लक्ष्य सेन: बैडमिंटन की सुनहरी खान

पर्वती राज्य उत्तराखंड देश की रक्षा के लिए हर घर से सेना में अपने सपूतों को भेजने, देशभर के श्रद्धालुओं को देवी-देवताओं के दर्शन-पूजन कराने और दुनियाभर के पर्यटकों को अपने बलिष्ठ वक्ष पर सैर कराने के लिए जाना जाता है। इसकी एक बड़ी खूबी, जो कल तक दुनिया की नजरों से पूरी तरह ओझल रही है, पर अब नहीं, वह है बैडमिंटन की सुनहरी खान। यह खान अल्मोड़ा जिले के सोमेश्वर में है, जिसमें से निकले 16 साल 11 माह के लक्ष्य सेन ने इसी 22 जुलाई को इंडोनेशिया के जकार्ता में एशियाई जूनियर बैडमिंटन चैम्पियनशिप जीतकर 53 वर्षों बाद फिर से राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे की मस्त फरफराहट तले गूंजते भारत के राष्ट्रगान जन गण मन अधिनायक जय हो भारत भाग्य विधाता…की मीठी धुन से समूचे एशिया को झंकृत कर दिया। लक्ष्य से पहले यह चैम्पियनशिप वर्ष 1965 में गौतम ठक्कर ने जीती थी। ठक्कर के बाद ओलंपिक रजत विजेता पीवी सिंधू ने वर्ष 2012 में यह उपलब्धि हासिल की थी। तो आइए, अब विस्तार से जानते हैं इस सपूत और उसकी बैडमिंटन फेमिली के बारे में।

सोने की खान से सोना ही निकलता है। यह चरितार्थ किया है अल्मोड़ा जिले में कोसी और साई नदी के छोर पर बसे सोमेश्वर में डीके सेन और निर्मला धीरेंद्र सेन के घर 16 अगस्त, 2001 को जन्मे लक्ष्य सेन ने। लक्ष्य जब घुटनों के बल चलता था, किसी कारण से रो देता था, तो उसके बब्बा चंद्र लाल सेन, जो अपने जमाने में राष्ट्रीय स्तर के बैडमिंटन प्लेयर थे, फुसलाने के लिए उसके नन्ही गदोरी पर बैडमिंटन की चिडिय़ा (शटल) रख देते थे। नन्हा लक्ष्य उसे पाकर खुश हो जाता। समय गुजरता गया। लक्ष्य बड़ा होने लगा। अपने पैरों पर दौडऩे लगा, तो उसके बब्बा ने उसे रैकेट पकड़ाना शुरू कर दिया। वह थोड़े फासले से चिडिय़ा उछालते, तो लक्ष्य अपने नन्हे और तेज कदमों से उसकी ओर भागता। फिर चिडिय़ा पर सधे हाथों से निशाना साधता।

संयुक्त परिवार में बच्चे अपने बब्बा की ही अंगुली पकड़ कर बड़े होते हैं, लेकिन लक्ष्य अंगुली की जगह रैकेट और चिडिय़ा पकड़ कर बढ़ रहा था। यह क्रम आहिस्ता-आहिस्ता आगे बढ़ता ही जा रहा था, क्योंकि तीन साल बड़ा लक्ष्य का भाई चिराग सेन भी शटल में मगन था। कुछ साल बाद दोनों भाइयों के बीच मुकाबला होने लगा था। पिता डीके सेन छुट्टियों में घर आते, तो वह भी इन बच्चों में घंटों रम जाते। रमना स्वाभाविक भी था, क्योंकि अल्मोड़ा में बैडमिंटन के पितामह कहे जाने वाले अपने पिता से शटल खेलने की एबीडी सीखकर ही डीके आगे बढ़े और बाद में साई स्पोट्र्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया में बैडमिंटन कोच बने थे। चिराग और लक्ष्य की मां निर्मला धीरेंद्र सेन बैडमिंटन प्लेयर, तो नहीं, लेकिन वह भी बैडमिंटन की बारीकियां जानती हैं। स्कूल टीचर होने के नाते वे दोनों बेटों की पढ़ाई पर विशेष ध्यान देतीं कि खेल के चक्कर में पढ़ाई न खराब हो जाये। इसलिए वह खेल और पढ़ाई दोनों में सामंजस्य बिठाती रहतीं। खैर, अब लक्ष्य और चिराग जब भी घर आते हैं, तो निर्मला की पुतलियां आंसुओं से तब लथपथ हो उठती हैं जब दोनों बेटे अपने विजयी जश्न के बीच मां को अपनी कामयाबी की एक-एक दास्तान सुनाते हैं।

