राजनीति के लिए खतरे का संकेत है ब्यूरोक्रेसी का उग्र रूपांतरण

उमेश त्रिवेदी

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के विधायकों की तथाकथिक बदसलूकी और करतूतों के खिलाफ दिल्ली के आईएएस अधिकारियों के असहयोग-आंदोलन की स्क्रिप्ट को पूर्ण विराम, अर्धविराम और अल्प विराम के संकेतों के साथ गहराई से ध्यानपूर्वक पढ़ा जाना जरूरी है। ‘बिटविन द लाइंस’ इस इबारत के कथानक में लोकतंत्र के लिए कई खतरे छिपे हैं। पंजाब नैशनल बैंक में नीरव मोदी के 11000 करोड़ और उसके बाद कानपुर की रोटोमैक कंपनी के देशभक्त (?) मालिक विक्रम कोठारी व्दारा 3800 करोड़ के नोटों की फसल काटने वाले हैरतअंगेज अफसानों के बीच दिल्ली का यह एपीसोड देश के लोकतंत्र को निरंकुश शासन प्रणाली के खतरनाक किनारों की ओर धकेल रहा है।

फिलहाल शंकाओं-कुशंकाओं के बीच दर-दर भटकता यह सवाल उन संयोगों को तलाश रहा है कि बजाय ब्यूरोक्रेसी दिल्ली में यह राजनीतिक-मिसाइल कहां से चली, कैसे चली और किसने चलाई? आईएएस अधिकारियों के संगठनों ने अधिकृत तौर पर मुख्य सचिव पर हमले का विरोध करते हुए आम आदमी पार्टी के नुमाइंदों की बदसलूकी की कड़े शब्दों में भर्त्सना की है। उनकी मांग है कि जब तक दोषियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होगी, वो नियमानुसार काम करेंगे। ‘वर्क टु रूल’ का यह हथियार किसी भी सरकार को ठप्प करने का सबसे महत्वपूर्ण औजार है। आम आदमी पार्टी इसलिए कठघरे में है कि प्रशासनिक मामलों में उसका ट्रेक-रिकार्ड हमेशा विवादास्पद रहा है।

बहरहाल, बैंक घोटालों से त्रस्त भारत के आर्थिक-परिदृश्य की शब्दावली में बात करें तो दिल्ली-एपिसोड का सबसे ज्यादा राजनीतिक-डिविडेंड भाजपा को मिला है कि अरबों-खरबों के बैंक-घोटालों में आरोपों की गोलाबारी से फिलवक्त उन्हें राहत मिल गई है। सरकार के सामने कठिन सवाल परोसने वाले टीवी एंकरों की फौज अरविंद केजरीवाल की ओर मुड़ गई है। कांग्रेस के लिए क्षणिक खुशी यह हो सकती है कि उसे दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार को बर्खास्त करने की मांग करने का मौका मिल गया है।

भाजपा या कांग्रेस, दोनों दलों के राजनेताओं को घटना पर इतना नही किलकना चाहिए, जितना कि वो किलक रहे हैं। भाजपा के लिए यह ज्यादा संगीन और गंभीर मसला है। उसे देश की सबसे ताकतवर और प्रभावशाली नौकरशाही के सवालों का समाधान करना है, जो किसी भी सरकार को बना-बिगाड़ सकती है। राजनेताओं और आयएएस अधिकारियों की भिड़ंत के किस्से अनहोनी नहीं हैं। सामान्यतौर पर आयएएस अधिकारी ऐसे मसलों को धीरता और गंभीरता के साथ निपटाने वाली कौम के रूप में पहचाने जाते हैं। इस मर्तबा आईएएस अधिकारियों की उग्रता गौरतलब है। यह प्रशासनिक थकान की ओर इंगित करती है। राजनीतिक व्यरवहार को लेकर उठे सवाल दिल्ली तक सीमित नहीं हैं।

वैसे आधी रात के इस घटनाक्रम का पूरा सच आना बाकी है, लेकिन आयएएस अधिकारी बखूबी जानते हैं कि किसी भी सरकार की कौन सी नस दबाने से कहां दर्द होता है? ‘वर्क टु रूल’ की खंदकों से अधिकारियों की यह गोलाबारी राजनीति को परास्त करने वाला सबसे उम्दा हथियार है। नौकरशाहों का यह रूप पहली बार देखने को मिल रहा है। दिल्ली के सचिवालय में आम आदमी पार्टी के नुमाइंदो को बुरी तहर से पीटा जाना भी चौंकाने वाला है। ब्यूरोक्रेसी की आड़ में भाजपा को आम आदमी पार्टी से राजनीतिक हिसाब-किताब करने से बचना चाहिए। ब्यूरोक्रेसी के उग्र-रूपान्तरण के सभी पहलुओं की गंभीर समीक्षा करते हुए घटना से जुड़े सही सवालों को एड्रेस करना चाहिए।

विधायिका, कार्य-पालिका और न्याय-पालिका का समन्वयकारी समागम देश के लोकतंत्र की बुनियाद माना जाता है। इनके बीच संघर्ष की परिस्थितियां लोकतंत्र के संतुलन को अपाहिज करने वाली हैं। दिक्कत यह है कि केन्द्र में मोदी-सरकार के गठन के बाद न्याय-पालिका से टकराव की कहानियां हमेशा मीडिया में सुर्खियां बनती रही हैं। केन्द्र सरकार और न्याय-पालिका के बीच स्थितियां अभी भी सामान्य नहीं हैं। दिल्ली-सरकार के जनप्रतिनिधियों से ब्यूरोक्रेसी का यह टकराव प्रशासनिक गलियारों में राजनीति और प्रशासन में इगो के नए कल्ट की शुरुआत है। राजनीतिक मर्यादाओं के साथ प्रशासनिक मर्यादाओं की जुगलबंदी को व्यवस्थित करने की जिम्मेदारी केन्द्र सरकार के सामने है।

सुबह सबेरे से साभार

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