यूपी में गठबंधन बना तो बीजेपी साफ़ हो जायेगी !

दिल्ली ब्यूरो: दुनिया भर के आर्थिक और राजनीतिक मसलों पर पैनी नजर रखने वाले प्रसिद्ध स्तम्भकार रुचिर शर्मा का विश्लेषण आगामी लोक सभा चुनाव से जुड़े कई मसलों को साफ़ करता दिखता है। शर्मा ने अपनी आने वाली पुस्तक ‘डेमोक्रेसी ऑन रोड ‘ में बताया है कि 80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश अगर सपा और बसपा के बीच राज्य में गठबंधन होता है, तो चुनाव में बीजेपी का सूपड़ा साफ कर देगा और गठबंधन नहीं होता, तो बीजेपी जीतेगी। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में अभी भी जाति के आधार पर वोट डाला जाता है।

शर्मा का विश्लेषण यह भी है कि नरेंद्र मोदी के 2019 में प्रधानमंत्री बनने के फिर से चांस घट गए हैं। विश्वभर के समाचार पत्रों के स्तंभकार के तौर पर लिखने वाले शर्मा ने बताया कि 2019 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना 99 फीसदी से 50 पर आ गई है। रुचिर शर्मा 24 चुनाव कवर कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि 2017 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना 99 फीसदी थी। लेकिन 2018 में यह घटकर 50 फीसदी रह गई है। बता दें कि शर्मा ने इसके पीछे कोई खास वजह नहीं बताई। उनके कहना है कि अलग-अगल बंटे विपक्ष के 2019 में एक साथ आने के संकेत बन रहे हैं। अपनी आने वाली किताब ‘डेमोक्रेसी ऑन रोड’ के लिए काम कर रहे रुचिर शर्मा ने कहा कि 2014 में बीजेपी 31 फीसदी वोटशेयर के साथ जीती थी क्योंकि उस समय विपक्ष बंटा हुआ था। सीटों का शेयर असंगत था और वोट एक जगह केंद्रित था।

शर्मा ने कहा 2019 के चुनाव एकदम अलग होने वाले हैं। अब नाटकीय रूप से आंकडों का अंतर बदल गया है। अब चुनाव 50-50 होने जा रहा है और गठबंधनों को ज्यादा अवसर मिलने जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि पूरी तरह से बंटा हुआ विपक्ष अब वास्तव में एकजुट होने के संकेत दे रहा है। कोई नहीं चाहता कि चुनाव नतीजे एक तरफा रहें। अर्थशास्त्री की विश्व की राजनीति पर गहरी नजर है, खासकर भारत पर।

रुचिर की आने वाली किताब संभवता 2019 चुनाव से पहले फरवरी में लॉन्च होगी। उनका दावा है कि चुनावों को लेंस के तौर पर इस्तेमाल करते हुए उनकी अंतदृष्टि उपलब्ध कराएगी कि भारतीय लोकतंत्र कैसे काम करता है। शर्मा के पास भारत में दो दर्जन चुनाव कवर करने का अनुभव है और वे यह काम 1990 से कर रहे हैं। 2004 के चुनाव को याद करते हुए वे बताते हैं, कि तब अटल बिहारी वाजपेयी के साथ भी आज जैसी स्थिति बन गई थी। उन्होंने कहा कि जब वाजपेयी के खिलाफ विपक्ष एकजुट होने लगा था, तब यही सवाल खड़ा हो गया था, कि वाजपेयी नहीं तो प्रधानमंत्री कौन बनेगा? और ऐसी स्थिति में चुनाव एक्सीडेंटल बन गया था।

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