लॉकडाउन के कारण घरों में कैद बच्चे मानसिक बीमारी के मुहाने पर पहुंचे

जिनेवा: कोरोना ने पिछले एक साल से घर में कैद बच्चों को मानसिक बीमारी के मुहाने पर पहुंचा दिया है। यूनिसेफ ने अपनी ताजा रिपोर्ट में दावा किया है, कि लॉकडाउन की वजह से करीब 33 करोड़ लोग घरों में कैद रहे। उसने चेतावनी दी है, कि अगर बच्चों की देखभाल ठीक से नहीं हुई,तब उनकी सेहत पर और गहरा असर पड़ेगा।

यूनिसेफ ने कहा कि कोविड-19 की वजह से दुनिया के लगभग सभी देशों में किसी न किसी तरह बच्चे घरों में बंद रहे। रिपोर्ट के मुताबिक सात में से कम से कम एक बच्चे को होम क्वारंटाइन रहना पड़ा। इस कारण उनमें बेचैनी और तनाव के लक्षण पाए गए हैं। यूनिसेफ ने नए विश्लेषण के जरिये दुनिया भर में स्थायी लॉकडाउन की पहचान की है। इसके लिए उसने ऑक्सफोर्ड कोविड-19 गवर्नमेंट रिस्पांस ट्रैकर के डेटा का उपयोग किया है।

विश्लेषण के अनुसार पिछले नौ महीने में पूरी दुनिया में 13.90 करोड़ बच्चे सरकारी आदेश या अन्य कारणों से घरों में कैद रहे हैं। क्योंकि कोविड-19 को 11 मार्च, 2020 को महामारी घोषित किया गया था। इसका अर्थ यह हुआ कि बच्चों को कुछ अपवादों के साथ घरों में रहना पड़ा। वहीं, पराग्वे, पेरू और नाइजीरिया जैसे देशों में स्थिति और नाजुक है। यूनिसेफ के कार्यकारी निदेशक हेनरीटा फोर ने कहा कि महामारी संबंधी रोक और प्रतिबंधों की वजह से यह साल हम सभी के लिए लंबा वर्ष रहा। उन्होंने कहा कि जब लोग कई दिनों तक अपने दोस्तों और संगे संबंधियों से दूर रहते हैं तो इसका प्रभाव हमारे स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार कोविड-19 महामारी ने दुनिया के 93 प्रतिशत देशों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को बाधित किया। फिलहाल आलम यह है कि मानसिक रोगियों की संख्या में इजाफा हो रहा है। इलाज की सुविधा पर्याप्त नहीं होने की वजह से लोगों को समस्या का सामना करना पड़़ रहा है। चीन के 194 शहरों के एक अध्ययन में पाया गया कि 16 प्रतिशत लोगों ने महामारी के दौरान गंभीर अवसाद के लक्षण बताए, जबिक 28 प्रतिशत लोगों ने गंभीर चिंता के लक्षणों के बारे में बताया।

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