लोया की मौत स्वाभाविक, दोबारा जांच की जरूरत नहीं: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस बीएच लोया की मौत की जांच की मांग स्वतंत्र एजेंसी से करने वाली याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों पर भरोसा नहीं करने का कोई कारण नहीं है। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के वकील दुष्यंत दवे ने न्यायिक अधिकारियों की तरफ असंबद्ध वजहों से इशारा किया था, जिसका कोई संबंध नहीं था। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने ये फैसला सुनाया। पिछले 16 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था।

उल्लेखनीय है कि जस्टिस बीएच लोया की मौत दिल का दौरा पड़ने से नवंबर, 2014 में हो गई थी। 2018 की शुरूआत में एक पत्रिका में छपी कहानी के बाद अचानक उनकी मौत पर संदेह जताते हुए कुछ लोगों ने कोर्ट में याचिका दायर कर दी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उनकी मौत सामान्य नहीं थी। संदेह इस आधार पर भी खड़ा किया गया कि लोया उन दिनों गुजरात के चर्चित सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले की सुनवाई कर रहे थे। इस पूरे मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने न्यायपालिका की छवि धूमिल करने की कोशिश की। व्यापारिक और राजनीतिक विवाद बाहर निपटाया जाना चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने यह याचिका जांच के लिए पेश की है पर वस्तुतः यह न्यायपालिका के खिलाफ था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जज रोया की मौत की नए सिरे से जांच की कोई जरूरत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने जज रोया की मौत को स्वाभाविक मौत बताया।

सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र सरकार ने कहा था कि याचिकाकर्ताओं का एकमात्र उद्देश्य एक व्यक्ति को टारगेट करना है । महाराष्ट्र सरकार के वकील मुकुल रोहतगी ने कहा था कि इंटेलिजेंस के महानिदेशक ने इस मामले की जांच की थी । उन्होंने कहा था कि एंटी करप्शन और इंटेलिजेंस दोनों ने समानांतर जांच की। उन्होंने दलील दी थी कि महत्वपूर्ण मामले की जांच इतना महत्वपूर्ण तरीके से की गई कि दूसरे व्यक्ति को पता तक नहीं चला ।

जस्टिस लोया मामले कारवां फरवरी में रिपोर्ट छापी तो नागपुर पुलिस ने तुरंत एम्स से सलाह ली थी । इस पर डॉ. आर के शर्मा ने लिखा था कि उनके इंटरव्यू के बाद जो निष्कर्ष निकाला गया वो काल्पनिक था । कारवां के लेख पर इसलिए भरोसा नहीं किया जा सकता है क्योंकि डॉ. शर्मा ने खुद कहा था कि निष्कर्ष गलत निकाला गया था । बांबे के केईएम अस्पताल के फोरेंसिक एंड टॉक्सिकोलॉजी के प्रमुख डॉ. हरीश पाठक की राय भी ली गई । उस आधार पर ये कहा जा सकता है कि जज लोया की मौत एक्युट कोरोनरी इनसफिसिएंशी से हुई ।

रोहतगी ने कहा कि 29 नवंबर 2014 को जज लोया, जज कुलकर्णी और जज मोदक ने रात में यात्रा कर नागपुर में शादी में हिस्सा लिया । तीनों जजों ने 30 नवंबर को कुछ शॉपिंग की और बाद में पान भी खाया । उस समय हाईकोर्ट के चार जज और डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के पांच जज मौजूद थे । 1 दिसंबर को तीनों जज रवि भवन में मौजूद थे । सुबह चार बजे से सात बजे तक सभी जज वहां मौजूद थे ।

