राम मंदिर की ‘ब्लॉक-बस्टर’ सफलता के बाद भाजपा असमंजस में ?

राजनीति और न्याय-अन्याय की कसौटियों पर लगभग अयोध्या के 134 साल पुराने राम-मंदिर के कानूनी-विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के 1045 पेजों के वृहदाकार फैसले की परतों का विश्लेषण लंबे समय तक होता रहेगा, क्योंकि विभिन्न कोणों से होने वाली इसकी विवेचनाओं के ‘शेड्स’ इसके कैनवास के चरित्र को अपने-अपने तरीके से प्रभावित करने की कोशिश करते रहेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब राम मंदिर के इस ऐतिहासिक फैसले को हार-जीत की भावनाओं से परे रख कर आगे बढऩे की बात कर रहे हैं, तो उन्हें पता है कि वह जीते हैं और जिन लोगों से वह यह आह्वान कर रहे हैं, उन्हें भी इस विजयी-आह्वान में छिपी चेतावनी का अनुमान है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के आगे नतमस्तक होने या फैसले का सम्मान करने की दुहाई देने वाली भाव-भंगिमाएं इसी आह्वान में अन्तॢनहित चेतावनी का ‘बॉय-प्रॉडक्ट’ है। दिलचस्प यह है कि सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीशों ने हारने-जीतने वाले दोनों पक्षों को देश, काल और परिस्थितियों के उस मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां न वह चहक सकते हैं और न ही सिसक सकते हैं, न कलक सकते हैं और न ही बिलख सकते हैं। गौरतलब यह है कि समाज, समुदाय और संप्रदायों के बीच हार-जीत का यह फासला और उससे उपजे घाव स्पष्ट तौर पर ‘विजिबल’ (प्रकट) हैं और इन फासलों को पाटना तथा घावों को भरना लोकतंत्र की दुहाई देने वाले देश के कर्णधारों के सामने सबसे बड़ा असाइनमेंट है।

देश के हर तबके को इस बात का अहसास है कि वह इतिहास के उस खतरनाक मोड़ पर खड़े हैं, जिसे आगाह करने वाले साइन-बोर्ड पर लिखा है कि ‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’। राहत की बात यह है कि होनी-अनहोनी को टालने के लिए सभी तबके अपेक्षित सावधानी बरत रहे हैं। लेकिन, यह मुद्दा भी पूरी शिद्दत के साथ रूबरू है कि यह सावधानी कब तक बनी रहेगी? यह संयम कब तक कायम रहेगा? जेहन में कसमसाती जय-पराजय की लहरें कब तक शांत रहेंगी? क्योंकि समूचे देश में सांप्रदायिक मसलों में भाजपा की विश्वसनीयता हमेशा सवालिया रही है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के राजनीतिक करतब सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की ओर मुखातिब रहे हैं। राम मंदिर के ऐतिहासिक फैसले के नाजुक पलों में ये नेता देश की राजनीति को क्या और कैसा मोड़ देते हैं, यह सवाल लोगों के जेहन को कुरेद रहा है।

यदि हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले-दूसरे कार्यकाल का राजनीतिक विश्लेषण करें, तो पाएंगे कि उनके आने के बाद इन छह-सात वर्षों में देश की चुनावी राजनीति के चरित्र में 360 डिग्री का बदलाव हुआ है। सबसे पहले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने घोषित रूप से मुसलमानों को टिकट नहीं दिया था। उप्र में चुनावी सफलता हासिल करके भाजपा ने हिंदुत्व को देश की राजनीतिक-मुख्यधारा में तब्दील कर दिया है। उसी श्रृंखला में कश्मीर में धारा 370 का खात्मा करके भाजपा और आरएसएस ने जनमानस में हिंदुत्व के अपने एजेंडों को पुख्ता करने का काम किया है। अब राम मंदिर निर्माण का फैसला हिंदुत्व के ‘कॉरीडोर’ में भाजपा के राजनीतिक फसाने को ‘ब्लाक-बस्टर’ बना रहा है। मुसलमानों को किनारे करके आगे बढऩे की भाजपा की रणनीतिक पहल की ब्लॉक-बस्टर राजनीतिक सफलताओं ने राजनीतिक दलों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि सत्ता की लड़ाई में वह कौन सा रास्ता अख्तियार करें? अल्पसंख्यकों के मामले में उनकी रणनीति और सलूक क्या होना चाहिए?

बहरहाल, भाजपा की इस राजनीति का दूसरा पहलू भी है कि हिंदुत्व के नाम पर राजनीति में ताप पैदा करने वाले राम मंदिर, धारा 370 अथवा तीन तलाक जैसे उत्तेजक मुद्दे अब अपने अंजाम की ओर बढ़ चुके हैं। राम मंदिर के बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इशारा किया है कि अब मोदी सरकार के सामने कॉमन सिविल कोड का मुद्दा है, जिसे हाथ में लिया जाएगा। लेकिन सभी जानते हैं कि कॉमन सिविल कोड के मसले में राम मंदिर जैसी राजनीतिक सनसनी अंतॢनहित नहीं है। पिछले तीस-चालीस सालों में राम मंदिर के मुद्दे ने देश की राजनीति को लगातार झंझोडऩे का काम किया है। भाजपा के पुनरुत्थान में इस मुद्दे का महती योगदान रहा है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद यह सवाल भी उभरता है कि राम मंदिर बन जाने के बाद भाजपा की राजनीति का स्वरूप क्या होगा? भाजपा के साथ अन्य दलों को भी इन मुद्दे पर गंभीर चिंतन करना होगा। इन मुद्दों का अंतिम परिणति तक पहुंचना जहां खुद भाजपा के लिए चुनौती है, वहीं कांग्रेस सहित अन्य क्षेत्रीय दलों को भी अपनी राजनीतिक-संरचनाओं में बदलाव के लिए विवश होना पड़ेगा। क्योंकि अब देश को बुनियादी सवालों की ओर लौटना होगा, क्योंकि सांप्रदायिकता के नाम पर लोगों की मनोभावनाओं से खेलने का दौर अब खत्म होना चाहिए।

उमेश त्रिवेदी

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