लुटियन जोन के चश्मे से सोनिया की डिनर पार्टी

अखिलेश अखिल

13 मार्च यानी मंगलवार। सबको इन्तजार है इस रात की। विपक्ष को भी और सत्ता पक्ष को भी। बीच वाले भी इस पर नजरें लगाए बैठे हैं। कुछ को बुलावे का इन्तजार है तो कुछ को हंसी उड़ाने का। राजनीतिक और लुटियन जोन में बस इसी रात की चर्चा चल रही है। कांग्रेस वाले कुछ ज्यादा ही मुखर दिख रहे हैं। 24 अकबर रोड के बाहर सन्नाटा है लेकिन चारदीवारी के भीतर गहमागहमी। वहाँ कई तरह के तर्क चल रहे हैं। हरेक नेताओं की कोटरी अलग अलग बयान करती है। किसी से सोनिया मैडम की डिनर पार्टी के बारे में बात कीजिये तो बस एक ही जबाब मिलता है-सब ठीक है जी, सब आएंगे और मिलकर बातें होंगी। क्या बातें होंगी ? कोई जबाब नहीं। तभी एक इंटरनल ऑफिस का कर्मचारी सामने आकर कहता है- ”काहे चिंतित है भाई साहेब ! अब मजा आएगा। सारे विपक्षी को न्योता भेजा गया है। भोजन-भात के बाद राजनीति पर चर्चा होगी। सब इकठ्ठा हो जाए तो बीजेपी को हराना कोई बड़ी बात है ?”

उधर बीजेपी के नए कार्यलाय में भी सोनिया गांधी की डिनर की चर्चा है। लेकिन उस चर्चा में उमंग नहीं तिरस्कार का भाव है। बिहार के एक विधायक मिल गए। एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने आये हैं। बिहार सरकार का हालचाल जानना चाहा तो तुनक गए। इतने पिनके कि आपा से बाहर होते गए। पानी पीकर बोले- आपलोग बिहार पर बहुत नजर गड़ाए हैं। वहाँ तो सब ठीके है। देश को कांग्रेस ने और बिहार को लालू ने बर्बाद कर दिया। अब हम लोग ठीक कर रहे हैं। हम लोग ठीक कर देंगे। बीच में टोकते हुए पूछा- सोनिया जी डिनर पार्टी कर रही है। एनडीए को तोड़ने के लिए? नेता जी बमक गए। कहने लगे -कहीं जमीन बची है उनके पास। मोदी जी को हराएंगे ? बहुत लुटे हैं लोग अब रोते रहे। हमलोगों की भी नजर है उस डिनर पर। सब फ्लॉप हो जाएगा। देखते रहिये।

डिनर अभी होना है लेकिन बेचैनी दोनों तरफ है। भविष्य की राजनीति को लेकर सियासी लोग मंथन तो कर ही रहे हैं। यह भी सच है कि पीएम मोदी के प्रति लोगों में प्रेम अब भी कम नहीं हुआ है। प्रमाण के तौर पर लगातार होती बीजेपी की जीत की दस्तक सबको दिखाई भी पड़ रही है। लेकिन समीकरण को बदलने में भला समय कितना लगता! यही तो लोकतंत्र का खेल है। राजनीतिक हलकों में इस बात की चर्चा कुछ ज्यादा हो रही है कि भले ही फूलपुर, गोरखपुर उपचुनाव के कारण ही सपा-बसपा एक मंच पर आये हों लेकिन राजनीति के लिए यह बड़ा सन्देश तो है ही। धुर विरोधी दल जब अपनी अस्मिता को बचाने के लिए एक हो सकते हैं तो बहुत सारे दल भी अपनी राजनीति को बचाने के लिए एक मंच पर आ सकते हैं। पहले भी आये हैं और आते रहेंगे भी। बस यही समझ है सोनिया गांधी की डिनर पार्टी की।

सूत्रों के हवाले से मिल रही खबर के मुताबिक़, सोनिया गांधी ने 13 मार्च को जिस रात्रिभोज का आयोजन किया है उसमे करीब 17 दलों को न्यौता भेजा है। इसमें कांग्रेस के नेताओं के अलावा आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के बेटे और बिहार के पूर्व उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव शामिल होंगे। आरजेडी के अलावा तृलमूल कांग्रेस, बहुजन समाजवादी पार्टी, समाजवादी पार्टी, वामपंथी दलों को न्यौता गया हैं। इसके अलावा एनडीए में परेशान सहयोगी दलों से भी बातचीत हो रही है। इस रात्रिभोज का न्यौता तेलुगु देशम और बीजू जनता दल को भी गया है।

ये दोनो ही दल बीजेपी से नाराज हैं। कांग्रेस की कोशिश है कि न्यूनतम एजेंडा में सहमति बनाने वाले दलों को शामिल किया जाए। हालांकि ये अभी तय नहीं है कि इन दोनो पार्टियों से कोई नेता शिरकत करेगा कि नहीं। कोशिश ये है कि आने वाले लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी और प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ एक मजबूत गठबंधन तैयार हो जाए। चूंकि ये न्यौता कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के बजाय सोनिया गांधी की तरफ से गया है इसलिए कहा जा सकता है कि करीब डेढ़ दशक से भी ज्यादा समय तक सफलतापूर्वक राजनीति करने वाली सोनिया गांधी अभी भी मजबूत हैं और पार्टी को सत्ता तक ले जाने की कोशिश में लगी है। ये विपक्ष के उन नेताओं के लिए संदेश है जो पुरानी विरासत संभाले हुए हैं। इन लोगों ने सोनिया गांधी के साथ काम किया है और उन्हें नेता के रूप में स्वीकारते भी हैं। उन पार्टियों को गठजोड़ में लाना और संभालने का जिम्मा सोनिया गांधी ने उठाया है।

इसी बीच कांग्रेस का दावा है कि पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी के रिश्ते सहयोगी दलों के युवा नेताओं से काफी नजदीकी हैं। राहुल के राजनैतिक दोस्तों में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव, लोकदल के महासचिव जयंत चौधरी, नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष उमर अब्दुल्ला, तमिलनाडु पार्टी डीएमके के अध्यक्ष एमके स्टालिन शामिल हैं। ये सारे नेता अपनी पार्टियों का चेहरा हैं। साथ ही कांग्रेस के मजबूत सहयोगी भी माने जाते हैं। साथ ही राहुल गांधी की दोस्तों में ऐसे युवा नेता भी है जो राजनीति में जन आंदोलन के जरिए कदम रख चुके हैं। इनमें पाटीदार नेता हार्दिक पटेल, दलित नेता जिग्नेश मेवाणी के साथ ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर शामिल हैं। सच यही है कि राहुल गांधी पहले से ज्यादा लोगों में मान्य हुए हैं। उनकी रणनीति भी बदली है और राजनीति भी। देखना होगा कि सोनिया गाँधी की डिनर पार्टी देश के लिए क्या भविष्य तय करती है।

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