रोहतगी ने कहा था कि बयानों में अंतर का कोई महत्व नहीं है । महत्वपूर्ण ये है कि जज लोया की मौत हार्ट अटैक से हुई । हम इस पर चर्चा नहीं कर रहे हैं कि क्या होना चाहिए था । उन्होंने कहा कि कारवां मैगजीन गैरजिम्मेदार है। मैगजीन कहती है कि उन्होंने एक जज से मुलाकात की जो जज लोया के साथ मौजूद था । लेकिन याचिकाकर्ताओं उनके साथ रहने पर सवाल उठा रहे हैं । याचिकाकर्ता केवल एक व्यक्ति को टारगेट कर रहे हैं । रोहतगी ने कहा था कि दुष्यंत दवे ने चार जजों के क्रास-एग्जामिनेशन की मांग की । ये मांग विनाशकारी है । हम किस पर भरोसा करें । कारवां रिपोर्ट पर या जज पर जिनके पास कार थी और वे जज लोया को अस्पताल ले गए । जज डॉक्टर नहीं होते । उस समय उन्होंने तात्कालिक फैसला किया । ये महत्वपूर्ण नहीं है कि जज लोया को दांडे अस्पताल क्यों ले जाया गया, दूसरे अस्पताल क्यों नहीं ले जाया गया ।

रोहतगी ने कहा था कि इस तरह की दलील की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए । कोर्ट का एक शब्द भी समस्या पैदा कर देगा जिसमें हाईकोर्ट के चार जजों और डिस्ट्रिक्ट जजों की जांच की बात होगी । याचिकाकर्ता कोर्ट और बार पर हमला कर रहे हैं और चीफ जस्टिस का ये कर्तव्य है कि वे न्यायपालिका की रक्षा करें । बहस के दौरान वरिष्ठ वकील इंदिरा जय सिंह ने कहा था कि आदेश केवल मौत के मामले पर दिया जाए और बाकी मामले हाईकोर्ट वापस भेज दिए जाएं । इस मामले याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा था कि जब हमने डॉ शर्मा की रिपोर्ट सौंपी उसके बाद डॉ. शर्मा पर दबाव डाला गया कि वे स्पष्टीकरण जारी करें । प्रशांत भूषण ने कहा था कि जज लोया की मौत हार्ट अटैक से नहीं हुई थी । उन्होंने कहा था कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में जहर देने की आशंका है । उन्होंने फोरेंसिक एक्सपर्ट आरके डॉ. शर्मा की राय का हवाला देते हुए कहा था कि उनकी राय जज लोया की रिपोर्ट से विरोधाभासी है । जज लोया के सभी अंग दबाव में थे जिसका कोई कारण नहीं बताया गया । उनकी धमनियां कड़ी हो गई थी । उन्होंने कहा कि अगर धमनियां कड़ी हो जाती हैं तो हार्ट अटैक की संभावना नहीं है । उन्होंने कहा था कि डॉ. शर्मा के मुताबिक अंगों में दबाव का वजह नहीं बताना आश्चर्यजनक है । उन्होंने कहा कि विसरा सैंपल 1 दिसंबर को प्राप्त होता है और उनका एनालिसिस 19 जनवरी तक होता है । उसकी रिपोर्ट 5 फरवरी को बनायी जाती है । सब कुछ असामान्य तरीके से हुआ।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील दुष्यंत दवे ने कहा था कि महाराष्ट्र सरकार की रिपोर्ट में काफी विरोधाभास है और उसकी जांच का आदेश दिया जाना चाहिए । उन्होंने कहा था कि अगर जज लोया की स्वाभाविक मौत भी हुई हो तो जांच का आदेश देना चाहिए।

सुनवाई के दौरान दवे ने कहा था कि इंटेलीजेंस के आयुक्त की रिपोर्ट जांच दोबारा करने को कहता है। जज लोया के शव को उनके घर क्यों नहीं भेजा गया और उनके परिवार को क्यों नहीं सूचित किया गया । राज्य सरकार को इसका विरोध नहीं करना चाहिए। उसे जांच कराना चाहिए। उन्होंने कहा कि कमरे में कोई जज मौजूद नहीं था ।

सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं की दलीलों को खारिज कर फैसला दिया कि जस्टिस लोया की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई थी। याचिकाकर्ताओं ने जनहित याचिका के अधिकार का दुरुपयोग कर न्यायपालिका को बदनाम करने का प्रयास किया है। यह याचिका शरारतपूर्ण उद्देश्य से और न्यायपालिका को बदनाम करने के साथ ही राजनीतिक उद्देश्य से दाखिल की गई है।

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया The Lucknow Tribune के  Facebook  पेज को Like व Twitter पर Follow करना न भूलें... --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
Loading...
E-Paper