चिराग और लक्ष्य के जीवन में तब बड़ा मोड़ आया जब वर्ष 2010 में डीके सेन अल्मोड़ा से बैडमिंटन के कई युवा खिलाडिय़ों को लेकर नेशनल रैंकिंग टूर्नामेंट के सिलसिले में बेंगलुरु गये। वह उस वक्त अल्मोड़ा में साई के बैडमिंटन कोच थे। बेंगलुरु में उनके बड़े बेटे चिराग ने पूर्व राष्ट्रीय चैम्पियन व प्रकाश पादुकोण बैडमिंटन एकेडमी (पीपीबीए) के चीफ कोच विमल कुमार को प्रशिक्षुओं को बैडमिंटन की सीख देते वक्त देखा, तो उनसे गहरे प्रभावित हो गया। चिराग ने अपने पिता से अपनी इच्छा जाहिर की। डीके ने अपने बेटे की बात विमल कुमार को बतायी, तो उन्होंने चिराग को पीपीबीए में लेने की रजामंदी दे दी। लक्ष्य ने बड़े भाई चिराग को विमल कुमार के सुघढ़ हाथों में जाते देखा, तो उसने भी पिता से कहा कि वह भी पीपीबीए में ही बैडमिंटन सीखेगा। पहले, तो उन्होंने उसे बहुत समझाया पर जब लक्ष्य नहीं माना, तो उन्होंने विमल कुमार को लक्ष्य की इच्छा से अवगत कराया। इस पर विमल कुमार सोच में डूब गये थे कि यह अभी बहुत छोटा है। अपने परिवार से कैसे दूर सकेगा। फिलहाल विमल ने लक्ष्य के खेल पर पैनी निगाह डाली, तो उन्हें उसमें कुछ खास नजर आया। इसके बाद उन्होंने लक्ष्य के लिए भी अपनी एकेडमी के द्वार खोल दिये। इसके बाद दोनों भाइयों का बोरिया-बिस्तर पीपीबीए में ट्रेनिंग लेने के लिए बंध गया। बब्बा समेत सभी परिजनों ने दोनों को शुभकामनाओं के बीच रोते हुए विदा किया। बब्बा 2013 में दुनिया से भी कूच कर गये।

डीके दोनों बच्चों को पीपीबीए में विमल कुमार के हवाले कर लौटने लगे, तो उन्हें लक्ष्य की चिंता ज्यादा परेशान किये हुई थी, क्योंकि लक्ष्य तब महज 10 साल का था। उन्हें फिक्र यह थी कि इतनी नन्ही उम्र में वह बिना मां के रह भी पाएगा या नहीं। उनकी चिंता का एक कोना यह भी था कि कहीं बड़े शहर का कोई नकारात्मक प्रभाव नन्हे लक्ष्य पर न पड़ जाए। फिलहाल उन्हें इस बात की तसल्ली थी कि लक्ष्य बड़े भाई चिराग के साथ रहेगा। चिराग वर्ष 2016 में जूनियर बैडमिंटन में सेकंड सीडेड था। भाई के नक्शेकदम पर चल रहा लक्ष्य अब भाई से भी आगे जा चुका है। यह वढ़त उसने वर्ष 2017 में तभी हासिल कर ली थी जब उस साल फरवरी में वह बीडब्ल्यूएफ (बैडमिंटन वल्र्ड फेडरेशन) वल्र्ड जूनियर रैंकिंग में नंबर 1 बना था। चिराग सेन भी इंटरनेशनल बैडमिंटन प्लेयर है। प्रकाश पादुकोण और विमल कुमार के गाइडेंस में ऊंचाइयां हासिल कर रहे दोनों भाइयों के बारे में मेंटर विमल कुमार कहते हैं, लक्ष्य की खेलने की स्टाइल यूं, तो थोड़ी अलग है, लेकिन टेम्परामेंट में वह बिल्कुल प्रकाश पादुकोण जैसा ही है। लक्ष्य बहुत ही शर्मीला है, लेकिन किसी चीज को ग्रहण करने में न केवल लगनशील है, बल्कि स्मार्ट भी है। लक्ष्य की खासियत है कि कोच खेल में उसे हल्का सा भी करेक्शन बताते हैं, तो वह फौरन उस पर अमल करता है। वह तकनीकी सलाह हासिल करने में, तो बिल्कुल भी समय नहीं लेता। उसमें वैसी ही जीवटता और परिपक्वता है जैसी साइना नेहवाल और पीवी संधू में है।

