राजनीतिक दलों की आमदनी को कौन जांचे ?

अखिलेश अखिल

गजब का लोकतंत्र है। तमाम तरह की योजनाओं के जरिए देश की जनता की आमदनी का जायजा सरकार ले रही है। कौन क्या करता है, क्या खाता है, कहाँ से कमाता है, कितना कमाता है ,कितना टैक्स भरता है और कितना चोरी करता है ,सब की जानकारी सरकार लेने से नहीं चूकती। हालत यह है कि देश का आदमी अब सरकार की नजरों से बच नहीं सकता लेकिन राजनीतिक पार्टियां कहाँ से कमाती हैं ,कैसे कमाती है, उसका कोष कैसे भरता है, चन्दा कौन देता है, विदेश से पैसे कहाँ से आते हैं और अंत में किसी पार्टी की आमदनी कहाँ से होती है इसकी जानकारी देश के लोगों को नहीं है। लोग जानना चाहते है तो सरकार जानकारी देना चाहती नहीं। इस मामले में सभी राजनीतिक दल एक सामान है। जिस तरह अपना वेतन बढ़ाने के लिए सांसदों को जनता से पूछने की जरुरत नहीं होती उसी तरह पार्टी को चन्दा लेने और आमदनी बढ़ाने के लिए जनता से पूछने की जरूरत नहीं होती।

भाजपा की राजनीतिक ताकत बढ़ना इस बात से भी जाहिर होता है कि उसकी आमदनी 2015-16 में 570 करोड़ रुपये के मुकाबले 2016-17 में 1,034 करोड़ रुपये हो गई। हालांकि इस दौरान और भी पार्टियों की आमदनी बढ़ी है, लेकिन भाजपा ने इन सबको काफी पीछे छोड़ दिया है। वहीं दूसरी तरफ इससे जुड़ी सबसे बड़ी चिंता की बात यह सामने आई है कि इन पार्टियों की आमदनी का एक अहम हिस्सा अज्ञात स्रोतों से आया है। सरकार बीते सालों में भ्रष्टाचार रोकने की गरज से आम लोगों के तमाम तरह के नकद लेन-देन पर पाबंदियां लगाती रही है, लेकिन ऐसा लगता है कि राजनीतिक पार्टियों के लिए इस मामले में कुछ दूसरे ही मानदंड हैं।

भाजपा को 2016-17 के दौरान कुल 997 करोड़ रुपये का स्वैच्छिक चंदा मिला है और इसमें से 533 करोड़ रुपये उसे उन लोगों/स्रोतों से मिले जिनका योगदान 20 हजार रुपये से ज्यादा का है। कांग्रेस को चंदा देने वाले ऐसे लोगों की सूची आना अभी बाकी है। यह बड़ी दिलचस्प बात है कि बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को 2016-17 के दौरान कुल 75 करोड़ रुपये मिले और उसका दावा है कि उसे 20 हजार से ज्यादा की रकम का कोई चंदा ही नहीं मिला। अब यह किसी को नहीं पता कि भाजपा को बाकी के 464 करोड़ रुपये या बसपा को 75 करोड़ रुपये का चंदा आखिर कहां से मिला है. ऐसे में राजनीतिक पार्टियों का यह दावा करना स्वाभाविक ही है कि यह रकम उन्हें आम लोगों से मिली है जिन्होंने पसंदीदा पार्टी के लिए अपनी कड़ी मेहनत से कमाए रुपये चंदे में दिए हैं।

हालांकि अब यह नियम बन चुका है कि राजनीतिक पार्टियों को 2000 रुपये से ज्यादा का चंदा देने वाले हर व्यक्ति या स्रोत की पहचान उजागर करनी होगी। यह नियम वित्त वर्ष 2017-18 से लागू है। माना जा रहा है कि इससे पार्टियों को अज्ञात स्रोतों से मिलने वाले चंदे पर लगाम लग सकेगी। लेकिन अगर बसपा द्वारा उसे मिले चंदे के ब्यौरे पर नजर डालें तो पता चलता है कि नकदी का लेन-देन तब भी अज्ञात स्रोतों से मिले चंदे का एक बड़ा हिस्सा बना रह सकता है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले हर तरह के चंदे/दान का हिसाब रखा जाए और उसे सार्वजनिक किया जाए. यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि काले धन का एक बड़ा हिस्सा राजनीतिक पार्टियों को मिलता है या फिर चुनाव प्रचार में खर्च होता है।

कांग्रेस और भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियां भी अपने आमदनी-खर्च का ब्यौरा नियत तिथि के बाद आयकर विभाग में जमा करती हैं। दूसरी तरफ इन्हें अपने चंदा दाताओं का नाम गोपनीय रखने की भी छूट है। अब इन पार्टियों के साथ ही तमाम दूसरी पार्टियों को मिलने वाली यह रियायत बंद होनी चाहिए। आम नागरिक और कंपनियां अगर आयकर विभाग को अधूरी या गलत जानकारी देती हैं तो उन्हें इसका नतीजा भुगतना होता है, तो अब समय आ गया है कि राजनीतिक पार्टियों के साथ भी यही बर्ताव हो। राजनीतिक पार्टियों को चंदा देने के लिए अब इलेक्टोरल बॉन्ड की व्यवस्था तो बन गई है लेकिन इसमें भी पारदर्शिता का अभाव है। इनके इस्तेमाल के बावजूद मतदाताओं से यह जानकारी छिपाई जा सकती है कि राजनीतिक पार्टियों को कौन-कौन चंदा देता है. यह जानकारी मिलना नागरिकों का अधिकार है ताकि वे इसके आधार पर मतदान के समय अपना सही उम्मीदवार और पार्टी चुन सकें।

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