यौन उत्पीड़न में उत्तर प्रदेश सबसे आगे,दिल्ली दूसरे नंबर पर

दिल्ली ब्यूरो: कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को लेकर देश में हाहाकार मचा हुआ है। मीटू अभियान के जरिए महिलाये उन लोगों की कलई खोल रही हैं जिन्होंने अपने पद का दुरूपयोग कर महिलाओं को यौन शोषण के बाध्य किया। मीटू अभियान के तहत बहुत सारे लोग नंगे हुए हैं लेकिन अभी भी बहुत सारे लोग बचते नजर आ रहे हैं। अगर यह अभियान चलता रहा तो बहुत सारे नकाब पॉश नंगे होंगे।

इसी बीच कुछ आंकड़े सामने आये हैं जो चौंकाते हैं। इस साल जुलाई में लोकसभा में यौन उत्पीड़न के मामलों से संबंधित आंकड़े पेश किए गए थे। इनके अनुसार उत्तर प्रदेश भारत का वह राज्य है जहां कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न के सबसे अधिक मामले दर्ज किए गए हैं। सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए आकंड़ों के अनुसार पिछले चार सालों के दौरान उत्तर प्रदेश में कार्यस्थल पर उत्पीड़न के 726 मामले दर्ज किए गए। यह देश भर में दर्ज ऐसे कुल मामलों का 29 फीसदी है। इसके बाद 369 मामलों के साथ राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली दूसरे स्थान पर रही। हरियाणा 171 मामलों के साथ तीसरे, 154 मामलों के साथ मध्य प्रदेश चौथे और 147 मामलों के साथ महाराष्ट्र पांचवें स्थान पर रहा। वहीं मेघालय और मणिपुर दो ऐसे राज्य हैं जहां 2015 से 2018 तक कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का एक भी मामला दर्ज नहीं किया गया।

उधर महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2014 से 2018 के बीच कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न के मामलों में 43 फीसदी का इजाफा हुआ है। साल 2014 में इस तरह के मामलों की संख्या 371 थी जबकि इस साल के शुरुआती सात महीनों में ही कार्यस्थलों पर उत्पीड़न के 533 मामले दर्ज किए जा चुके हैं। 2014 के बाद से ही उत्पीड़न के मामलों में भारी उछाल दर्ज किया गया है। 2014 के बाद से ऐसा कोई साल नहीं रहा जब यौन उत्पीड़न के मामलों की संख्या 500 के नीचे गई हो। अब तक इस लिहाज से 2017 सबसे खराब साल रहा। इस वर्ष कार्यस्थलों पर उत्पीड़न के 570 मामले दर्ज हुए।
साल 2015 से जुलाई 2018 तक यानी पिछले करीब चार सालों में कार्यस्थलों में यौन उत्पीड़न के कुल 2,535 मामले दर्ज हुए हैं। यह आंकड़ा रोज औसतन दो का है।

गौरतलब है कि इंडियन बार एसोसिएशन द्वारा 2017 में इसी सवाल को लेकर एक सर्वे किया गया थ। इस सर्वे में करीब छह हजार महिलाओं ने हिस्सा लिया था। सर्वे में शामिल लगभग 70 फीसदी महिलाओं का कहना था कि वे भविष्य में हो सकने वाले दुष्प्रभावों को ध्यान में रखकर यौन उत्पीड़न की शिकायत नहीं करतीं। कार्यस्थलों पर होने वाले उत्पीड़न पर शोध करने वाले अनघ सरपोतदार ने इंडियास्पेंड से बातचीत के दौरान बताया कि कार्यस्थलों पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न के खिलाफ आवाज न उठाना उस संस्था की लैंगिक संवेदनशीलता पर निर्भर करता है। कई बार महिलाएं अंतरिम समितियों के पास शिकायत लेकर जाने में इसलिए झिझकती हैं क्योंकि उन्हें समितियों की ईमानदारी पर ही शक होता है.

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