वंचितों के लिए स्कूल खोल बदल दी उनकी किस्मत, जानिए ‘रियल हीरो’ बिपिन धारे की कहानी

आज हम आपको बताने जा रहे हैं एक ऐसे नायक की कहानी जिसने अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनी और निकल पड़ा दूसरों के जीवन में बदलाव लाने के लिए। किसी भी मध्यवर्गीय भारतीय की तरह बिपिन धारे के माता-पिता का सपना था कि उनका बेटा अच्छी शिक्षा हासिल करे और अच्छा करियर बनाए। सतारा के इस दंपती ने इसके लिए कड़ी मेहनत की और जब बेटे को आईआईटी खडग़पुर में दाखिला और उसके बाद सिंगापुर में नौकरी मिली तो उन्हें सपना पूरा होता नजर आया। लेकिन नौकरी और अच्छी आमदनी के बावजूद तीन साल बाद तक बिपिन के अंदर एक बेचैनी बनी रही।

दरअसल धारे बचपन से जरुरतमंदों की मदद करना चाहते हैं। साल 2015 में धारे ने अपनी नौकरी छोड़ने और कुछ ‘सार्थक’ करने के पक्के इरादे के साथ भारत लौटने का मन बनाया। इस दौरान उन्हें ट्वीटर पर असम के माजुली नदी द्वीप की कुछ मोहक तस्वीरें देखने को मिलीं। जब धारे ने इस बारे में पता किया तो उन्हें जानकारी मिली कि इलाके के एक स्कूल ‘एबियन पब्लिक स्कूल’ को एक शिक्षक की तलाश है। धारे 2016 में उस संस्था से जुड़ गए।

ऐसे हुई स्कूल की स्थापना
धारे ने जनवरी 2017 में स्थानीय लोगों के श्रम, शुभचिंतकों और अपनी बचत से ‘द हमिंगबर्ड स्कूल’ की स्थापना की। धारे के मुताबिक, 70 छात्रों और पांच शिक्षकों के साथ शुरू हुए इस स्कूल में अब 240 छात्र और 21 शिक्षक हैं। यह गरीब छात्रों को मुफ्त शिक्षा प्रदान करता है और इसमें 70 छात्रों के लिए एक छात्रावास भी है। इस स्कूल में पारंपरिक शिल्प, कृषि, खेल, संगीत और थिएटर भी सिखाया जाता है। धारे का कहना है कि ‘हम पांचवीं कक्षा तक कक्षाएं चलाते हैं। जो मूल्यांकन कौशल-आधारित है, स्कोर-आधारित नहीं।’

इतना आता है खर्चा
धारे ने बताया कि, हम महीने में 3 लाख रुपए खर्च कर रहे हैं। आदर्श रूप से हमें 5 लाख रुपए चाहिए। उन्होंने बताया कि, स्कूल को बेंगलूरू स्थित सनबर्ड ट्रस्ट, मुंबई स्थित केयरिंग फ्रेंड्स और व्यक्तिगत दाताओं से दान मिलता है। जबकि धारे का निजी खर्च विप्रो की सस्टेनेबिलिटी सीडिंग फेलोशिप से मिलने वाली रकम से पूरा हो जाता है।

रंग ला रही है मेहनत
धारे के मुताबिक, भोपाल में आयोजित पेनकाक सिलेट मार्शल आर्ट प्रतियोगिता में एक छात्र ने राष्ट्रीय स्वर्ण पदक जीता। जबकि एक छात्रा फुटबॉल टीम कोलकाता में एक स्पर्धा में भाग लेने के बाद अभी-अभी लौटी है। यह इन बच्चों के लिए एक लंबी छलांग है जिन्हें कुछ साल पहले तक माजुली के केंद्र की यात्रा करने का भी कोई अवसर नहीं मिला था।

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