अब लक्ष्य की ताजा उपलब्धि के बारे में। लक्ष्य इसी 22 जुलाई को एशियन बैडमिंटन जूनियर चैम्पियनशिप में इंडोनेशिया के जकार्ता में टॉप सीडेड वल्र्ड नंबर-1 थाईलैंड के कुनलावुत विदितसरन को 21-19, 21-18 से हराकर चैम्पियन बना है। फाइनल मुकाबले के निर्णाक दूसरे गेम में 19-18 का अंक था। इसी अंक पर शटल को रिकवर करने के लिए लक्ष्य ने डाइव लगाई थी, लेकिन ऐसा करने में उसके दाहिने हाथ की एक अंगुली चोटिल हो गई। तब लक्ष्य ने डॉक्टर को बुलाया और स्वयं को संयत करने के लिए मेडिकल टाइम-आउट लिया। इसके बाद लक्ष्य ने दो तेज रैलियां लगाईं और स्कोर को 21-18 करते हुए चैम्पियन बन गया। इस बारे में कोच विमल कुमार कहते हैं कि लक्ष्य का मेडिकल टाइम-आउट लेना निर्णायक साबित हुआ। थाईलैंड का लड़का तब लक्ष्य को कैच कर रहा था। लक्ष्य ने गिरने के बाद चतुराई से ब्रेक लिया, जिसकी वजह से उसे दो विजयी अंक मिल गये।

इस चैम्पियनशिप में लक्ष्य की रैंक छठवीं थी। इस टूर्नामेंट के क्वार्टर फाइनल में लक्ष्य ने विश्व में सेकंड रैंकधारी चीन के ली शिफेंग को हराया। सेमीफाइनल में लक्ष्य का मुकाबला चौथे रैंकधारी इंडोनेशिया के इखसन लियोनार्डो रम्बे से हुआ। इन दोनों मुकाबलों में लक्ष्य ने सीधी जीत दर्ज की। भारतीय खिलाडिय़ों के साथ दौरे पर गये नेशनल कोच संजय मिश्र भी कहते हैं कि लक्ष्य ने इस टूर्नामेंट में पॉवरफुल शॉट्स, तो लगाये ही, शॉट्स में वैरिएशंस (विविधताएं) भी रखीं। फिलहाल लक्ष्य को शारीरिक तौर पर अभी और मजबूत करना होगा, क्योंकि वह इंजरी प्रोन में है। मुकाबले के वक्त लक्ष्य की पिंडुली में दर्द था, लेकिन लक्ष्य ने अपने खेल में उतार-चढ़ाव लाकर उससे सही तरीके से तादात्मय बिठाया। यह एक बड़े खिलाड़ी की निशानी है।

