोड़ रुपए पहुंच गया है।

यानी यह बैंकों द्वारा बांटे गए कर्ज़ का वो पैसा है जिसकी रिकवरी की संभावना नहीं है। आसान भाषा में समझें तो यह इतना पैसा है कि देश की 133 करोड़ आबादी से अगर इस पैसे की वसूली की जाए तो हर शख्स को 6,233 रुपए देने होंगे। यानि कि माल्या और नीरव मोदी जैसे भगोड़ो की वजह से इस समय देश का हर व्यक्ति कर्ज़दार बन चुका है। ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष एस सिसोदिया कहते हैं कि एनपीए में बड़े उद्योगों का हिस्सा करीब 70 फीसदी है। उन्होंने कहना है कि बैंक तो आम आदमी को दिए लोन की आमदनी से चल रहे हैं।

उद्योगों को 4 फीसदी की दर पर लोन मिलता है और आम आदमी को 8 से 15फीसदी तक की दर पर। उद्योगों को दिए 100 रुपए के कर्ज़ में 19 रुपए डूब रहे हैं तो आम आदमी के महज़ 2 रुपए। वो भी बाद में वसूल हो जाते हैं। कमजोर से जबरन वसूली हो जाती है लेकिन ताकतवर से वसूली कौन करे ! जनता के पैसे से उद्योग और बैंक चले और दोनों मिलकर माल को हड़प जाए। क्या नीति है सरकार की।

खेल भी बड़ा विचित्र है। बीजेपी वाले कहते हैं कि एनपीए कांग्रेस का पाप है। हो भी सकता है। लेकिन हालिया एनपीए किसका पाप है यह भी तो कोई बताये। फिर पाप किसी का हो राष्ट्रवादी सरकार को कांग्रेस को भी जेल में बंद करना चाहिए और लुटेरे उद्योगपतियों को भी। ऐसा होता नहीं दिखता। 15 लाख देने की बात कहे थे अब हमें ही कर्जदार कर गए। अब सरकारी तंत्र का पाप जनता भोगे।

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