लेन देन की बुनियाद पर टिकी अवसरवादी राजनीति

दिल्ली ब्यूरो: मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जिस तरह से साधुओं को मंत्री का दर्जा दिया है वह अवसरवादी राजनीति की पोल खोलती है। घटिया राजनीति का इससे बेहतर बानगी और कुछ नही हो सकती। जो साधू कल तक शिवराज चौहान को महाभ्रष्ट कहने से नहीं चूक रहे थे अब शिवराज के गुण गए रहे हैं। नर्मदा यात्रा और नर्मदा के किनारे चल रहे बृक्षारोपण का काम अब अचानक रुक सा गया है। साधू भी मस्त और सरकार भी मस्त। विरोध की सभी बातें ख़त्म सी हो गयी। चौहान ने कुछ रोज पहले कहा था… कुछ लोग वोट बैंक की राजनीति कर रहे हैं… लोगों को इन चीजों से दूर रहना चाहिए.’ लेकिन अब शिवराज अपने की ब्यान से मुकर रहे हैं। वोटबैंक की राजनीति करके शिवराज खुद विपक्ष के निशाने पर आ गए है।

आपको बता दें कि नर्मदा यात्रा के अगुवा कंप्यूटर बाबा थे। इन्हें अपनी जबर्दस्त याद्दाश्त के चलते इस नाम से पुकारा जाता है। मंत्री का दर्जा मिलने के बाद जब उनसे पूछा गया कि क्या वे अब भी सरकार के खिलाफ यात्रा निकालेंगे तो उनका कहना था, ‘फिलहाल इसकी जरूरत नहीं है। कंप्यूटर बाबा ने आगे यह भी कहा कि वे अब सरकार के साथ मिलकर नर्मदा संरक्षण के लिए जागरूकता अभियान चलाएंगे। इन बाबा का यू-टर्न का रिकॉर्ड भी कमाल माना जा सकता है क्योंकि कुछ दिन पहले ही ये कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के साथ नर्मदा परिक्रमा यात्रा कर रहे थे। कुछ लोग कह रहे हैं कि चूंकि पाइलट बाबा दिग्विजय सिंह का साथ दे रहे थे इसीलिए शिवराज सिंह ने उन्हें अलग कर दिग्विजय सिंह की राजनीति को कमजोर कर दिया है। लेकिन जिस तरह से पाइलट बाबा को मंत्री का दर्जा दिया गया है उससे शिवराज सिंह की राजनीति को सबसे बड़ी अवसरवादी राजनीति के रूप में लोग देख रहे हैं।

पहली बात तो यही है कि शिवराज सिंह ने सीधे-सीधे राजनीति और धर्म को मिला दिया है। अपने इस कार्यकाल में बतौर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का प्रदर्शन बहुत ही लचर रहा है। जाहिर है कि यह फैसला उन्होंने सात महीनों बाद यहां होने जा रहे विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर किया है। इसके साथ ही शिवराज सिंह चौहान ने उन सभी राज्य मंत्रियों का एक तरह से अपमान किया है जो चुनाव लड़कर और जीतकर मंत्री बने हैं। अब जिन लोगों को राज्य सरकार ने मंत्री का दर्जा दिया है उन्हें प्रशासन चलाने का अनुभव तो है ही नहीं, दूसरी तरफ यह मानने की भी कोई वजह नहीं है कि उनकी पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में कोई विशेषज्ञता है। इन लोगों को मंत्री पद मिलने का एक नुकसान यह भी हो सकता है कि अब कई दूसरे धार्मिक नेता अपने सामाजिक कार्यों का हवाला देकर ऐसी ही मांग करेंगे या सरकारों पर बेवजह दबाव बनाएंगे।

इस पूरे घटनाक्रम की असलियत यह है कि इन नेताओं के पास अनुयायियों की अच्छी-खासी भीड़ है और भाजपा चाहती है कि चुनावों में इनका फायदा उठाया जाए। कंप्यूटर बाबा से जुड़ी एक और दिलचस्प बात है कि वे इससे पहले आम आदमी पार्टी से संपर्क कर राज्य सभा की टिकट मांग चुके हैं। इस उदाहरण और सरकार के खिलाफ आंदोलन वापस लेने से इनके धार्मिक नेता होने का दावा भी झूठा पड़ता है क्योंकि खुद इनके मुताबिक साधु-संतों को दुनियावी मोह-माया से दूर रहना चाहिए।यहां यह बात नहीं कही जा रही कि धार्मिक नेताओं को राजनीति से दूर रहना चाहिए। योगी आदित्यनाथ महंत से मुख्यमंत्री बनने तक इस सफल बदलाव का सबसे बढ़िया उदाहरण हैं। राजनीति में अपने हिस्से की विश्वसनीयता उन्होंने कई बार चुनाव लड़कर और जीतकर हासिल की है। लेकिन किसी का सीधे-सीधे मंत्री का दर्जा पा लेना और फिर खुद को जनता का प्रतिनिधि मानकर उसकी तरफ से बोलना हर लिहाज से बेईमानी है। इसीलिए भी यह कहा जा सकता है कि मध्य प्रदेश सरकार और मंत्री पद पाने वाले इन लोगों ने भारत में राजनीतिक अवसरवाद का सबसे ओछा उदाहरण पेश किया है।

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