पीपीबीए में लक्ष्य के दूसरे कोच सागर चोपड़ा कहते हैं कि पिछले साल के मुकाबले लक्ष्य ने इस साल अपने डिफेंस को काफी मजबूत किया है। क्वार्टर फाइनल में सेकंड सीड ली शिफेंग और सेमीफाइनल में फोर्थ सीड इखसान लियानार्डो रम्बे के खिलाफ मैच में उसने जिस कदर पकड़ बनायी, उसकी जितनी तारीफ की जाए, कम ही है। दोनों प्रतिद्वंद्वी खिलाडिय़ों पर बढ़त के लिए लक्ष्य ने नेट के पास से खेलने को तरजीह दी। इससे पहले लक्ष्य हार्ड ड्राइव में यकीन करता था, लेकिन इस टूर्नामेंट में उसने अपने प्रतिद्वंद्वी को सॉफ्ट शॉट्स के जरिए नेट के करीब से छकाया।

लक्ष्य ने इस सीजन की शुरुआत से ही अपने डिफेंस को इम्प्रूव करने के लिए काफी मेहनत की है। पिछले दिसम्बर में मुम्बई में टाटा ओपन में रनर-अप रहे लक्ष्य ने इस साल अप्रैल में हुए ओसाका इंटरनेशनल चैलेंज तक कोई दूसरा टूर्नामेंट नहीं खेला। पिछले सीजन की समाप्ति के समय लक्ष्य का कंधा चोटिल हो गया था। डाक्टरों ने उसे सलाह दी थी कि वह 2018 शुरू होने तक आराम करे। तब से वह जब तक रिहैबिलेशन में था, कोर्ट में नहीं उतरा। उसने इन दिनों में फिजिकल स्ट्रेंथ, खासकर कमर के निचले हिस्से को मजबूत करने पर ध्यान दिया। इसी वजह से उसकी लोअर बॉडी पहले की अपेक्षा काफी मजबूत हो गई। रिहैबिलेशन के बाद जब वह कोर्ट पर लौटा, तो उसने शुरू में अंडरहैंड शॉट्स से खेलना शुरू किया। कुछ टूर्नामेंट में उसकी मूवमेंट प्रभावित हो रही थी, लेकिन धीरे-धीरे उसने फिर से आत्मविश्वास हासिल कर लिया।

लक्ष्य का पहला रीयल टेस्ट मई में न्यूजीलैंड ओपन में तब हुआ जब वह दो बार के ओलम्पिक चैम्पियन लिन डैन के खिलाफ खेलते हुए दूसरे राउंड में पहुंचा था। किसी ने सोचा तक नहीं रहा होगा कि यह लड़का ख्यातनाम चाइनीज प्लेयर को टफ फाइट देगा, लेकिन लक्ष्य ने खुद को संभाला था और पहला गेम जीत कर लिन डैन पर बढ़त ले ली थी। हालांकि पहला सेट गंवाने के बाद लिन अगले दो गेम्स में अपनी रौनक में आ गया था। फिर भी लक्ष्य ने लिन डैन के मुकाबले अंक अर्जित किये थे। इस मुकाबले के बाद लक्ष्य थॉमस कप में भी लिन डैन के मुकाबले में था। लक्ष्य आत्मविश्वास से भरा था। चोपड़ा कहते हैं कि जब लिन डैन से मुकाबले की बात लक्ष्य को बताई थी, तो उसने कहा था कि हां भैया, खेलने को मिलेगा, तो अच्छा हो जाएगा।

थॉमस कप में भी पहला सेट लक्ष्य ने अपने नाम कर लिया था, लेकिन बाद में लिन ने अपने जबर्दस्त अनुभव का लाभ उठाते हुए अगले दो गेम्स अपने पक्ष में कर लिया था। इन दोनों मुकाबलों के अनुभव की वजह से लक्ष्य उच्च रैंक वाले खिलाडिय़ों से कभी डरता नहीं है कि उसके सामने दिग्गज खिलाड़ी हैं। पूर्व वूमेन नेशनल चैम्पियन सयाली गोखले का ख्याल है कि ओलंपिक गोल्ड क्वेस्ट स्कॉलरशिप विनर लक्ष्य अब टफ सीनियर सर्किट में कदम रखने को पूरी तरह तैयार है। उसने इंटरनेशनल सीरीज और इंटरनेशनल चैलेंज इवेंट्स जैसी बड़ी लीग में भागीदारी भी शुरू कर दी है।

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