राजन ,पनगढ़िया और सुब्रमण्यम गए अब किसकी बारी…

अखिलेश अखिल

मोदी सरकार को देख परख कर उनके अधिकतर आर्थिक सलाहकार या फिर वित्त मामले के एक्सपर्ट बाहर निकलते दिख रहे हैं। एक खबर यह भी आ रही है कि जिस तरह से सरकार और रिज़र्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल के बीच कई मसलों को लेकर तनाव चल रहा है ऐसे में शायद उर्जित पटेल भी राजन ,पनगढ़िया और सुब्रमण्यम की तरह ही अपना अलग रास्ता तय कर लेंगे। खबर के मुताविक उर्जित पटेल और सरकार के बीच कई आर्थिक और मौद्रिक मसलों को को टकराओ की स्थिति बनी हुयी है।

पहले रिज़र्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन चुके से निकल गए। राजन चाहते तो एक टर्म और रिज़र्व बैंक में रह सकते थे लेकिन वे रहना नहीं चाहे और समय से पहले ही निकल गए। राजन को लग गया था कि जिस ट्रैक पर मोदी सरकार चल रही है और जो निति वे बनाते दिख रहे हैं उसमे काम करना बहुत आसान नहीं है। राजन निकल गए। आज राजन विदेश की सेवा में लगे हैं। राजन के बाद अरविन्द पनगढ़िया नीति आयोग से निकल गए। पनगढ़िया नीति आयोग के उपाध्यक्ष थे। उनकी नियुक्ति मोदी सरकार ने ही की थी। पनगढ़िया जाने माने अर्थशात्री रहे हैं और उनका काम बड़े स्तर पर विदेशों में भी रहा है। दुनिया के नामचीन अर्थशात्रियों में शुमार पनगढ़िया भारत में आये थे भारत की आर्थिक दशा को बदलने। नहीं बदल पाए और खुद बदल कर चले गए। इसके बाद अब भारत सरकार के मुख्या आर्थिक सलाहकार अरविन्द सुब्रमण्यम जा रहे हैं। वे 31 जुलाई को अपना पद छोड़ देंगे। इसी बीच सरकार नए नए सलाहकार की तलाश भी कर रही है।

बता दें कि पिछले तीन सालों में अरविंद सुब्रमण्यम ऐसे तीसरे व्यक्ति हैं जो भारत से कोई शीर्ष आर्थिक पद छोड़कर वापस अकादमिक क्षेत्र में जा रहे हैं। 2016 में भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने बतौर गवर्नर दूसरा कार्यकाल नहीं मांगा। अपनी आर्थिक समझ के लिए जिन रघुराम राजन की ख्याति दुनिया भर में है, उन्हें सरकार ने भी दूसरे कार्यकाल का प्रस्ताव नहीं दिया। हालांकि, रघुराम राजन को लेकर सत्ता पक्ष के भीतर कई विवाद भी थे। केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी उनके खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे। राजन के बारे में यह भी कहा जा रहा था कि उन्हें कांग्रेस की अगुवाई वाली मनमोहन सिंह सरकार ने रिजर्व बैंक का गवर्नर बनाया था और उन्हें एक और कार्यकाल नहीं दिए जाने के पीछे यह तर्क भी दिया गया। ऐसे में उनकी विदाई से कुछ लोगों को बहुत अधिक हैरानी नहीं हुई थी।

लेकिन जिस तरह से पिछले साल नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने अपने पद से इस्तीफा देकर वापस अकादमिक क्षेत्र में लौटने की घोषणा की उससे यह तर्क भी खारिज हो गया कि कांग्रेस सरकार द्वारा नियुक्त लोगों को ही सरकार के कामकाज से परेशानी है। नीति आयोग बना ही मोदी सरकार के आने के बाद और अरविंद पनगढ़िया की नियुक्ति भी मोदी सरकार ने ही की थी। इसके बावजूद वे नीति आयोग छोड़कर चले गए. कहा तो यह भी जाता है कि वित्त मंत्री और खुद प्रधानमंत्री यह नहीं चाहते थे कि अरविंद पनगढ़िया छोड़कर जाएं लेकिन वे नहीं माने।

तो फिर सवाल उठता है कि अगर बयानों को सही मानते हुए यह मानें कि सरकार के अंदर सब सही ही चल रहा है तो फिर आर्थिक समझ के लिए वैश्विक तौर पर अपनी पहचान रखने वाले लोग क्यों अपने देश में काम करने का मौका छोड़कर अमेरिका में पढ़ाने को अधिक तरजीह दे रहे हैं। पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम का कहना है कि मोदी सरकार इन अर्थशास्त्रियों की बात सुनती ही नहीं है। वे यह भी दावा करते हैं कि नोटबंदी की जानकारी अरविंद सुब्रमण्यम को भी नहीं थी और जीएसटी पर भी उनकी सलाहों को दरकिनार किया गया। यही बात रघुराम राजन और अरविंद पनगढ़िया के बारे में भी कही जाती है। नीति आयोग ने योजना आयोग की जगह तो ली, लेकिन उसे योजना आयोग जैसे अधिकार नहीं मिले हैं। इसके अलावा नीति आयोग के कई प्रस्तावों पर सरकार ने उस तरह से ध्यान नहीं दिया जैसी उम्मीद अरविंद पनगढ़िया को थी।

बता दे कि मौद्रिक नीति को लेकर रघुराम राजन और मोदी सरकार में कई बार मतभेद उभरकर सामने आए. कुछ लोग तो यह दावा भी करते हैं कि राजन जिस तरह से बैंकों के एनपीए का अंदाजा लगाने के लिए उनके कामकाज की समीक्षा करा रहे थे, उससे भी सरकार का एक धड़ा उनसे नाराज था। राजन जब रिजर्व बैंक के गवर्नर थे तो उनके सामने भी नोटबंदी का प्रस्ताव आया था जिसे उन्होंने बोर्ड में चर्चा करने लायक भी नहीं समझा था। जानकारों के मुताबिक इसीलिए उर्जित पटेल को रिजर्व बैंक का गवर्नर बनाकर सरकार ने नोटबंदी का निर्णय लागू कराया।

लेकिन नोटबंदी पर जितनी किरकिरी उर्जित पटेल और रिजर्व बैंक की हुई, उसके बाद ऐसा लगता है कि पटेल भी अब सरकार के सामने तनकर खड़े हो गए हैं। यही वजह है कि कई बार मौद्रिक नीति पर उनके और सरकार के बीच मतभेद दिखता है। कुछ लोगों का तो यह भी दावा है कि अगर सरकार ने उर्जित पटेल पर अधिक दबाव बढ़ाया तो राजन, पनगढ़िया और सुब्रमण्यम की कड़ी में चौथा नाम पटेल का जुड़ सकता है।

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